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विकासवाद के मोदीमंत्र से बदलती राजनीति-बदलता देश 

सार

नार्थ ईस्ट के चुनाव नतीजे बदलते देश और बदलती राजनीति के साफ संदेश दे रहे हैं. नार्थ इंडिया की पार्टी मानी जाने वाली बीजेपी ने नार्थ ईस्ट में भी अपना पॉलिटिकल हाईवे बना लिया है. हिंदू और हिंदुत्व की राजनीति को बीजेपी की सक्सेस का मंत्र समझने वाले राजनीतिक पंडितों के लिए चुनाव परिणाम आंख खोलने वाले हैं.

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विस्तार

नार्थ ईस्ट के तीनों राज्य त्रिपुरा, नागालैंड और मेघालय ईसाई-मुस्लिम और बौद्ध बहुल राज्य माने जाते हैं. इन सभी राज्यों में सरकार चलाने के बाद दोबारा सत्ता में वापसी करना पूरे देश में बीजेपी की स्वीकार्यता को दिखाता है. ऐसा लगता है कि विकासवाद की मोदी पॉलिटिक्स के सफलतम प्रयोग के कारण बीजेपी पर लगने वाले कम्युनल राजनीति करने का  दौर अब मिट रहा है. इन तीनों राज्यों में हिंदू-मुस्लिम और ईसाई की जातीय राजनीति अस्वीकार की गई है. नार्थ ईस्ट ने विकासवाद की राजनीति पर मोहर लगाई है. जाति धर्म की राजनीति को नकारा गया है.

बीजेपी के साथ ही देश के सभी राजनीतिक दलों व क्षेत्रवाद और क्षेत्रीय दलों के लिए इन नतीजों में सांकेतिक संदेश छुपे हुए हैं. कांग्रेस को पूर्वोत्तर में मजबूत माना जा रहा था लेकिन चुनाव परिणामों ने दिखाया है कि कांग्रेस अपने अब तक के सबसे खराब हालात में पहुंच गई है. रीजनल पार्टीज की क्षेत्रीय भावनाओं को पूरी तौर से मंजूर करने की बजाय इन राज्यों के मतदाताओं ने राष्ट्रीय भावनाओं के साथ अपनी भावनाओं को प्रदर्शित किया है. पूर्वोत्तर राज्य भारत की सुरक्षा की दृष्टि से भी काफी महत्वपूर्ण हैं. इन राज्यों में बहुत लंबे समय से अस्थिरता का माहौल बना हुआ था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी ने इन राज्यों की बुनियादी समस्याओं को हल करने की ओर मजबूती के साथ कदम बढ़ाया है.

पूर्वी भारत देश का एक तिहाई आबादी का प्रतिनिधित्व करता है. तरक्की का शिखर हासिल करने के लिए जरूरी सभी प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक तत्व होने के बावजूद इस अंचल ने पिछड़ेपन का दर्द झेला है. पीएम मोदी ने एक्ट ईस्ट पॉलिसी पर काम चालू किया. पूर्वोत्तर के राज्यों में अधोसंरचना, रेल-सड़क-बिजली और कनेक्टिविटी की योजनाओं को तेजी के साथ लागू किया. जीवन की मूलभूत सुविधाएं पहुंचा कर वहां लोगों के जीवन स्तर को सुधारने का काम भी मोदी सरकार ने किया है. प्रधानमंत्री आवास योजना और आयुष्मान भारत जैसी जनहितैषी योजनाओं का लाभ इन राज्यों में पहुंचाने पर विशेष ध्यान दिया गया है.

बीजेपी के लिए पूर्वोत्तर भारत पर विजय के विशेष मायने हैं. पहली बार जीत और पांच साल सत्ता चलाने के बाद फिर से सत्ता में वापसी आसान नहीं मानी जा रही थी. बीजेपी के खिलाफ कम्युनल पॉलिटिक्स का आरोप लगाते हुए सेकुलर राजनीति का दावा करने वाले दलों ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी. यहां तक कि दशकों तक एक दूसरे के कट्टर राजनीतिक विरोधी रहे कांग्रेस और वामदलों ने बीजेपी से मुकाबले के लिए गठबंधन कर लिया था. इस गठबंधन को इन चुनावों में नकार दिया गया है. 

बेमेल गठबंधन की राजनीति कभी भी बेहतर शासन के लिए उपयुक्त नहीं मानी गई है. त्रिपुरा में कांग्रेस और वाम दलों के गठबंधन के चुनाव में तो अच्छे परिणाम आए नहीं लेकिन लोकसभा चुनाव के नजरिए से राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकता के प्रयासों में भी इसके दुष्परिणाम दिखाई देंगे. ममता बनर्जी की टीएमसी ने कांग्रेस और वामदलों के विरुद्ध चुनाव लड़ा. 

पश्चिम बंगाल के राजनीतिक हालातों को देखते हुए ममता बनर्जी ऐसे किसी गठबंधन में शामिल नहीं होना चाहेंगी जिसमें कांग्रेस और वामदल शामिल हों और बिना ममता बनर्जी के कोई भी विपक्षी राष्ट्रीय गठबंधन या तालमेल परिणाम मूलक नहीं हो सकेगा. त्रिपुरा में आदिवासी जनसंख्या को आधार बनाकर स्थानीय भावनाओं को उभारने में तिपरा मोथा पार्टी पहली बार चुनाव में उतरी थी और अच्छा समर्थन हासिल किया है.

उत्तर भारत में तो बीजेपी के मुकाबले में कांग्रेस की स्थिति पहले से ही काफी कमजोर मानी जा रही है. पूर्वोत्तर भारत में जहां कम्युनल राजनीति का कोई स्थान नहीं माना जाता, वहां कांग्रेस की संभावनाएं देखी जा रही थी लेकिन चुनाव परिणामों ने कांग्रेस के लिए बड़ा सेटबैक खड़ा किया है. राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के बाद यह पहले चुनाव हैं. राहुल की यात्रा से कांग्रेस में उत्साह का संचार को देखा गया है. ऐसा माना जा रहा था कि चुनावों में पार्टी बेहतर प्रदर्शन कर सकती है लेकिन ऐसा संभव नहीं हो पाया.

यात्रा का दूसरा चरण अरुणाचल प्रदेश से पोरबंदर तक निकालने की तैयारी चल रही है. धार्मिक नफरत और सांप्रदायिक राजनीति चाहे बीजेपी की ओर से की जाए और चाहे कांग्रेस की ओर से की जाए, इस पर मतदाता सतर्कता पूर्वक अपना मत निर्धारित करता है. विकासवाद राजनीति में उभर रहा है, जो विकास को ईमानदारी से अंजाम देने में सफल होगा वही राजनीतिक दल भविष्य की राजनीति में राज्य और देश के नेतृत्व में सफल हो सकेगा.
 
नरेंद्र मोदी भारत में विकास की राजनीति के प्रतीक बन गए हैं. देश में यह भरोसा मजबूत हो गया है कि उनकी लीडरशिप में विकास की राजनीति को अंजाम दिया जा रहा है. उनके विरोध में जो धार्मिक और सांप्रदायिक विवाद खड़े किए जाते हैं उस पर देश के नागरिकों का भरोसा अब नहीं बचा है. चाहे बीबीसी डॉक्युमेंट्री का विवाद हो या उद्अयोगपति अडानी  के साथ पीएम मोदी को जोड़कर आरोप लगाने की राजनीति हो, इन चुनावों ने यह साबित कर दिया है कि विपक्ष के इन आरोपों पर देश को कोई विश्वास नहीं है. 

नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में जब यह कहा था कि वे 140 करोड़ देशवासियों के भरोसे पर खड़े हैं.  तब विपक्ष ने इसको अति आत्मविश्वासी वक्तव्य माना था लेकिन इन चुनाव परिणामों ने पूरे देश में समान रूप से मोदी के प्रति विश्वास की लहर को स्थापित कर दिया है. ऐसा विश्वास हासिल करना किसी के लिए भी आसान नहीं होता।