संविधान की आधारशिला शुद्ध अंतःकरण है. सांसद, विधायक शुद्ध अंतःकरण से निष्ठापूर्वक संविधान के पालन की शपथ लेते हैं. इसमें सभी पक्षों के साथ अनुराग या द्वेष के बिना न्याय की शपथ ली जाती है. हमारा संविधान मूल रूप से इन्हीं स्तंभों पर खड़ा है..!!
समानता और बंधुत्व इसी का विस्तार है. संविधान कोई मुर्दा दस्तावेज नहीं है. यह भारत के लोगों की जीवंत आत्मा का प्रतीक है. राजनीति की कथनी और करनी में संविधान पिस रहा है. कथनी संविधान की और करनी राजनीति, अन्तःकरण को ही अशुद्ध कर देती है.
निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के अंतःकरण की शुद्धता का आंकलन उनके आचरण से होता है. हाथ में संविधान लेने से अंतःकरण संविधान सम्मत नहीं हो सकता. इसके लिए तो वैसा आचरण करना पड़ेगा जो यह साबित करें कि, अंतःकरण शुद्ध है.
संविधान दिवस अवसर पर संसद में पक्ष विपक्ष दोनों एक मंच पर थे. दोनों पक्ष संविधान के प्रति अपनी निष्ठा प्रदर्शित कर रहे थे. लेकिन एक दूसरे को संविधान का विरोधी और स्वयं को उसके रक्षक के रूप में पेश करने का कोई मौका नहीं छोड़ते.
राहुल गांधी संविधान से बनी सरकार के कामकाज को संविधान पर आक्रमण मानते हैं. संशोधन की इनबिल्ड व्यवस्था संविधान ने ही दी है लेकिन संवैधानिक रूप से चुनी सरकार अगर कोई संशोधन करती है तो उसको अस्वीकार करने की राजनीतिक कोशिश को भी संविधान सम्मत बताया जाता है.
दिल्ली में प्रदूषण के लिए प्रदर्शन करने पहुंचे लोग नक्सली हिडमा के पक्ष में नारे लगाते हैं. यह नजारा संविधान रोज भुगत रहा है. हाथ में संविधान रहता है लेकिन संवैधानिक रूप सें चुनी सरकार को ही वोट चोरी से बनी कहा जाता है.
संवैधानिक संस्था चुनाव आयोग को चोर कहना अशुद्ध अंतःकरण का नमूना है. जिस आयोग के प्रमाण पत्र पर ही संविधान ने उन्हें शपथ की इजाजत दी है, उसकी साख पर ही सवाल खड़े करना राजनीतिक स्वार्थ के सिवा क्या हो सकता है.
संसद से संविधान सम्मत ढंग से पारित कानून को फाड़ कर कूड़ेदान में फेंकने की राजनीतिक भाषा, संविधान का अपमान नहीं तो क्या है. SIR का विरोध, क्या संविधान का विरोध नहीं है. कितने सारे कानून हैं जो संसद से पारित हुए लेकिन उनको राज्य सरकारें अपने राजनीतिक नजरिया के कारण लागू नहीं कर रही हैं.
एनआरसी का कानून बने लंबा अरसा हो गया है लेकिन इस पर अमल नहीं हो सका. कुछ राज्य सरकारें इसके विरोध में हैं. संविधान का संघीय ढांचा दलीय राजनीति पर बलि चढ़ा दिया जाता है.
संशोधन की संवैधानिक व्यवस्था को संविधान खत्म करने के नेरेटिव में बदलने की कोशिश है. संविधान को प्रोटेक्ट करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को भी राजनीतिक रोटी जैसा सेंका जाता है. सुप्रीम कोर्ट के निर्णय और गाइडलाइन को भी खुली सभा में चैलेंज किया जाता है. संविधान के आरक्षण की समानता की व्यवस्था को असमानता के चरम तक ले जाने से भी गुरेज नहीं.
कोर्ट ने आरक्षण की अधिकतम सीमा पचास प्रतिशत निर्धारित की है लेकिन राजनीति के लिए विधानसभाएं इस सीमा को बढ़ाने का काम करती हैं, जिसे अंततः अदालत अमान्य कर देती है. विपक्ष के नेता राहुल गांधी का तो यह एजेंडा है कि आरक्षण के संवैधानिक प्रावधानों को समाप्त करने का डर दिखाकर राजनीतिक लाभ प्राप्त किया जाए.
संविधान अंगीकार करने के छिहत्तर साल के बाद यह देखना जरूरी है कि आज राजनीति की शुचिता और नैतिकता कहां पहुंच गई है. दल बदल की धूर्तता ने राजनीतिक चातुर्यता का रूप ले लिया है. संविधान रचयिता डॉक्टर अंबेडकर पर सभी दल दावा करते हैं लेकिन उनकी विरासत को बचाने की कथनी और करनी में अंतर साफ दिखता है.
व्यक्तित्व उसके कृतित्व और स्मृतियों के संयोजन से जीवंत रहता है. अंबेडकर के पंच तीर्थ को संरक्षित करने काम तभी हो पाया जब केंद्र में बीजेपी की सरकार स्थापित हुई. कांग्रेस अंबेडकर को अपना महानायक बताती है लेकिन उनकी स्मृतियों को संजोने के लिए कुछ भी नहीं कर पाई. जो अंबेडकर के साथ हुआ वही संविधान के साथ हो रहा है.
संविधान की बात करना अलग है और उसकी आत्मा का अनुसरण करते हुए उस पर चलना, दूसरी बात. भारत के संविधान में आपातकाल के दौरान सेकुलरिज्म और समाजवाद शामिल कर केवल राजनीतिक हितों को साधा गया है. यह दोनों शब्द अभी भी संविधान में है लेकिन वर्तमान और पूर्व सरकारों के आचरण में जमीन आसमान का अंतर देखा जा सकता है. इससे यही लगता है कि, संविधान की व्याख्या राजनीतिक महत्वाकांक्षा के हिसाब से करने की प्रवृत्ति संविधान के साथ क्रूरता का उदाहरण है.
अनुराग और द्वेष के बिना शासन व्यवस्था का संचालन संविधान की आत्मा है. इसके विपरीत आज जन प्रतिनिधित्व व्यवस्था यहां तक पहुंच गई है कि जेल में रहकर भी संविधान की शपथ लेने और सरकारें चलाने की इच्छा राजनेताओं में शर्म नहीं पैदा करती. कथनी और करनी में पिसते संविधान का एक उदाहरण यह भी है कि राजनीतिक भ्रष्टाचार की जांच को रोकने के लिए राजनीतिक दल सुप्रीम कोर्ट में अपील करते हैं.
आपराधिक और भ्रष्टाचार के मामलों को राजनीतिक लाभ के लिए उपयोग किया जाता है. राजनीतिक नैतिकता तो लुप्त सी हो गई है. संविधान अनुराग और द्वेष के बिना काम की अपेक्षा करता है. दूसरी तरफ राजनीतिक दलों में परिवार और वंशवाद से अनुराग आम बात है. वंशवादी राजनीति संविधान विरोधी है लेकिन यही व्यवस्था संविधान पर खतरे का दिखावा कर अपनी राजनीति करती है. जिन पर संविधान को मिटाने का आरोप लगाया जाता है वह तो प्रधानमंत्री पद पर पहुंचने के लिए इसी संविधान को श्रेय दे रहे हैं.
लोकतंत्र की नियति संविधान पर चलने वालों के हाथ में है. इसको दिखाने से कुछ नहीं होगा बल्कि आत्मसात कर आचरण से ही लोकतंत्र मजबूत होगा. संविधान दिवस केवल एक दिन का नहीं बल्कि लोकतंत्र में हर दिन सरकारें जब संविधान दिवस के रूप में मानते हुए चलेंगीं तब व्यवस्था का अंतःकरण शुद्ध होने के मार्ग पर बढेगा.