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गर्मी से निपटने की कोई सरकारी योजना नहीं

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Sat , 25 Jul

सार

गर्मी से खेतों में काम करते किसान और श्रमिक, खुले में काम करते श्रमिक और सडकों पर रिक्शा चलाकर या फिर सामान बेचकर गुजारा करते लोग सबसे अधिक प्रभावित होते हैं..!

janmat

विस्तार

कितना बड़ा दुर्भाग्य है कि देश में आबादी को अत्यधिक गर्मी से बचाने के उपायों पर सरकारें खूब वाहवाही लूटती हैं पर सच तो यही है कि यहाँ जनता को गर्मी से मरने के लिए छोड़ दिया जाता है। गर्मी से सबसे अधिक प्रभावित गरीब आबादी होती है। खेतों में काम करते किसान और श्रमिक, खुले में काम करते श्रमिक और सडकों पर रिक्शा चलाकर या फिर सामान बेचकर गुजारा करते लोग सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। बाढ़ और चक्रवात के समय तो आपदा प्रबंधन की टीमें सक्रिय रहती है और राहत और बचाव का कार्य किया जाता है, पर अत्यधिक तापमान के समय ऐसा कुछ नहीं किया जाता और ना ही इससे मरने वालों को कोई मुवावजा दिया जाता है।

यूनिसेफ की एक ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार दक्षिण एशिया– जिसमें भारत, पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान शामिल हैं – के तीन-चौथाई से अधिक, यानि 76 प्रतिशत, बच्चे अत्यधिक गर्मी की चपेट में हैं। अत्यधिक गर्मी से प्रभावित बच्चों की यह संख्या दुनिया के किसी भी क्षेत्र से अधिक है। अत्यधिक गर्मी बच्चों की बीमार कर रही है, उनकी गतिविधियों और शिक्षा का दायरा संकुचित कर रही है, और अनेक बच्चों के लिए जानलेवा भी साबित हो रही है। वयस्कों के मुकाबले बच्चों में गर्मी का अत्यधिक घातक प्रभाव होता है। यह रिपोर्ट वर्ष 2020 में तापमान के आंकड़ों के आधार पर तैयार की गयी है। इस रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक स्तर पर लगभग एक-तिहाई, यानि 32 प्रतिशत बच्चे अत्यधिक तापमान की चपेट में हैं।

जब किसी वर्ष में 83 दिनों से अधिक औसत तापमान 35 डिग्री सेल्सियस से अधिक रहता है, तब उसे मौसम वैज्ञानिक एक्सट्रीम टेम्परेचर, यानि अत्यधिक तापमान कहते हैं। यह स्थिति साल-दर-साल दक्षिण एशिया में देखी जा रही है और तापमान वृद्धि के कारण आने वाले वर्षों में यह स्थिति पहले से अधिक भयानक होती जायेगी। इस वर्ष वैश्विक स्तर पर जुलाई का महीना किसी भी वर्ष के किसी भी महीने से अधिक गर्म था और 4 जुलाई को वैश्विक औसत तापमान इतिहास के किसी भी दिन से अधिक था। दक्षिण एशिया में वैश्विक स्तर पर सर्वाधिक तापमान नहीं रहता, पर अधिकांश गरीब आबादी के कारण बढ़ाते तापमान का प्रभाव व्यापक रहता है। दक्षिण एशिया के देशों में 28 प्रतिशत से अधिक बच्चे वार्षिक स्तर पर औसतन 4.5 दिनों से अधिक लू का सामना करते हैं, जबकि वैश्विक स्तर लू झेलने वाले बच्चों की संख्या 24 प्रतिशत से कम है।

वैज्ञानिकों के अनुसार अत्यधिक गर्मी पूरी आबादी को प्रभावित करती है, पर गर्भवती महिलाएं, शिशु, बच्चे, कुपोषित आबादी और बुजुर्ग इससे सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। इस वर्ष दक्षिण एशिया में शुरुआती चरम गर्मी के दौर के बाद से बारिश और बाढ़ की आपदा है। बारिश से गर्मी के स्वास्थ्य पर प्रभावों में बढ़ोतरी हो जाती है क्योंकि इस समय बढ़े तापमान के साथ हवा में बढ़ती आर्द्रता तापमान का असर बढ़ा देती है। इस वर्ष जून के महीने में भी दक्षिण एशिया के अनेक हिस्सों में बाढ़ की विभीषिका थी और इन क्षेत्रों में 8 लाख से अधिक बच्चे चरम गर्मी से प्रभावित थे। बच्चों में अत्यधिक तापमान का असर केवल शारीरिक ही नहीं होता बल्कि इसका मानसिक असर भी होता है। अत्यधिक गर्मी में गर्भवती महिलाएं भी प्रभावित होती हैं और ऐसी अवस्था में मरे बच्चे या फिर समय से पहले बच्चे पैदा होने की संभावना बढ़ जाती है।

 वर्ष 2022 में भी यूनिसेफ ने एक रिपोर्ट में कहा था कि दुनिया में हरेक वर्ष 5 लाख से अधिक बच्चों की मौत का कारण अत्यधिक तापमान है। वर्ष 2020 में एशिया और अफ्रीका के 23 देशों में 74 करोड़ बच्चे अत्यधिक गर्मी से प्रभावित हुए, पर अगले ही वर्ष यह प्रभाव 36 देशों के 82 करोड़ बच्चों पर पड़ा। इससे यह तो स्पष्ट है कि हरेक आने वाले वर्ष में पिछले वर्ष की तुलना में अत्यधिक तापमान का दायरा बढ़ता जा रहा है, और साथ ही इससे प्रभावित होने वाली आबादी की संख्या भी।

इस रिपोर्ट के अनुसार जलवायु परिवर्तन और इससे होने वाली तापमान वृद्धि से केवल बच्चों का स्वास्थ्य ही नहीं प्रभावित होता है, बल्कि इससे बच्चों के अधिकारों का भी हनन होता है। अनुमान है कि वर्ष 2050 तक दुनिया का हरेक बच्चा अत्यधिक तापमान से प्रभावित होने लगेगा, जबकि वर्तमान में प्रभावित बच्चों की संख्या एक-चौथाई है। तापमान वृद्धि के कारण सूखा और अकाल का दायरा बढ़ता जा रहा है, और इससे प्रभावित जनसंख्या दूसरे स्थानों पर पलायन कर रही है। बच्चे सूखा और पलायन का दंश भी झेल रहे हैं।