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मोदी की जुबान बन गई है न्यू इंडिया  की  शान, नेताओं के लिए सबक का बड़ा पैगाम-सरयूसुत मिश्र

सार

भारतीय राजनीति में दशकों बाद एक नई बात हुई है| देश के प्रधानमंत्री ने अपने शब्द और  जुबान पर भरोसे का “दाव” लगाया है| अभी तक तो राजनेताओं को लेकर भरोसा शब्द अपना मतलब ही खो चुका था| ये वो दौर है जब नेताओं के लिखे शब्द और वायदे पर लोगों को ऐतबार नहीं है| तब मोदी ने धारा 370 की समाप्ति के 4 साल बाद जम्मू कश्मीर जाकर कश्मीरियों से दूरियां मिटाने के लिए अपने शब्दों और जुबान को कसौटी पर रखा..!

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विस्तार

आज देश में विभिन्न धर्मों के बीच दूरियां बढ़ रही हैं| कश्मीर में तो धारा-370 की समाप्ति के बाद से ही समुदायों के बीच दूरियां बढ़ाने की कोशिशें हुई| लेकिन अब धीरे-धीरे परिस्थितियां बदल रही हैं| लोगों के दिल बदल रहे हैं| राज्य के विकास का चेहरा बदल रहा है| विकास की नई इबारत लिखी जा रही है| युवाओं में भरोसा बढ़ रहा है| मोदी ने राजनीति में  नेतृत्व के प्रति विश्वास का इतिहास रचा है| आज ऐसा माहौल है कि मोदी है तो विश्वास है कि हर चीज मुमकिन है|

मोदी ने अपने शब्द और जुबान पर भरोसे का दाव कश्मीरियों के साथ देश की राजनीति और नेताओं को पैगाम देने के लिए भी किया है| आज देश में राजनीति और राजनेताओं के प्रति विश्वास में कमी तो छोड़िए अविश्वास का वातावरण बना हुआ है| राजनीति ने न केवल देश का दिल तोड़ा है, बल्कि जाति, धर्म का दुरुपयोग कर देश के पॉजिटिव पक्ष को भी नकारात्मक स्वरूप देने का प्रयास किया है|

डेमोक्रेसी की दलीय व्यवस्था में राजनीतिक दल और दलों के नेताओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती है| पक्ष विपक्ष दोनों के नेतृत्व, देश के विकास के लिए सामूहिक रूप से जिम्मेदार माने जाते हैं| लेकिन राजनीति आज स्वार्थ के कारण राजनीति का ही नुकसान कर रही है| विपक्ष को पक्ष के हर अच्छे बुरे काम की आलोचना करना मजबूत लोकतंत्र की निशानी नहीं है|
देश के विभिन्न राज्यों में राजनेताओं की जुबान और शब्द तो छोड़िए, घोषित किए गए वचन पत्रों, संकल्प पत्र और घोषणा पत्र का वजूद समाप्त जैसा हो गया|

राजनीतिक दल कुछ भी कहें लेकिन पब्लिक भरोसा नहीं करती| यह भरोसा क्यों टूटा है? यह अविश्वास एक दिन में पैदा नहीं हुआ| वर्षों तक वायदे करना और तोड़ते रहना, राजनीति  की पद्धति बन गई| चुनाव आए तो वायदों की झड़ी लगा दी गई| सरकारें बनी और वायदों को भुला दिया गया| कहीं-कहीं तो ऐसा भी हुआ है कि वायदों के खिलाफ जाकर सरकारों ने काम किया है| संसदीय शासन प्रणाली में राजनीतिक दलों पर भरोसा कर कई लोग बाद में ठगे हुए महसूस करते रहे|

“कोई भरोसे के लिए रोया, तो कोई भरोसा करके रोया” 

भारत की सनातन संस्कृति आस्था और विश्वास पर ही टिकी हुई है| हमारे भगवान में हमारी आस्था हमारा स्वभाव है| भारतीय जीवन पद्धति  का स्वभाव भरोसे पर आधारित है| उल्टे उल्टे काम और शब्द भरोसे को तोड़ते रहे हैं| “लंबी जुबान ढीली कमान” नेतागिरी की सफलता का फार्मूला बन गया है|  

ईश्वर ने इंसान को भूलने की जो अद्भुत शक्ति दी है| उसका लाभ सबसे ज्यादा राजनेताओं ने उठाया| पांच  साल तक राजनेता कुछ भी करते हैं, कुछ भी कहते हैं| लेकिन चुनाव के समय ऐसा माहौल बनाया जाता है कि सब कुछ स्वर्णिम हुआ है और सब कुछ स्वर्णिम होगा,  क्योंकि लोग भूल जाते हैं इसलिए नेता अपनी चाल में सफल भी हो जाते हैं|

पक्ष अपने काम को स्वर्णिम बताता है तो विपक्ष बंटाधार बताता है| सत्त्त्ता के लिए संघर्षरत विपक्ष सही कामों को भी गलत बताने में जुट जाता है| इस प्रवृत्ति से भी राजनीति और समाज का बड़ा नुक्सान होता है| आजकल एक और ट्रेंड चल रहा है जिसमें नेताओं के डायलॉग अतिरंजित होते हैं|

जनता के बीच में जो बोला जा रहा है वह पूरा नहीं होगा, लेकिन फिर वही बोला जा रहा है| क्योंकि डायलॉग कैची होगा तो मीडिया में हेडलाइन बनेगी| किसी भी नेता के चुनाव से लेकर सरकार में आने और अगले चुनाव में जाने के बीच दिए गए सारे “स्टेटमेंट” पर रिसर्च किया जाए, तो पाया जाएगा कि जानबूझकर, ऐसी बात कही गई थी जिसको पूरा करना टार्गेट नही था| ऐसे तरीके न केवल लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था पर चोट जैसा है, बल्कि राजनीतिक नेताओं के प्रति अविश्वास को बढ़ाता है|

न्यू इंडिया में पार्टियों से ज्यादा लीडरशिप “क्रेडिबिलिटी” को महत्व दिया जा रहा है| मोदी इस मामले में एक क्रेडिबल नेतृत्व के रूप में देश में अपनी आम स्वीकृति हासिल कर चुके हैं| नेता किसी भी दल के हों, उन्हें अपनी जुबान के प्रति सचेत रहने की आवश्यकता होती है| आज ज्यादा बोलने की जरूरत नहीं है| कम बोलकर भी अच्छा काम किया जा सकता है| एक जमाने में इंदिरा गांधी का तो नारा ही था बातें कम काम ज्यादा| आजकल इसका उल्टा हो रहा है, काम कम बातें ज्यादा!  प्रोपेगेंडा और मार्केटिंग आज राजनीति की यूएसपी हो गयी है| 

दिल टूटा तो कुछ नहीं, लेकिन अगर भरोसा टूटा तो सब कुछ टूट गया| राजनीतिक दलों के बीच आपसी छींटाकशी, एक दूसरे को कमतर दिखाने की कोशिश भी राजनीति के प्रति विश्वास को प्रभावित करता है| किसी ने सही कहा है कि प्यार और भरोसा तो ऐसे पंछी हैं अगर इनमें से  एक उड़ जाए तो दूसरा अपने आप उठ जाता है| विश्वास या भरोसा जीतना बड़ी बात नहीं है, विश्वास कायम रखना बड़ी बात है| राजनीति और राजनेताओं को अपनी जुबान और भरोसे को कभी भी नहीं टूटने देना चाहिए| चाहे कुर्सी और पद रहे ना रहे|