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‘कथा’ कराने की जगह ‘शिक्षा’ पर ध्यान होता

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Mon , 21 Apr

सार

स्वास्थ्य पर बजट तो शिक्षा से भी कम है, जोकि जीडीपी के 1.5 प्रतिशत से 2.0 प्रतिशत के बीच झूलता रहता है

janmat

विस्तार

जिन 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, उनमें मध्यप्रदेश भी शामिल है। मध्यप्रदेश को राजनीति भक्ति भाव में मतदान तक डुबोए रखना चाहती है। सारे राजनेता इसी में जुट गए है। आप चाहे शोर कितना ही मचाएं लेकिन किसी राजनेता या राजनीतिक दल के पास इतनी दूरदर्शिता नहीं कि शिक्षा और स्वास्थ्य का बजट बढ़ाया जाए। स्वास्थ्य पर बजट तो शिक्षा से भी कम है, जोकि जीडीपी के 1.5 प्रतिशत से 2.0 प्रतिशत के बीच झूलता रहता है।

संसद में सरकार द्वारा रखे आँकड़े देश की दशा बताते हैं , भारत से विदेश जाकर उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्रों की संख्या में एक वर्ष में 68 प्रतिशत इजाफा हुआ है। वर्ष 2022 में यह गिनती 7,50,365 रही, जबकि 2021 में 4,44,553 थी। न्यूनतम अनुमान के मुताबिक, इस पर आया खर्च काफी विशाल होगा। लेकिन हम सुधार की अपेक्षा रखें भी कैसे, जब पिछले दो दशक से भी ज्यादा अवधि में, सालाना बजट में शिक्षा पर सकल घरेलू उत्पाद का महज 3 प्रतिशत खर्च रखा गया हो। इकॉनोमिक सर्वे के अनुसार यह मद केंद्र और राज्य सरकारों, दोनों की मिलाकर है। 

राज्य और केंद्र सरकारें हमें अज्ञानी और अधकचरे,और धार्मिक रूप से बँटे हुए ऐसे नागरिक बनाए रखना चाहती  हैं, जो समय-समय पर बंटने वाली सरकारी खैरातों में मुफ्त की वस्तुएं पाने के लिए पंक्तियों में लगे रहें। सर्वमान्य तथ्य है कि कमजोर इंसान को जाति-पाति, धर्म, पंथ इत्यादि के नाम पर बरगलाकर वोट प्राप्ति के लिए इस्तेमाल करना ज्यादा आसान होता है। अपने देश में सुविधाओं की कमी के कारण युवाओं के पास उच्च शिक्षा प्राप्ति के लिए विदेश जाने के सिवा विकल्प नहीं बचता। जो मौके उपलब्ध हैं भी, वे राजनीतिक लाभ के लिए बनाए विभिन्न किस्मों के आरक्षण कोटों की वजह से बहुत कम रह जाते हैं। 

सवाल यह है उच्च शिक्षा और अच्छे विश्वविद्यालयों में दाखिले के लिए अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, यूरोप की ओर हमारे बच्चों का यह पलायन क्या यूं ही जारी रहेगा? भारत में समुचित सुविधाएं और अनुसंधान एवं विकास के लिए वह माहौल नहीं है जो युवाओं को नया सोचने और खोज करने को प्रेरित करे, सरकारें धर्म विभाजन और अन्य नामों पर बँटवारे करने वाले आयोजन करती है । जहां तकनीक चालित जगत में नित उन्नत अनुसंधान हो रहा है वहीं हमारी पुराने ढर्रे की शिक्षा प्रणाली आज भी रट्टा मारकर परीक्षा उत्तीर्ण करने पर केंद्रित है। लगता है हम अपने इतिहास का पुनर्निमाण करने और उसे अपने भविष्य के तौर पर पेश करने पर तुले हुए हैं। यह कृत्य गहन प्रतिस्पर्धा वाली मौजूदा दुनिया में हमें पछाड़कर रख देगा, न ही इससे हमारे विश्वविद्यालयों और लैब्स में क्वांटम फिजिक्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, नैनो-टेक्नोलॉजी, रोबोटिक्स इत्यादि नवीनतम तकनीकों का वैसा प्रसार हो पाएगा, जो भविष्य को आकार दे रहा है।

आज भारत तमाम क्षेत्रों और विधाओं में पश्चिमी जगत और चीन का मुकाबला करना चाहते है, परंतु तरक्की के लिए जो दो अवयव - शिक्षा और स्वास्थ्य - एक पूर्व-शर्त हैं, वह देश की राजनीतिक सोच में नदारद है। भारत में रक्षा सामग्री, मेडिकल उपकरण, सेमीकंडक्टर, कंप्यूटर, वाहन, हवाई जहाज और समुद्री जहाजों के आयात पर खरबों-खरबों रुपये खर्च रहे हैं। यह इसलिए कि स्वदेशी अनुसंधान एवं विकास सुविधाएं नगण्य हैं। पहले ही बहुत देर हो चुकी हैं, अपने उद्योगों का आधुनिकीकरण युद्धस्तर पर करना ज़रूरी है और इसकी राह शिक्षा एवं स्वास्थ्य से होकर है। भारत सरकार उद्योगों के आधुनिकीकरण में निवेश करने को निजी क्षेत्र की मुख्य भूमिका बनवाने में सफल नहीं हो पाई।

 कैसी विडंबना है कि जिस रूस और अन्य पश्चिमी मुल्कों से हम खरबों डॉलर का आयात कर रहे हैं उन्हीं से तकनीक देने को कह रहे हैं ताकि वे वस्तुएं भारत में बन सकें, पर इसमें सफलता न्यून रही। कंप्यूटिंग क्षमता की बात करें तो आज भी हमारे पास सुपर कंप्यूटर नहीं है और सेमीकंडक्टर के क्षेत्र में तो हमारी स्थिति उस बच्चे की मानिंद है जो अभी चलना सीख रहा है। दवा क्षेत्र में, मुख्य घटक सामग्री और नवीनतम खोज के लिए हम अभी भी चीन और पश्चिमी मुल्कों पर निर्भर हैं।

कहने को हमारे पास आईआईटी, आईआईएम, एम्स जैसे विश्वस्तरीय संस्थान हैं, लेकिन हमारी जरूरत के हिसाब से बहुत कम हैं और बड़ी बात यह कि यहां से प्रशिक्षित होकर निकली प्रतिभाओं को हम उचित माहौल देकर देश में नहीं रोक पा रहे। इन संस्थानों से पढ़कर निकले अधिकांश स्नातक उच्च शिक्षा या रोजगार के लिए पश्चिमी देशों का रुख करते हैं। भारत में वैसा माहौल और अवसर नहीं हैं कि  देश की प्रतिभा स्वदेश में रहना चुनें। । यह ब्रेन-ड्रेन देश का बड़ा घाटा है। ध्यान का केंद्र उद्योगों और विश्वविद्यालयों के बीच साझेदारी बनाने और अनुसंधान के लिए सरकारी धन मुहैया करवाने पर हो। विकसित देशों में यही युक्ति कारगर रही है, जहां पर वे आपसी तालमेल से चलते हैं।हमारे यहाँ राजनीति गडे  मुर्दे उखाड़ने और आलोचना में व्यस्त है।