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आम आदमी की जेब काटता “फार्मा” का गोरखधन्धा

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Mon , 20 Apr

सार

याचिका फेडरेशन ऑफ मेडिकल एंड सेल्स रिप्रेजेंटेटिव एसोसिएशन ऑफ इंडिया और अन्य द्वारा दायर की गई है..!

janmat

विस्तार

प्रतिदिन-राकेश दुबे 

05/09/2022

मेरे हाथ में भारत के सर्वोच्च न्यायलय में दायर एक याचिका का संक्षेप है, इस  यचिका से  हर उस आदमी का नाता जुडा है , जो  कभी न कभी बीमार हुआ है |याचिका फेडरेशन ऑफ मेडिकल एंड सेल्स रिप्रेजेंटेटिव एसोसिएशन ऑफ इंडिया और अन्य द्वारा  दायर की गई  है। याचिका के पहले ही पैरा में कहा गया है: “ऐसे तमाम उदाहरण हैं जो दिखाते हैं कि फार्मा क्षेत्र में भ्रष्टाचार किस तरह स्वास्थ्य के बेहतर नतीजों को खतरे में डाल रहा है। चाहे वह एक फार्मा कंपनी का अतार्किक रूप से डॉक्टरों को रिश्वत देकर अपनी दवाएं लिखवाने की बात हो या फिर हेल्थ केयर से जुड़े लोगों को अप्रत्यक्ष रूप से अनुचित फायदा पहुंचाकर अपने उत्पादों की बिक्री बढ़ाने की, आखिरकार जोखिम में तो रोगी का स्वास्थ्य ही होता है|” दुर्भाग्य से देश में  ऐसे मामले  दिन-ब-दिन सामने आ  रहे हैं, सरकार का रवैया समझ से बाहर है |

वैसे यह मामला तब उजागर हुआ, जब जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ और ए एस बोपन्ना की खंडपीठ ने याचिका में किए गए इस अनुरोध पर सरकार को अपना पक्ष रखने को कहा कि कंपनी के अपनी दवाओं या उत्पादों के प्रमोशन और इसके लिए दिए जाने वाले उपहारों के बारे में जो स्वैच्छिक आचार संहिता है, उसे कानूनी जामा पहनाया जाए। ‘डोलो’ की बिक्री में हुई उल्लेखनीय वृद्धि की भी  चर्चा हुई। सबको जानन जरूरी है कियह एक पैरासिटामोल ब्रांड है जो ६५०  मिलीग्राम डोज में आता है। आम तौर पर पैरासिटामोल की ५०० मिलीग्राम की गोलियां आती हैं। कोविड दुष्काल के दौरान डोलो ६५०की बिक्री में काफी तेजी आई। हालांकि कंपनी ने इस बात से इनकार किया है कि उसने मूल्य नियंत्रण से बचने के लिए अपने नुस्खे में बदलाव किया।

इस याचिका अंतर्निहित  भाव के अनुरूप देश में एक  बड़ी बहस चल रही है कि क्या फार्मा उद्योग ने फार्मास्युटिकल मार्केटिंग प्रैक्टिस के लिए समान आचार संहिता (यूसीपीएमपी) के अंतर्गत स्व-विनियमन के पर्याप्त प्रयास किए हैं? यूसीपीएमपी जनवरी, २०१५  से व्यवहार में है और यह फार्मा कंपनियों की अनैतिक प्रथाओं पर अंकुश लगाने का प्रयास करता है, यह प्रयास अभी  तक तो सिर्फ कागजों में है  । यह आचार संहिता मेडिकल रिप्रेजेन्टेटिव के आचार से लेकर विज्ञापन प्रचार, सैंपल, उपहार, आतिथ्य, यात्रा वाउचर या फार्मा कंपनियों द्वारा स्वास्थ्य देखभाल पेशेवरों या उनके परिवारों को दी जाने वाली नकदी के चलन से जुड़ी गतिविधियों को नियंत्रित करता है। हालांकि इनमें से किसी को भी कानूनी तरीके से व्यवहार में नहीं लाया जा सका है |

यह दिलचस्प है कि सरकार अपने पहले के इस रुख से पीछे हट गई है कि इस आचार संहिता को कानूनन बाध्यकारी बनाया जाना चाहिए, जो वह दवाब में नहीं कर सकी । वर्ष २०२० में संसद में एक सवाल के जवाब में सरकार ने माना है  कि इस पवित्र व्यवसाय में व्यापत अनैतिक प्रथाओं से जुड़ी शिकायतों से निपटने का विभाग में कोई प्रावधान नहीं है और फार्मा संघों की नैतिक समिति द्वारा यह सब नियंत्रित किया जाएगा!

इस गोरखधंधे में दवा लिखने के बदले ‘इंसेन्टिव’ देने के चलन को संस्थागत करने का बहुत बड़ा हाथ है। इस श्रृंखला में दवा बनाने वाले, इसे बेचने वाले और इसे लिखने वाले सभी शामिल हैं और सब मिलजुल कर इस गंदे खेल को खेलते हैं। दवा से लेकर चिकित्सीय उपकरण या उपचार प्रक्रिया, स्वास्थ्य देखभाल के हर क्षेत्र में यही सिस्टम काम कर रहा है। इस श्रृंखला में किसी के भी हाथ साफ नहीं। चिकित्सा बिरादरी की एक छोटी-सी टीम ने इस मकड़जाल को तोड़ने की कोशिश जरूर की है, पर गोरखधंधे की बड़ी मछलियों ने उसे अछूत करार दे दिया| 

भारत में फार्म क्षेत्र का बाजार आकार ५०  अरब अमेरिकी डॉलर के आसपास है। इसकी ताकत और पहुंच  भारत की संसद तक है | नतीजतन, इस क्षेत्र को सरकार हाथों-हाथ लेती है और उसने फार्मा सेक्टर की मजबूती के लिए इस मार्च में अगले तीन वर्षों के दौरान ५००करोड़ रुपये की प्रोत्साहन योजना की घोषणा की। फिर भी, यह  साफ है  कि सरकार  दवाओं और  मेडिकल उपकरणों की कीमतों  के इस गोरखधंधे को नियंत्रण में रखने में असफल रही है।