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राजनीति बन गई है भ्रष्टाचार की दाढ़ 

सार

राजनीति और भ्रष्टाचार एक ही सिक्के के दो पहलू कहे जा सकते हैं। कोई भी नेता या राजनीतिक दल भ्रष्टाचार के खिलाफ कितनी ही गर्जना करे लेकिन वक्त आने पर सच सामने आ ही जाता है..!

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विस्तार

देश में कई राजनेता हैं जिनकी ईमानदारी पर अभी भी लोग भरोसा करते हैं। यह देश के लिए जरूरी भी है कि यह भरोसा टूटने नहीं पाए। ऐसे ही नेताओं में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का भी नाम शामिल रहा है। इस जुझारू महिला ने अपने दम पर बंगाल में कम्युनिस्ट पार्टी की 40 साल की सरकार को उखाड़ फेंका था। बंगाल के गरीब उन्हें मसीहा के रूप में देखते हैं लेकिन पिछले दिनों प्रवर्तन निदेशालय की छापेमारी में बंगाल में काली कमाई से बना नोटों का जो पहाड़ देश ने देखा है उससे ममता की न केवल छवि प्रभावित हो रही है बल्कि अब उनकी राजनीतिक दहाड़ भी कमजोर होगी, इसमें कोई संदेह नहीं है। 

संसदीय लोकतंत्र में राजनीतिक दल और नेता व्यवस्था संचालित करते हैं। या तो यह लोकतंत्र की कमजोरी है या लोकतंत्र के संरक्षकों की लोकतंत्र के साथ बेईमानी कि भ्रष्टाचार से नोटों का पहाड़ खड़ा कर दिया जाता है। जिसके चलते ही राजनीति अब सम्मान की पात्र शायद नहीं रह गई है। एक दल के नेता दूसरे दल पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हैं। लगता है कि एक दूसरे को भ्रष्ट सिद्ध करने की होड़ में पूरे सिस्टम को ही भ्रष्ट कर दिया गया है। राजनीतिक दलों को लोकतंत्र संचालन के लिए भौतिक शरीर के रूप में माना जाए तो उसकी राजनीति की दाढ़ पूरे सिस्टम को चबाये जा रही है। यह कोई एक राज्य की बात नहीं है हर राज्य में सिस्टम कमोबेश ऐसा ही चल रहा है। 

सरकारी सिस्टम में भर्ती घोटाले अब आम हो गए हैं। हर राज्य में ऐसे प्रकरण सामने आते हैं, जहां भर्ती में गलत लोगों को अवसर दिया जाता है और पात्र लोगों को नकार दिया जाता है। इसके लिए पैसे का लेनदेन होता है और यह लेनदेन कोई बाबू-चपरासी के स्तर तक नहीं रहता। इसके तार तंत्र के ऊपरी स्तर तक जाते हैं। बंगाल में भी शिक्षक भर्ती घोटाले में उच्च न्यायालय के निर्देश पर सीबीआई जांच प्रारंभ की गई। तत्कालीन शिक्षा मंत्री और वर्तमान में टीएमसी के सीनियर नेता उद्योग मंत्री पार्थ चटर्जी को घोटाले के लिए गिरफ्तार किया गया है। 

ईडी की जांच प्रक्रिया में पार्थ चटर्जी की करीबी अर्पिता मुखर्जी के यहां से 21 करोड़ कैश बरामदगी ने बंगाल के लोगों की आँखे खोल दी हैं। इसके पहले भी शारदा घोटाला सहित भ्रष्टाचार के कई मामले प्रकाश में आए थे लेकिन ममता सरकार ने केंद्रीय एजेंसी से जांच की प्रक्रिया को किसी न किसी प्रकार से रोक कर भ्रष्टाचार के मामलों का राजनीतिकरण कर दिया। यह बात इसलिए कही जा सकती है क्योंकि न्यायालय के आदेश पर इस जांच में नोटों का पहाड़ मिला है। 

ममता बनर्जी बीजेपी और केंद्र सरकार के खिलाफ शुरू से ही मोर्चा खोले हुए हैं। केंद्र के साथ उनकी टकराहट अप्रिय स्तर तक पहुंचती हुई कई बार देखी गई है। राज्य के राज्यपाल के लिए तो ममता सरकार की ओर से कई बार सामान्य शिष्टाचार का भी पालन नहीं किया गया। बंगाल के लोगों का टीएमसी को पूरा समर्थन है, इसलिए भाजपा के खिलाफ मोर्चाबंदी में विजेता के रूप में वह सामने आती रही है। बंगाल के लोग ममता में अपना एक स्वाभाविक नेता देखते हैं जो ईमानदार छवि रखता है। अब यह नोटों का पहाड़ ममता की राजनीति के लिए हिमालय जैसा खड़ा हो जाएगा, इसको पार करना उनके लिए असंभव नहीं तो मुश्किल जरूर होगा। 

पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट सरकार के समय भ्रष्टाचार और कटमनी के मामले उभर कर आते रहे हैं। उस सरकार के खिलाफ जनाक्रोश को बढ़ाने में ममता सफल हुई थीं। अब वहीं बीमारी उनकी टीएमसी को भी लग गई है। बंगाल में सरकारी तंत्र को राजनीतिक दल के हिसाब से काम करना पड़ता है। ठेका और अन्य सरकारी काम में कट मनी एक आम बात मानी जाती है। भरती घोटाले के माध्यम से सरकारी सिस्टम में अपने लोगों को एडजस्ट करते हैं। बाद में यही लोग सिस्टम का उपयोग अपने राजनीतिक आकाओं के लिए करते हैं। 

ममता द्वारा अभी तक न तो अपने मंत्री को मंत्रिमंडल से हटाया गया है ना पार्टी की ओर से कोई कार्यवाही की गई है। इस मामले का भी राजनीतिकरण किया जा रहा है। यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि केंद्र की एजेंसी की जांच को ममता सही नहीं मानती हैं। ममता जो भी कहें लेकिन अर्पिता मुखर्जी के घर नोटों की जो गड्डियां मिली हैं वह तो सही हैं, उसको तो किसी एजेंसी ने उनके घर में नहीं रखा था। ममता बनर्जी अपने मंत्री के खिलाफ कारवाई में जितनी देर करेंगी उतना उन्हें राजनीतिक रूप से नुकसान उठाना पड़ सकता है। 

कुछ दिनों पहले ही ईडी द्वारा झारखंड में खनिज सचिव महिला आईएएस अधिकारी के यहां छापे में करोड़ों रुपए पकड़े गए थे। हाल ही में झारखंड के मुख्यमंत्री के करीबी लोगों के यहां भी छापे में करोड़ों का कैश मिला है। उत्तर प्रदेश में कन्नौज के एक इत्र व्यापारी के यहां ईडी ने 100 करोड़ रुपए से ज्यादा नकद राशि पकड़ी थी। चाहे महाराष्ट्र हो या दूसरे राज्य हर जगह ईडी ने भ्रष्टाचारियों को पकड़ा है। एक रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 2 सालों में ईडी ने एक लाख करोड़ से ज्यादा की राशि छापों में पकड़ी है। यह जरूर है कि छापों के समय तो ऐसे मामले बहुत तेजी से मीडिया में उछलते हैं लेकिन बाद में उनको भुला दिया जाता है। ऐसे मामलों को आखिर तक फॉलो करना जरूरी होता है ताकि जनधन लूटने वालों को करारा सबक सिखाया जा सके। 

आजकल राजनीति में एक और ट्रेंड बन गया है। विभिन्न राजनीतिक दल एक दूसरे के राजनीतिक विरोध के लिए जांच एजेंसियों को निशाना बनाते हैं। जांच कार्यवाही पर सवाल उठाते हैं और उनको संदेह के घेरे में बता कर भ्रष्ट तत्वों पर कार्रवाई नहीं करते। दिल्ली सरकार के एक मंत्री जेल में हैं। महाराष्ट्र में पूर्व सरकार के दो मंत्री जेल में हैं। बंगाल में भी एक मंत्री जेल में हैं। इन सभी राज्यों में केंद्र सरकार के विरोधी दलों की सरकारें हैं। विरोधी राज्य सरकार केंद्र पर राजनीतिक हमला करती हैं और अपने मंत्रियों के खिलाफ कार्यवाही नहीं करतीं। यह कैसा लोकतंत्र है? भ्रष्टाचार के मामलों के राजनीतिकरण के कारण अरबों रुपए के घोटालों की जांच राज्यों में नहीं हो पा रही है। 

भ्रष्टाचार के मामलों पर राजनीति किया जाना लोकतंत्र के साथ राजनीतिक अपराध माना जाएगा। विभिन्न दलों की सरकारें और विरोधी दल एक दूसरे के खिलाफ समय-समय पर आरोप पत्र जारी करते हैं लेकिन उन पर कोई कार्यवाही आज तक होती दिखाई नहीं पड़ी। आरोप पत्र केवल चुनाव के समय जनता को बरगलाने के काम आता है। 

विरोधी दल केंद्र में काबिज दल के खिलाफ यह आरोप लगाते हैं कि वह जांच एजेंसियों का दुरुपयोग कर केवल विरोधी लोगों को ही टारगेट कर रहा है। यह लोकतंत्र है, आज की सत्ता कल विरोध में आएगी और आज का विरोधी कल सत्ता में आएगा। ऐसे में टारगेट अगर जानबूझकर बनाया जा रहा है तब भी वह बदलता रहेगा और अंततः भ्रष्ट तत्व ही दंडित होंगे। 

राजनीति में भ्रष्टाचार का पथ जो कभी पगडंडी जैसा था अब हाईवे बन चुका है। सभी सरकारों के बजट, क़र्ज़ के जाल में फंसते जा रहे हैं और सरकार चलाने वाले, नोटों का पहाड़ बनाते जा रहे हैं। अभी श्रीलंका में हमने देखा है कि राष्ट्रपति को देश छोड़कर भागना पड़ा और प्रधानमंत्री को जान बचाने के लिए छिपना पड़ रहा है। राजनीतिक जनप्रतिनिधियों के लिए भी अब अपने साथ-साथ जनता और देश की साख पर मंथन का समय है। अगर समय रहते राजनीति को कलंकित होने से नहीं बचाया गया तो इस राजनीति का लंका कांड भी नहीं बचाया जा सकेगा।