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आत्म अभिमान से बड़ा है राष्ट्र स्वाभिमान

सार

आजादी के 75 साल के अमृत-महोत्सव में राष्ट्र के हर नागरिक को जोड़ने का अभियान है, हर घर तिरंगा अभियान। तिरंगा राष्ट्र के अभिमान और स्वाभिमान का प्रतीक है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने हर-घर तिरंगा अभियान शुरू किया है तो उसका विरोध न हो, यह कैसे हो सकता है? पीएम मोदी की सरकार है सिर्फ इसलिए ही तिरंगे को मोदी-रंगा क्यों देखा जा रहा है? तिरंगा को नेहरू-रंगा और मोदी-रंगा बनाने की सोच राष्ट्रीय शर्म का प्रतीक ही कही जाएगी। 

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विस्तार

कांग्रेस की ओर से नरेंद्र मोदी और संघ को इंगित करते हुए यह कहा जा रहा है कि जिसका आजादी की लड़ाई में कोई योगदान नहीं था, वह पार्टी आज घर-घर तिरंगा अभियान का पाखंड कर रही है। भारत जोड़ो अभियान का नारा देने वाली कांग्रेस तिरंगा के नाम पर विभाजन की राजनीति करके राष्ट्रवाद के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को क्या तिलांजलि देना चाहती है?

अगर यह मान भी लिया जाए कि भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का आजादी की लड़ाई में योगदान नगण्य था, तो भी उनके देशप्रेम और देशभक्ति पर क्या आज सवाल उठाया जा सकता है? बदले हुए भारत में आज नेतृत्व आजादी के बाद वाली पीढ़ी के हाथ में पहुंच चुका है। आज हर क्षेत्र में नए-नए युवा कीर्तिमान रच रहे हैं। ऐसे में किसी के पूर्वज अगर खिलाड़ी नहीं थे तो क्या आज उस परिवार के युवाओं को देश के लिए गोल्ड मेडल लाने का हक नहीं है? 

बीजेपी और संघ आजादी की लड़ाई में थे या नहीं थे, इस पर विवाद हो सकता है लेकिन आज देश के बहुमत ने देश के शासन का झंडा संघ विचारधारा में पुष्पित-पल्लवित नेतृत्व के हाथ में ही सौंप रखा है। आजादी की लड़ाई में योगदान के नाम पर कांग्रेस द्वारा बीजेपी और संघ के सवाल, क्या भारतीय विवेक पर प्रश्न उठाना नहीं है? 

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ 2002 से पहले अपने मुख्यालय पर राष्ट्रीय ध्वज की बजाए भगवा ध्वज फहराता था, इसको भी राजनीति का मुद्दा बनाया जाता है। जब 2002 में फ्लैग कोड में परिवर्तन किया गया, उसके बाद ही निजी आवास और संस्थाओं पर तिरंगा फहराने की अनुमति मिली। जब से अनुमति मिली है तब से आरएसएस द्वारा तिरंगा झंडा फहराया जा रहा है, फिर भी सवाल क्या देश के साथ राजनीतिक बेईमानी नहीं मानी जाएगी?

सांसदों द्वारा दिल्ली में निकाली गई तिरंगा रैली का कांग्रेस सहित सभी विपक्षी दलों ने एक तरह से बहिष्कार किया। तिरंगा रैली में भाग नहीं लेने से कोई उन्हें राष्ट्रीय ध्वज का विरोधी तो नहीं कह सकता। इसके बावजूद कुछ बातें ऐसी होती हैं, जिसमें एक तरफ कुआं एक तरफ खाई की स्थिति होती है। हर-घर तिरंगा अभियान भी विपक्ष के लिए कुछ ऐसा ही साबित होता दिख रहा है। 

कम्युनिस्ट पार्टी ने भी इस अभियान को केरल में लागू करने के आदेश दिए हैं। केवल कांग्रेस के नेता ही हर-घर तिरंगा अभियान में जितनी भी भागीदारी कर रहे हैं उसमें यह दावा करने के प्रयास जरूर किए जा रहे हैं कि तिरंगे पर कॉपीराइट केवल कांग्रेस का है। कांग्रेस के शीर्ष नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी अपनी डीपी में जवाहर लाल नेहरु के साथ तिरंगा लगाकर यही संदेश दे रहे हैं। यह हमेशा याद रखा जाना चाहिए कि झंडा नेहरू के हाथ में हो या मोदी के हाथ में उसके रंग एक ही हैं और उसकी महत्ता भी उतनी ही है।  

कांग्रेस के मुताबिक, वर्तमान सरकार को तो जैसे तिरंगे पर कोई अभियान करने का नैतिक अधिकार ही नहीं है। राष्ट्रीय ध्वज को जब देश में पहली बार अपनाया गया था, उस समय सरकार का नेतृत्व कांग्रेस के ही हाथ में था। राष्ट्रीय ध्वज के निर्माता को क्या राष्ट्रीय सम्मान अभी तक दिया गया है? 1947 में संविधान सभा ने तिरंगे के मौजूदा स्वरूप को स्वीकार किया था, तिरंगे का मूल डिजाइन आंध्र के पिंगली वेंकैया ने 5 साल तक 30 देशों के झंडों का अध्ययन करने के बाद 1921 में तैयार किया था। उस समय उसमें ऊपर लाल रंग था और बीच में चरखा। संविधान सभा ने लाल की जगह केसरिया और बीच में चरखे की जगह चक्र कर दिया था। कांग्रेस इतने समय तक सरकार में रही, कभी तिरंगे के निर्माता को याद किया गया? आजाद भारत में पैदा होने वाले नरेंद्र मोदी की सरकार में ही वेंकैया पर डाक टिकट जारी किया गया। 

तिरंगा हमारी आन-बान और शान है। राजनीति अपनी जगह हो सकती है लेकिन तिरंगे पर राजनीति और वह भी कांग्रेस की ओर से करना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण लगता है। भारत की राजनीति का यह पहलू शर्मसार करने वाला है कि हाथ में तिरंगा लेकर सत्ता की राजनीति के खिलाड़ी सब तरह के खेल खेलते हैं। सत्ता की राजनीति में जो भी शासन में मंत्री और अन्य पदों पर होता है उसके वाहन और घर में तिरंगा लगा होता है, जिस भवन से सरकार चला करती हैं उसमें भी सबसे ऊपर तिरंगा लहराता हुआ दिखाई पड़ता है। यह विडंबना ही है कि सारी अनियमितता, शोषण और भ्रष्टाचार का गंदा खेल भी तिरंगा लगे इन भवनों में ही खेला जाता है। राजनीति के खिलाड़ियों के घरों में जो भी करोड़ों रुपए पकड़े जाते हैं वह भी तिरंगे की आड़ में ही कमाए गए हैं। 

हर घर तिरंगा अभियान सफल करना हर नागरिक का कर्तव्य है, न केवल तिरंगा फहराना बल्कि तिरंगा हासिल करने के लिए जिन करोड़ों शहीदों ने अपना बलिदान दिया है उनकी भावनाओं के अनुरूप देश को आगे बढ़ाना है। केवल तिरंगा फहराने की औपचारिकता से कुछ नहीं होने वाला, एक ओर तिरंगा फहराया जाता रहे और दूसरी ओर जनता के संसाधनों की लूट होती रहे, ये अब नहीं चल पायेगा। राजनीति तो सब कुछ बांटने पर आमादा है, कम से कम राष्ट्रीय ध्वज को तो राजनीति से ऊपर ही रहने देना चाहिए।