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कीर्तिमान फैसला और अपेक्षा की दरकार 

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Mon , 03 Mar

सार

कभी-कभी कोई परिणाम और उसके पीछे की घटना आपको सोचने के लिए सालों तक मजबूर करती है| नागरिक घटना के कारण और परिणाम से कोई सबक लें ,यह उद्देश्य, न्यायपालिका और सरकार का प्रजातंत्र में होता है | यह उद्देश्य सदाशयता से भरा हो, यह समाज की अपेक्षा रहती है और रहेगी | अहमदाबाद में वर्ष 2008 में हुए शृंखलाबद्ध बम धमाकों के दोषियों को आखिर अदालत ने यही तो संदेश दिया है | घटना से प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से जुड़े हाथों को भी इस निर्णय ने कानून के राज का अहसास भी करा ही दिया है।

janmat

विस्तार

-राकेश दुबे 

20/02/2022

यह हमारे देश भारत के इतिहास में अब तक की सबसे बड़ी सजा है | अहमदाबाद ब्लास्ट के 49 दोषियों में से 38 को फांसी और ग्यारह आखिरी सांस तक सलाखों के पीछे कैद, न्याययिक इतिहास का कीर्तिमान बन गया है । तथ्य यूँ हैं -26 जुलाई, 2008 को अहमदाबाद के विभिन्न स्थानों पर सत्तर मिनट के भीतर 22 बम विस्फोट हुए थे। इन धमाकों में५६ लोग मारे गये थे और दो सौ से अधिक घायल हुए थे। यह तबाही का क्रूरतम मंजर था। विशेष जांच टीमों के प्रयास से धमाकों में शामिल 78 लोगों को गिरफ्तार किया गया था। इस मामले में जल्द कार्रवाई को अंजाम देने के लिये बनी विशेष अदालत ने 2022 में 49 लोगों को दोषी पाया, विचार और जल्दी विचार का एक उदहारण यहाँ भी बना । दोषियों पर आर्थिक दंड भी लगाया गया हैऔर इस हादसे घायलों को हर्जाना देने के भी आदेश दिये गये हैं। 

घटना आज भी अहमदाबाद की स्मृति में है, धमाके वाले दिन अहमदाबाद के अस्पतालों, बसों व अन्य सार्वजनिक स्थानों को निशाने पर लिया गया था। हमले से पहले इंडियन मुजाहिद्दीन नाम के संगठन की तरफ से समाचार संस्थानों को मेल भेजा गया था और इसे गोधरा कांड का जवाबी हमला बताया गया था। कोई इस तथ्य को नहीं भूला है कि अहमदाबाद से पहले बेंगलुरू व जयपुर में भी धमाके हुए थे। यही नहीं, अहमदाबाद -धमाके के अगले दिन सूरत को भी धमाके से दहलाने की कोशिश थी, सूरत सिर्फ इसलिए बचा कि २९ बम तकनीकी खामी के कारण फट नहीं पाये थे। इस मामले में अहमदाबाद में बीस व सूरत में १५ मामले दर्ज किये गये थे। भारतीय इतिहास में पहली बार ३८ लोगों को फांसी की सजा सुनाई गई है। इससे पहले राजीव गांधी हत्याकांड में एक साथ२६ लोगों को फांसी की सजा सुनाई गई थी। अहमदाबाद बम कांड में २९ आरोपियों को सबूतों के अभाव में बरी भी किया गया है। दूसरी ओर ४९ आरोपियों को गैर-कानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम के तहत दोषी करार दिया गया है ।

जटिल जांच प्रक्रिया और अदालत की लंबी कार्यवाही के बाद सामने आया यह फैसला आतंक के मंसूबे पालने वाले लोगों के लिये सबक है कि अपराधी कितने भी शातिर क्यों न हों, उन्हें एक दिन कानून के हिसाब से दंड मिलता ही है। वैसे फांसी या उम्रकैद इस अपराध का अंतिम दंड नहीं कहा जा सकता, प्रावधान इंसानी कानून में इतना ही है, उद्देश्य भी साफ़ है -कानून के शासन की स्थापना के लिये मानवता से खिलवाड़ करने वालों को दंडित करना भी जरूरी होता है, यह सबक सबके लिए है । यहां सवाल यह भी उपजता है कि इस हमले की जिम्मेदारी लेने वाले कथित आतंकी संगठन इंडियन मुजाहिद्दीन व प्रतिबंधित स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया कैसी और किस घातक सोच से पैदा होते हैं। तबाही मचाने वालों में इतना दुस्साहस कैसे पैदा होता है कि वे धमाके की जिम्मेदारी खुलेआम ले लेते हैं ।