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राजनीतिक चरित्र, छिड़कता हेट स्पीच का इत्र

सार

मध्यप्रदेश के पूर्व मंत्री कांग्रेस के नेता राजा पटेरिया न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिए गए हैं। राजा पटेरिया गुमनामी के अंधेरे में खोए हुए थे लेकिन दो दिन से देश दुनिया के अखबारों और चैनलों में उनका नाम छाया हुआ है। 

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विस्तार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर राजा पटेरिया की टिप्पणी मध्यप्रदेश में सबसे बड़ा राजनीतिक विवाद बन गई है। पटेरिया की पार्टी भी उनका साथ छोड़ चुकी है। कांग्रेस की ओर से कमलनाथ और दूसरे नेताओं ने राजा पटेरिया के बयान की सच्चाई जानने के पहले ही उसकी निंदा और उससे किनारा करने में जो फुर्ती दिखाई वह भी अजीब लग रही है।

राजनीति में बयानों की एक भी लूज़ बाल कई बार पूरा खेल बिगाड़ देती है। मोदी और कांग्रेस के मुकाबले के इतिहास को देखा जाए तो जब भी कांग्रेस की ओर से मोदी पर बयानों की हल्की बाल फेंकी जाती है तब बीजेपी उसे इस ढंग से उठा लेती है कि कांग्रेस चारों खाने चित पड़ जाती है। गुजरात में तो मोदी पर कांग्रेस की टिप्पणी हर बार उसे नीचे की ओर धकेल रही है। 'मौत के सौदागर' से लेकर 'रावण' तक का इतिहास हमारे सामने है।

मध्यप्रदेश में कांग्रेस के राजा ने जो बयान पटका, उससे राजा का तो जो होगा सो होगा लेकिन कांग्रेस का बाजा अगले चुनाव में बजने की भूमिका जरूर तैयार हो गई है। नरेंद्र मोदी मध्यप्रदेश में वैसे भी बीजेपी की ओर से चुनाव में चेहरा रहेंगे। उन पर शुरू हुई हिंसक बयानबाजी चुनाव तक अपने कई रंग दिखाएगी।  संविधान की बात करने वाले राजनीतिज्ञों का चरित्र ऐसा हो गया है कि दिखते तो मित्र हैं लेकिन छिड़कते हेट स्पीच का इत्र हैं।

कमलनाथ अनुभवी नेता है, उन्हें तुरंत समझ आ गया कि मोदी पर राजा पटेरिया की टिप्पणी कांग्रेस के लिए भारी पड़ सकती है। उन्होंने तुरंत उससे पल्ला झाड़ा। वैसे तो कांग्रेस हर मामले में कोई न कोई फैक्ट फाइंडिंग कमेटी बनाती है फिर जाकर कोई स्टैंड क्लियर करती है लेकिन राजा पटेरिया के मामले में ऐसा कुछ नहीं किया गया। 

जो वीडियो वायरल हुआ है, उसमें निश्चित रूप से प्रधानमंत्री को लेकर राजा पटेरिया का बयान आपत्तिजनक है लेकिन उनकी सफाई और वीडियो को देखने के बाद ऐसा लगता है कि उन्होंने गलत ढंग से बात रखी है। पूरी बात सुनने पर तकनीकी रूप से भले ही वह गलत नहीं दिखाई दे लेकिन उनके मुंह से निकली बात उन्हें हवालात पहुंचा चुकी है। 

पुलिस अब जांच कर रही है और मामला प्रधानमंत्री से संबंधित है इसलिए तत्परता से कार्यवाही भी होगी। कानूनी रूप से तो स्थितियां स्पष्ट हो जाएंगी लेकिन इसका राजनीतिक प्रभाव दूरगामी होगा। बीजेपी की ओर से मुख्यमंत्री और गृहमंत्री ने जिस सख्ती के साथ इस मामले को उठाया है, उससे यह संकेत मिल रहा है कि इस पूरे चुनावी साल मोदी पर कांग्रेस की यह टिप्पणी मध्यप्रदेश में एक बड़े मुद्दे के रूप में जीवित रह सकती है। 

राजनीति में ऐसा कहा जाता है कि कोई भी न परमानेंट शत्रु होता है ना मित्र होता है। राजनीतिक शत्रुता और मित्रता अवसर और परिस्थितियों के अनुरूप बदलती रहती है। राजनीतिक दलों में नेताओं के दलबदल की घटनाएं देखकर तो यह कहावत बिल्कुल सही लगती है। ऐसी स्थिति में तो राजनीतिक बयानबाजी ऐसी नहीं होना चाहिए कि दुश्मनी दोस्ती में बदलने पर आंख मिलाना मुश्किल हो जाए। 

राजनीतिक जगत की कथा विचित्र है। देश के लगभग हर राज्य में सत्ता में काबिज पार्टी के नेताओं को विपक्ष के नेताओं के खिलाफ मानहानि के मुकदमे लड़ने पड़ रहे हैं। एक दूसरे पर चुनावी लाभ के लिए ऐसे आरोप लगाए जाते हैं जो सत्य से परे होते हैं। डिफेमेशन केस चुनाव के हथियार के रूप में उपयोग किए जा रहे हैं। मध्यप्रदेश में भी मुख्यमंत्री को कांग्रेस के नेताओं के साथ मानहानि के मुकदमे लड़ने पड़े हैं। मध्यप्रदेश का भी पुराना इतिहास है। उमा भारती और दिग्विजय सिंह द्वारा एक दूसरे पर मानहानि के केस किए गए थे। 

असम के मुख्यमंत्री हेमंत विस्वा सरमा द्वारा दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के खिलाफ मानहानि का मुकदमा लगाया गया है। इस मुकदमे को समाप्त करने के लिए सिसोदिया ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका लगाई जिसे खारिज कर दिया गया। राजनीतिक बहस और आरोप-प्रत्यारोप को अगर व्यक्तिगत मानहानि के स्तर पर ले जाया जाएगा तो निश्चित रूप से इसका दुष्परिणाम तो भुगतना ही पड़ेगा। 

राजनीतिक जगत से ऐसी आशा की जाती है कि वह समाज को मानव धर्म के अनुरूप आचरण दिखाए। पॉलीटिकल लीडर्स समाज में नेतृत्व करने वाले माने जाते हैं लेकिन जिस तरह की राजनीति का चरित्र सामने आ रहा है उससे समाज में सकारात्मकता की बजाय नकारात्मकता का विकास हो रहा है। सत्ता की राजनीति के लिए जीवन मूल्यों को दांव पर लगाया जा रहा है। झूठ पर सच का आवरण आज राजनीतिक मूल्य बन गया है। राजनीतिक लाभ के लिए व्यक्तिगत मान-सम्मान और मर्यादा को ताक पर रख दिया जाता है। संविधान की शपथ जनहित के प्रति प्रतिबद्धता का आधार नहीं रह गई है। 

साधु-संतों और धार्मिक नेताओं की ओर से हेट स्पीच का मामला पहले से ही देश में गरमाया हुआ है। यह मामला सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है। हेट स्पीच से समाज में विभाजन स्पष्ट देखा जा रहा है। भारत जोड़ो और हाथ से हाथ जोड़ो अभियान की परिकल्पना भी हेट स्पीच की पृष्ठभूमि में ही उभरी है। इसके लिए किसी व्यक्ति विशेष या राजनीतिक दल को दोषी ठहराना शायद सही नहीं होगा। बात केवल वक्त की होती है। हर तरफ से हेट स्पीच की बौछार दिखाई पड़ जाती है। 

राजा पटेरिया समाजवादी पृष्ठभूमि के नेता हैं। निश्चित ही वे बुद्धिजीवी हैं। दिग्विजय सिंह की सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं। उन्होंने विधानसभा चुनाव भी लड़े हैं। नरेंद्र मोदी को लेकर उनके वक्तव्य को कांग्रेसी विचारधारा के अवचेतन मन का भाव माना जा सकता है। चुनावी हार का भय जीवन के भय से भी ज्यादा प्रतीत होता है। चुनाव में सफलता के लिए क्या-क्या नहीं किया जाता। भले ही हवालात जाना पड़ा हो लेकिन राजा पटेरिया अपने एक बयान से चर्चित जरूर हो गए। यह चर्चा चुनावी साल की गरमा-गरम चर्चा बनी रहेगी। मध्यप्रदेश में अगर मोदी के मुकाबले चुनाव हुआ तो कांग्रेस अनाथ ही रह सकती है।