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मनभेद की अनीति में बदलती मतभेद की राजनीति 

सार

अडानी मुद्दे पर नादानी राजनीति से आगे बढ़कर रिश्तों को प्रभावित करने लगी है. अब दो पुराने दोस्त राहुल गांधी और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच ट्विटर की तकरार राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बनी हुई है. सियासत में शब्दों की तलवारबाजी ऐसी चल रही है कि रिश्ते भी तार-तार हो रहे हैं..!

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विस्तार

ट्रोल और गद्दार दोनों का मतलब कमोबेश वही होता है जो किसी के रास्ते पर अनावश्यक बाधा पहुंचाए. प्रधानमंत्री मोदी को निशाने पर लेने के बाद राहुल गांधी अब बीजेपी के दूसरे पायदान के नेताओं से भिड़कर न मालूम क्या हासिल करना चाहते हैं. असम के मुख्यमंत्री हेमंत विस्वा सरमा, ज्योतिरादित्य सिंधिया और कांग्रेस छोड़ चुके दूसरे नेताओं के नाम के अक्षर को जोड़कर ट्विटर पर अडानी लिखने की रचनात्मकता प्रदर्शित करने की राहुल की कलाकारी एक बार फिर उन्हें मानहानि के दरवाजे तक पहुंचा रही है.

असम के मुख्यमंत्री ने तो ऐलान किया है कि वह इसके लिए राहुल गांधी के खिलाफ मुकदमा दायर करेंगे. ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भले ही अभी तक इस तरह की कोई बात नहीं कही है लेकिन उनकी प्रतिक्रिया भी बहुत तीखी रही है. सिंधिया ने राहुल गांधी को ट्रोल तक सीमित बता दिया है. इसका मतलब है कि एक ऐसा व्यक्ति जो इंटरनेट पर बिना किसी आशय के अतार्किक कमेंट करता रहता है. आजकल ट्रोल शब्द किसी भी जागरूक और विवेकशील व्यक्ति के लिए मानहानि कारक ही माना जाता है.

ज्योतिरादित्य सिंधिया मध्यप्रदेश में कांग्रेस के नेताओं के साथ मतभेदों के कारण बीजेपी में शामिल हो गए हैं. कांग्रेस छोड़ते समय भी राहुल गांधी या गांधी परिवार के खिलाफ सिंधिया ने कोई कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की थी. राजनीतिक हलकों में यह बात स्पष्ट रूप से मानी जाती है कि सिंधिया परिवार के गांधी परिवार के साथ करीबी तालुकात हैं. ज्योतिरादित्य के पिता माधवराव सिंधिया भी राजीव गांधी के पारिवारिक मित्र माने जाते थे. उनके निधन के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया जब राजनीति में आए थे तब गांधी परिवार ही उनका संरक्षक माना जाता था.

मध्यप्रदेश के राजनीतिक हालातों पर गांधी परिवार से संरक्षण नहीं मिलने के कारण असंतुष्ट हो सिंधिया भले ही पार्टी से बाहर चले गए हों लेकिन उन्होंने गांधी परिवार के साथ अपने रिश्ते और राहुल गांधी के साथ दोस्ताना व्यवहार को कभी दांव पर नहीं लगाया था. अब पहली बार ऐसा महसूस किया जा रहा है कि राहुल गांधी और सिंधिया के बीच तकरार आर-पार तक पहुंच गई है. रिश्तों में सियासी दरार साफ देखी जा सकती है. जिस तरह के शब्दों और बयानों का एक दूसरे के लिए उपयोग किया जा रहा है वह सामान्य नहीं कहा जा सकता.

सिंधिया परिवार हमेशा से सॉफ्ट स्पोकन माना जाता है. राजनीति में भी सिंधिया परिवार का कठोर टिप्पणियां करने का इतिहास नहीं रहा है. ऐसा पहली बार देखा जा रहा है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया ने राहुल गांधी के खिलाफ सीधी और कठोर प्रतिक्रिया व्यक्त की है. इसके पीछे राजनीतिक कारण भी हो सकते हैं. यह भी संभव है कि बीजेपी में सिंधिया को राहुल गांधी से राजनीतिक मुकाबले का टास्क सौंपा गया हो. 

राहुल गांधी इन दिनों राजनीतिक कारणों से ज्यादा ऐसी बातों के लिए विवाद में फंसते जा रहे हैं जिनका कोई भी राजनीतिक मकसद नहीं हो सकता. सिंधिया को लेकर जिस तरह की टिप्पणी अडानी से जोड़कर राहुल गांधी द्वारा ट्विटर पर की गई है वह ना तो राजनीतिक कही जा सकती है और ना ही उसका कोई राजनीतिक मतलब हो सकता है. 

केवल यही कहा जा सकता है कि अडानी के मुद्दे को चर्चा में रखने के लिए ट्वीट करना है तो किसी ने कांग्रेस से बाहर गए नेताओं के नामों के एक-एक अक्षर के सीक्वेंस को देखकर एक रचनात्मक ट्वीट राहुल गांधी की ओर से कर दिया. एक सामान्य व्यक्ति के रूप में राहुल गांधी के ट्वीट का मतलब यही निकाला जाएगा कि जो भी नेता कांग्रेस से बाहर गए हैं उन सबका अडानी ग्रुप में किसी न किसी रूप में निवेश है.

यदि राहुल गांधी के पास इस तरह के तथ्य हैं कि इन नेताओं की पूंजी अडानी ग्रुप में लगी हुई है तो फिर प्रमाण के साथ सामने आना चाहिए. केवल ट्वीट करके किसी पर आक्षेप और अपमानजनक बात करना तो निश्चित रूप से ट्रोलिंग ही मानी जाएगी. राहुल और सिंधिया के बीच तकरार में कांग्रेस के अन्य नेता अपने युवराज के लिए आगे नहीं आएं ऐसा तो हो ही नहीं सकता था. सिंधिया पर गद्दार और न मालूम क्या-क्या टिप्पणियां इन नेताओं द्वारा की जा रही हैं.

राजनीति में भाषा की शालीनता बहुत जरूरी है. दलबदल गैरकानूनी नहीं है. संविधान में दलबदल की व्यवस्था है. उसके तहत विचारों में मतभिन्नता के बाद दल बदलना कोई अपराध नहीं है बल्कि लोकतंत्र की ताकत को कायम रखने के लिए विचारों की दृढ़ता के साथ अगर जरूरत पड़े तो दल बदलने में भी परहेज नहीं करना चाहिए. हालांकि स्वार्थों की पूर्ति के लिए किसी भी दल के साथ बने रहना या दल बदलना लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं कहा जाएगा.

सोशल मीडिया के जमाने में आम इंसान का भी जीवन बदल गया है. आज मेमोरी के लिए कुछ भी याद रखने की जरूरत नहीं है. सोशल मीडिया समय-समय पर मेमोरी से जुड़ी चीजें याद दिलाता रहता है. सोशल मीडिया के कारण राजनीति में भी फेक्ट शीघ्रता और संदर्भ के साथ त्वरित उपलब्ध हो जाते हैं. वैचारिक  टकराव के कारण पार्टी छोड़ने वाले नेताओं के पुराने भाषण और वीडियो को सोशल मीडिया से प्राप्त कर पूर्व के वक्तव्य और वर्तमान की स्थितियों की तुलना कर किसी व्यक्ति को गद्दार या धोखेबाज निरूपित करना लोकतंत्र के हित में नहीं कहा जाएगा.

लोकतंत्र दल से ऊपर है नेता से ऊपर है. लोकतंत्र के विचार की मजबूती के लिए चिंतन मनन और विवेक के साथ हर वक्त खड़े रहना जरूरी है. किसके साथ खड़े रहना है, यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना ताकत के साथ खड़े रहना  महत्वपूर्ण है. राहुल गांधी की राजनीति सांप सीढ़ी का खेल जैसी लगती है. कभी ऐसा लगता है कि वह काफी आगे निकल गए हैं और फिर थोड़े समय बाद ऐसा लगने लगता है कि वह तो फिर नीचे आ गए हैं. 

राजनीति में रिश्ते और मान मर्यादा दलों की सीमाओं से ऊपर होना चाहिए. आजकल ऐसा नकारात्मक वातावरण दिखाई पड़ रहा है जहां राजनेता 24*7 केवल राजनीति की नजर और नजरिया पर काम करते हुए दिखाई पड़ रहे हैं.