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कांग्रेस में बढ़ती सियासी लंपटता

सार

  विधानसभा चुनाव हारने के बाद भी राज्य में कांग्रेस की जीत के लिए जीतू पटवारी को अध्यक्ष बनाया गया. राजनीति की खींचतान में अध्यक्ष का परफॉर्मेंस संगठन में समन्वय और एकजुटता में तलाशा जाता है. इन प्रयासों का असर तो विधानसभा चुनाव में ही आँका जाता है लेकिन बोली तो हर दिन पीछा करती है..!!

janmat

विस्तार

    जब से जीतू पटवारी अध्यक्ष बने हैं तब से ही उनकी कई बातों पर विवाद उत्पन्न हुए. लेकिन इस बार तो उनकी बोली हार की गोली बन गई है. इस बार उन्होंने राज्य की महिलाओं को टारगेट किया है. उन्होंने यह महाज्ञान बताया है कि, राज्य में 50% महिलाएं शराब का सेवन करती हैं 

    ऐसा बयान देना, जिससे एक बड़ा समूह नाराज हो सकता है. कोई भी राजनेता ऐसे कैसे कर सकता है? अगर यह बात सही भी है तो क्या हम हर सही बात को सार्वजनिक करते हैं. क्या मर्यादा और महिलाओं का सम्मान कायम रखना राजनीति का विषय नहीं बचा है.    

    सोशल मीडिया के जमाने में कोई भी सियासी वक्तव्य घर-घर तक पहुंचाना केवल घंटों का विषय बचा है. व्हाट्सएप पर पूरे राज्य में वीडियो फैल जाते हैं. युवा लीडर होने के बाद भी जीतू पटवारी की विधानसभा में पराजय के पीछे उनकी बोली ही कारण हो सकती है.

     राजनीति में बोली का बड़ा महत्व है. राजनीतिज्ञ क्या सोचता है, यह उसकी बोली और भाषा से ही पता चलता है. 

    प्रदेश कांग्रेस राज्य में कोई जन आंदोलन तो खड़ा ही नहीं कर पा रही है. अनेक ऐसे जनहित के मुद्दे हैं, जिस पर विपक्ष की ताकतवर आवाज आनी चाहिए. इस मामले में कांग्रेस की भूमिका सोशल मीडिया पर विपक्ष की भूमिका बन रह गई है. 

    किसानों के सामने खाद संकट है. इस पर छिंदवाड़ा में कांग्रेस आंदोलन करती है. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष इस आंदोलन में पहुंचते हैं. आंदोलन का समापन कुत्ते को ज्ञापन सौंप कर किया गया था. कांग्रेस ने प्रशासन के प्रतीक के रूप में कुत्ते की खोज की है. यह भी उसी प्रकार का एक्शन है जो महिलाओं को शराब पीने के बयान के पीछे दिखाई पड़ता है.

    राजनीति में महिलाओं की भूमिका और भागीदारी लगातार बढ़ रही है. मध्य प्रदेश का पिछला विधानसभा चुनाव बीजेपी लाड़ली बहना योजना से जीतने में सफल हो पाई है. भाजपा ऐसा मानती भी है, इसीलिए लाड़ली बहना की राशि बढ़ाई गई है. अगले चुनाव के पहले इस राशि को और बढ़ाने की घोषणा की जा चुकी है. 

    अगले चुनाव के पहले लोकसभा और विधानसभा में महिला आरक्षण लागू करके भी बीजेपी अपने आधार को मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही है. दूसरी तरफ कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष महिलाओं के निजी आचरण पर इस तरह का सवाल खड़ा कर रहे हैं. यह ऐसा मुद्दा है, जो माफी से खत्म नहीं हो सकता है और ना ही कुछ समय में भूलने वाला. यह मुद्दा कांग्रेस के खिलाफ आने वाले चुनाव में भी प्रमुखता से उठाया जाना तय है.  

    मोहब्बत की राजनीति नफरत फैलाने का काम कर रही है. क्या राजनीति में नक्सलिज्म का प्रभाव बढ़ रहा है. क्या नियम, कानून, प्रक्रिया और संविधान का पालन केवल दिखावा बन गया है. 

    कांग्रेस की ओर से छिंदवाड़ा के कलेक्टर को बीजेपी का गुलाम बताया गया था. इस पर आईएएस संगठन द्वारा भी गंभीर आपत्ति व्यक्त की गई. कांग्रेस में परिवारवाद की गुलामी राजनीति की सच्चाई बनी हुई है. सरकारी तंत्र लोक सेवक के रूप में भूमिका अदा करता है. उसको गुलाम के रूप में वही देख सकता है, जिसकी खुद की मानसिकता गुलामी में काम करने की होती है.

    कांग्रेस के युवा नेतृत्व से नई ऊर्जा और नए तरह के सार्वजनिक व्यवहार की उम्मीद थी लेकिन मध्य प्रदेश की कांग्रेस ने निराश किया है. मतदाताओं को तो पांच साल में एक बार फैसला करना होता है लेकिन राजनीति  और प्रशासन से जुड़े लोगों को हर दिन ऐसे तत्वों से जूझना पड़ता है. जिनकी भाषा, बोली, आचरण सब अनैतिकता की कहानी कहता है.

    सियासत में तुलना पर दारोमदार होता है, जो राजनीतिक दल तुलनात्मक रूप से बेहतर दिखता है उसको ही पब्लिक चुन लेती है. बोली और भाषा के मामले में तो कोई भी दल पीछे नहीं है. बीजेपी में भी अक्सर ऐसे बयान आ जाते हैं, जो मर्यादित नहीं कहे जा सकते.

    अभी हाल ही में भिंड विधायक और जिला कलेक्टर के बीच सार्वजनिक रूप से हुआ विवाद उजागर हुआ है. कलेक्टर महोदय पहले भी छात्र को पीटने के मामले में फंस चुके हैं. जहां तक विधायक महोदय का सवाल है, उनकी छवि के बारे में पब्लिक और पार्टी दोनों को पता है. बहुमत के लिए जीतने की क्षमता आपराधिक छवि से भी समझौता करने के लिए पार्टियों को मजबूर कर देती है. ऐसे हालात बदलने चाहिए.

     कांग्रेस मे चुनाव के पहले नया नेतृत्व देने की परंपरा है. अगले चुनाव में अभी काफी समय है. जीतू पटवारी को अपनी बोली में सुधार करने की जरूरत है. 

    भाषा और बोली की लंपटता पहले फुलाती, हंसाती फिर अंतत: लजाती है.