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जनता भगवान तभी सत्ता का सम्मान

सार

मध्यप्रदेश में सीधी कांड पर सियासत आज सहजता-सरलता के पायदान पर भावनाओं का उफान ला रही है. भाजपा और कांग्रेस आदिवासी अस्मिता के इस मुद्दे को भविष्य में सत्ता के सम्मान के लिए उपयोग करने में कोई कमी नहीं छोड़ रहे हैं. मानवता को कलंकित करने वाली इस घटना से बीजेपी मायूस थी लेकिन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने डैमेज कंट्रोल के लिए भावनाओं का ऐसा ज्वार पैदा किया जिससे मध्यप्रदेश की सत्ता और जनता के रिश्तों और संवेदना का ऐसा संदेश सामने आया जो राजनेताओं के लिए नजीर बन गया है.

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विस्तार

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने घृणित घटना के पीड़ित दशमत को मुख्यमंत्री निवास पर बुलाकर उसके पांव पखारे और पानी को माथे से लगाया. दशमत का तिलक कर उन्हें शाल उड़ाया और गणेश जी की प्रतिमा भेंट की. किसी भी मुख्यमंत्री से इतने सरल और सहज व्यवहार की अपेक्षा जनता करती जरूर है लेकिन सामान्यतः ऐसा होता नहीं है. ऐसा केवल शिवराज ही कर सकते हैं किसी दूसरे राजनेता में इतना नैतिक बल अब तक तो नहीं देखा गया है कि गरीबों के प्रति दिल की आवाज पर ऐसा किया जाए जो गरीब के दिल को छू जाए.

घटना से आहत दशमत कभी मुख्यमंत्री निवास पर इस तरह के भावनात्मक सम्मान की कल्पना भी नहीं कर सकता था. घृणित अपराध तो बहुत होते रहते हैं लेकिन उस अपराध की क्षमायाचना और पीड़ा को कम करने के लिए मुख्यमंत्री द्वारा भावना का यह प्रकटीकरण शिवराज को राजनेताओं की कतार में अलग खड़ा करता है.

कमलनाथ सीधी कांड पर कल जहां आदिवासी के अपमान की सियासत कर रहे थे वही जब शिवराज ने आज आदिवासी के सम्मान की पराकाष्ठा सीएम हाउस में करके दिखा दी तो फिर भले ही सियासत की संभावनाएं कम हो गई हों लेकिन फिर भी सियासत चालू है. मुख्यमंत्री और दशमत आदिवासी के मिलाप के दृश्य को जहाँ सोशल मीडिया एक तरफ सुदामा और कृष्ण की भावनात्मक मुलाकात निरूपित कर रहा है वही दूसरी ओर इसे अतिरेक और नौटंकी कहने वालों की भी कमी नहीं है.

राजनेता जो कुछ भी करेगा उसमें सियासत होना स्वाभाविक है लेकिन अनुभव तो अभी तक यही बता रहे हैं कि मध्यप्रदेश में ऐसा कोई दूसरा राजनेता किसी भी दल में दिखाई नहीं पड़ता जो इतनी विनम्रता से किसी गरीब आदिवासी को सम्मान और स्नेह देने का दिखावा करने का भी साहस जुटा सके. जो लोग यह कह रहे हैं कि कैमरे के सामने ऐसा करके सियासत की जा रही है वह तो इस तरीके का स्वाभाविक कृत्य कैमरों के सामने भी नहीं कर सकते.

यह पहला अवसर नहीं है जब मुख्यमंत्री ने सहजता और संवेदनशीलता का नायाब उदाहरण पेश किया है. राजनीति आज गला काट स्पर्धा के दौर से गुजर रही है. 18 सालों से कोई व्यक्ति मुख्यमंत्री के पद पर काबिज हो एक बार जनादेश में सरकार गंवाने के बाद फिर से सरकार बनाने का मौका आए और अपनी पार्टी के अलावा दूसरी पार्टी से आने वाले नेता भी उसी व्यक्ति को फिर से अपना सिरमौर बनाने के लिए सहमति दें यह बिना सरलता और सहजता के संभव नहीं हो सकता.

जिंदगी में भावनाओं का बड़ा मोल होता है. कोई दिमाग में क्या सोच रहा है? उसकी क्या रणनीति है? वह उसके कृत्य से ही सामने आती है. आदिवासियों के साथ अत्याचार और अपराध की घटनाएं कई बार होती हुई दिखाई पड़ती हैं. सामाजिक सम्मान के लिए मुख्यमंत्री द्वारा सार्वजनिक रूप से माफी मांगने की यह घटना मध्यप्रदेश में पहली बार हुई है. वैसे तो देश में इतनी सहजता-संवेदनशीलता दिखाने वाला कोई नेता अभी तक देखा नहीं गया है.

कमलनाथ और कांग्रेस भले ही इसे सियासत कहने से चूक नहीं रहे हों लेकिन अगर यह सियासत भी है, डैमेज कंट्रोल भी है तो भी भावनाओं का सबसे बड़ा मोल है. मध्यप्रदेश की वर्तमान सत्ता ने दशमत को सम्मान देकर आदिवासियों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को जो मान दिया है वह अमूल्य है. जहां तक सीधी कांड की घटना का सवाल है इससे मध्यप्रदेश अपमानित हुआ है. शायद मुख्यमंत्री को मध्यप्रदेश के अपमान का दिल से एहसास था इसीलिए उन्होंने पीड़ित को सम्मान देकर अपनी और प्रदेश की पीड़ा और व्यथा को कम करने का प्रयास किया है. अपराधी को कानूनन सजा तो हर हालत में मिलेगी ही.

शिवराज सिंह ने दशरथ के सम्मान के बाद अपनी प्रतिक्रिया में जो संदेश दिया है वह भी प्रशासन और शासन के लिए बहुत बड़ा है. अगर प्रशासनिक अधिकारी भी इस संदेश को आत्मसात करते हैं तो सिस्टम में सुधार को कोई रोक नहीं सकता। लोकतंत्र में जनता ही भगवान होती है. कहने के लिए तो ऐसा सभी कहते हैं लेकिन जब कभी भी जनता को भगवान जैसा सम्मान देने का मौका आता है तब लोग चूक जाते हैं. शिवराज की यही खासियत है कि वह जन भावनाओं को बहुत बारीकी से समझते हैं और जब भी ऐसा अवसर आता है तब जनभावनाओं के साथ अपने को जोड़कर दूसरे राजनेताओं को पीछे छोड़ देते हैं.

सियासत आज पॉवर और पैसे में अटक गई है. सियासत में  एक छोटा ओहदादार भी अहंकार से भरा हुआ दिखाई पड़ता है. मुख्यमंत्री के पद पर इतने लंबे समय से बैठा कोई व्यक्ति अगर आज भी अहंकारशून्य दिखने की कोशिश कर रहा है तो यह लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत ही कहा जाएगा.

जनता सचमुच में बहुत वेदना सहती है. जनता को चूसने वालों की कमी नहीं है. ‘नर में नारायण’ कहने के लिए तो बहुत अच्छा लगता है लेकिन करने में ‘नारायण भी नारायण’ दिखाई नहीं पड़ते हैं. जनतंत्र में अभिषेक राजा का नहीं प्रजा का होता है. लोकतंत्र के देवता मंदिरों में नहीं कहीं सड़कों पर गिट्टी तोड़ते तो कहीं खेतों और खदानों में काम करते हुए मिल जाएंगे. ऐसी सियासत और राजनेता ही सफल होंगे जो जनता में भगवान का दर्शन करते हैं. वही सत्ता सम्मानित होगी जो जनता को सम्मानित करेगी.