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काश, भाजपा ने पहले ही यह सब समझा होता?

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Sat , 14 Jul

सार

उसी के बाद संघ के स्वयंसेवक और प्रचारक भाजपा के चुनाव-प्रचार से तटस्थ हुए थे। संघ-भाजपा की आपसी समन्वय बैठकें तक नहीं हो सकीं, नतीजतन दोनों में ही समन्वय और सामंजस्य के अभाव दिखे..!!

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विस्तार

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने जो टिप्पणियां की हैं, आम चर्चा का विषय हो गई है, विशेषकर नई केंद्र सरकार के संदर्भ में।  ये टिप्पणी संघ-भाजपा के अलगाव या संबंध-विच्छेद तक की नौबत तो क़तई नहीं हैं। श्री भागवत ने जिनके संदर्भ में ‘सेवक’, ‘मर्यादा’ और ‘अहंकार’ सरीखे शब्दों का इस्तेमाल किया है, वे प्रत्यक्ष रूप से भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी से ही जुड़ते हों, सरसंघचालक की इतनी संकीर्ण सोच नहीं हो सकती। वस्तुतः:भाजपा और मोदी दोनों ही संघ के सृजन हैं। 

संघ-प्रमुख ने कार्यकर्ताओं के विकास वर्ग कार्यक्रम के समापन पर अभिभावकीय मुद्रा में संबोधित किया, तो वह पूरी राजनीतिक और सामाजिक संस्कृति को आगाह कर रहे थे। अहंकार छोड़ कर काम करना चाहिए और काम के बदले अहंकार नहीं करना चाहिए, वही ‘सच्चा सेवक’ होता है। चुनाव में एक पक्ष होता है, तो दूसरा वैचारिक प्रतिपक्ष होता है। वह दुश्मन नहीं होता, आपका सैद्धांतिक विरोधी है। देश की सत्ता और संसद के लिए भी दोनों पक्ष अनिवार्य हैं। इस बार लोकसभा चुनाव कड़वाहट भरा था। चुनाव युद्ध की तरह लड़ा गया। मर्यादा जरूरी है। चुनाव में जो कुछ हुआ, उस पर विचार करना होगा। देश ने विकास किया है, लेकिन चुनौतियों को भी न भूलें।

सहमति से देश चलाने की परंपरा का स्मरण दिलाते हुए सरसंघचालक ने भाजपा को कुछ नसीहत दी है और चेताया भी है। उन्होंने मतदान के कुछ चरणों में बूथ और पन्ना-प्रमुख के चेहरों के गायब होने का मुद्दा भी उठाया। जो कार्यकर्ता घरों से भाजपा के समर्थक मतदाताओं को निकाल कर मतदान-केंद्रों तक ला सकते थे, आखिर वे कहां थे? सरसंघचालक ने प्रत्याशियों पर असहमति का सवाल भी उठाया कि ऐसे अवांछित चेहरों को चुनाव मैदान में क्यों उतारा गया? आरएसएस को लेकर भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने जो बयान दिया था अथवा सार्वजनिक तौर पर जो निहितार्थ ग्रहण किया गया था, वह भी आत्मघाती साबित हुआ।

उसी के बाद संघ के स्वयंसेवक और प्रचारक भाजपा के चुनाव-प्रचार से तटस्थ हुए थे। संघ-भाजपा की आपसी समन्वय बैठकें तक नहीं हो सकीं, नतीजतन दोनों में ही समन्वय और सामंजस्य के अभाव दिखे। मतदान के प्रतिशत कम होते रहे। सरसंघचालक ने पहले भी चेताया था कि अब हम सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी की छवि और लोकप्रियता के सहारे ही चुनाव नहीं जीत सकते। इस बार ऐसा ही हुआ कि भाजपा 400 पार के नारे के ‘बुलबुलों’ में ही कैद रही। प्रधानमंत्री मोदी के व्यक्तित्व पर ही अति विश्वास किया जाता रहा, नतीजा सामने है।

 भाजपा 240 सीट ही जीत पाई, जबकि पिछली  लोकसभा में भाजपा के 303 सांसद जीत कर आए थे। यह नतीजा भी तभी सामने आया, जब अधिकांश क्षेत्रों में संघ के कुछ कार्यकर्ता काम करते रहे। जिस दिन संघ पूरी तरह, घोषित तौर पर, खुद को भाजपा से अलग कर लेगा, उस स्थिति में भाजपा के लिए 150 लोकसभा सीटें जीतना भी मुश्किल हो सकता है। संघ वैचारिक और सैद्धांतिक तौर पर प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा के खिलाफ नहीं है। भाजपा के 18 करोड़ से अधिक सदस्य हैं, जो संघ के अभियानों के ही प्रतिफल हैं। भाजपा आज भी संघ का राजनीतिक मंच है। संघ मोदी सरकार के पतन या ‘इंडिया’ जैसे विपक्षी गठबंधन की संभावित सरकार के पक्ष में कभी सोच भी नहीं सकता। 

सरसंघचालक भागवत ने जलते, त्राहि-त्राहि करते मणिपुर का मुद्दा प्रसंगवश ही उठाया है और केंद्र सरकार को कर्तव्य-बोध कराया है। मणिपुर हिंसा में 220 से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं।1100 से ज्यादा लोग घायल हैं। हिंसक घटनाओं का आंकड़ा 5000 से ज्यादा है, जबकि 70,000 से अधिक लोग विस्थापित हो चुके हैं। भागवत का सवाल है कि इस स्थिति पर ध्यान कौन देगा? प्राथमिकता के स्तर पर विचार करना किसका दायित्व है? करीब 50,000 लोग राहत-शिविरों में जीने को विवश हैं। यह संघ-प्रमुख का अभिभावकीय संबोधन है कि जो अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए मर्यादा की सीमा में रहता है। जो अपने काम पर गर्व करता है, फिर भी अनासक्त रहता है, जो अहंकार से रहित होता है, ऐसा व्यक्ति ही वास्तव में ‘सेवक’ कहलाने का हकदार है। भाजपा को कुछ और कारणों से अप्रत्याशित पराजय झेलनी पड़ी है।