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“मंकीपॉक्स” सब में  चेतना जरूरी है

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Wed , 20 Apr

सार

भारत में मंकीपॉक्स के कुछ मामले चेतावनी की तरह उभरे हैं. कुल 75 देशों में लगभग 17000 मामलों की सूचना मिली है, भारत में अब तक 6 केसों की पक्की जानकारी मिली है..!

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विस्तार

प्रतिदिन-राकेश दुबे

03/08/2022

विकसित अमेरिका के केलिफोर्निया राज्य में मंकीपॉक्स के कारण आपातकाल घोषित हो गया है वैसे भी अभी    दुनिया कोविड महामारी से पूरी तरह उबरी भी नहीं है भारत सहित आज भी कुछ देशों में कोविड के नये मामलों की सूचना आना जारी है, भारत में मंकीपॉक्स के कुछ मामले चेतावनी की तरह उभरे हैं । कुल ७५  देशों में लगभग १७००० मामलों की सूचना मिली है। भारत में अब तक ६ केसों की पक्की जानकारी मिली  है।

मंकीपॉक्स का  वायरस कोविड-१९ महामारी बनाने वाले नोवेल सार्स कोव-२ जैसा नहीं है। फिर भी यह उन देशों में भी तेजी से फैला है जहां इससे पहले कभी वजूद में नहीं था। विश्व स्वास्थ्य संगठन के विशेषज्ञों द्वारा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर फैलने की संभावना देखकर इसको अतंर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातकाल घोषित करना पड़ा है। फिलहाल बीमारी का आरंभिक काल है और फैलाव के नए तौर-तरीकों को लेकर डाटा अभी भी बन रहा है। उपलब्ध डाटा और पिछले ज्ञान के आधार पर निगरानी और सार्वजनिक स्वास्थ्य उपाय सुझाए गए हैं। हालांकि, इसकी वैक्सीन पहले से बनी हुई है। इसलिए घबराने की कोई जरूरत नहीं है।

जिस आवृत्ति की यह बीमारी स्वास्थ्य खतरे के रूप में उभर रही है वह पुराने और पुनः जीवित हुए संक्रमणों का लौटना दर्शाता है, खासकर ज़ूनोटिक्स बीमारियां, जो अब दुनिया के परिदृश्य पर छाने को हैं। मंकीपॉक्स पुरानी बीमारी की वापसी है। लगभग ५० साल पहले यह मध्य और पश्चिमी अफ्रीका के करीब १२ देशों में स्थानीय महामारी के रूप में फैली थी। मौजूदा फैलाव कुछ उन देशों तक आ पहुंचा है जहां यह पहले कभी नहीं था।

इस मंकीपॉक्स वायरस के गुण-सूत्र चेचक जैसे हैं। साल १९५९  में मंकी पॉक्स वायरस का पहली बार पता चला था जब प्रयोगशाला में नई दवा के परीक्षणों के लिए लंबी-पूंछ वाले मकाऊ बंदरों का उपयोग किया गया था। यह बात कोपेनहेगन स्थित प्रयोगशाला की है, जिसने सिंगापुर से बंदर आयात किए थे। उस समय विश्व स्वास्थ्य संगठन ने चेचक उन्मूलन कार्यक्रम शुरू किया था, मेडिकल ऑफिसर-इन-चार्ज डीए हैंडरसन ने यह देखने के लिए कि कहीं इंसान से मिलते-जुलते वानरों में भी चेचक वायरस का स्रोत है या नहीं, एक सर्वे किया। यह अध्ययन करना महत्वपूर्ण था क्योंकि यदि जंगलों में वानर आदि जीवों की मार्फत चेचक का वायरस भरपूर मात्रा में व्याप्त है, तो इससे चेचक उन्मूलन कार्यक्रम को खतरा हो सकता है।

पश्चिम की प्रयोगशालाओं में जीव-परीक्षण के लिए १९६०-७० में भारत से बंदर निर्यात किए जाते थे। हैंडरसन ने उन २६ मुख्य प्रयोगशालाओं में अध्ययन किया, जहां पर परीक्षण हेतु रखे बंदरों की खासी तादाद थी। कइयों में मंकीपॉक्स वायरस की उपस्थिति पाई गयी, लेकिन इंसानों में इनकी पैठ हुई नहीं पाई गयी। लेडरले प्रयोगशाला ने लगभग ८०००  बंदरों पर काम किया और रीसस प्रजाति के कुछ बंदरों में मंकीपॉक्स वायरस की उपस्थिति पाई गयी, जो भारत से गए थे। अमेरिका की एक दवा कंपनी वईथ लैबोरेट्री ने भी पाया कि भारत से प्राप्त बंदरों में मंकीपॉक्स वायरस हैं। यही अब भारत के लिए चेतावनी का विषय है |

इंसानों में मंकीपॉक्स का पहला मामला१९७० के दशक में अफ्रीका के कांगो में पाया गया, जब विश्व स्वास्थ्य संगठन के सदस्य वहां पर चेचक उन्मूलन कार्यक्रम के सिलसिले में वहां थे। उस इलाके में बंदर का मांस स्थानीय लोगों में एक विशिष्ट व्यंजन है। इस बीमारी से ग्रस्त देशों से इतर पहला मामला वर्ष २००३  में अमेरिका से उजागर हुआ। जानवरों में तरह-तरह के पैथोजन और वायरस का भंडार होता है। कई बार यह वायरस दूसरी प्रजातियों में पैठ बनाते हैं और इंसानों में भी घर कर लेते हैं। पिछले कुछ सालों में हमने अनेकानेक ज़ूनोटिक बीमारियां जैसे कि एवियन इन्फ्लुएंज़ा, सार्स, पैंडेमिक इन्फ्लुएंजा एच१ एन१ , एमइआरएस-कोव, इबोला और सार्स कोव-२ का फैलाव मानवों में होते देखा है। इंसान और जानवर के बीच बढ़ती निकटता के पीछे एक बड़ी वजह वन-कटाव और मांसाहार में वृद्धि के अलावा वन्य जीवों को पालतू बनाना है। पिछले कुछ सालों में भारतीयों में भी जंगलों में पाए जाने वाले दुर्लभ पशु-पक्षियों को घर में बतौर पालतू रखने की रुचि बढ़ी है। कई जगहों पर इंसान और उसके पशुधन के आसपास बंदर और कुत्ते काफी नजदीकियों में रहते हैं। यात्रा, बदलती भोजन रुचियां और पशु-मांस के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में वृद्धि से नए संक्रमण वाहकों का खतरा बढ़ने लगा है।

भारत में राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र ने तमाम सूबों और केंद्रशासित प्रदेशों को राज्य और जिलास्तरीय ज़ूनोटिक कमेटियां बनाने के निर्देश जारी कर रखे हैं, किंतु सभी राज्यों के पास इसके लिए यथेष्ट तंत्र नहीं है। पशु-पालन, और वन्य-जीवन विभागों के बीच आपसी समन्वय को सीध में लाने की कमी है। विभिन्न स्तरों पर तकनीकी सामर्थ्य की भी कमी है।इस चेतावनी के मद्देनजर  ‘एकीकृत व्याधि’ निगरानी कार्यक्रम को आगे सुदृढ़ करना आवश्यक है।