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रिज़र्व बैंक की नीति और बांड बाज़ार 

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Tue , 20 Jul

सार

भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति की बैठक में नीतिगत दरों में कोई परिवर्तन नहीं हुआ और रीपो रेट दर 6.5 प्रतिशत के स्तर पर स्थिर रही..!

janmat

विस्तार

आरबीआई ने अपने रुख में भी कोई बदलाव नहीं किया है यानी उसके अनुसार मई 2022 से फरवरी 2023 के दरम्यान नीतिगत दर में 250 आधार अंक की बढ़ोतरी के माध्यम से वित्तीय प्रोत्साहन वापस लेने का कार्य अभी पूरा नहीं हुआ है।मौद्रिक नीति समीक्षा के बाद हुई घोषणाएं अनुमानों के अनुरूप ही रहीं। भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति की बैठक में नीतिगत दरों में कोई परिवर्तन नहीं हुआ और रीपो रेट दर 6.5 प्रतिशत के स्तर पर स्थिर रही।

बैठक में दो निर्णय लिए गए। पहला निर्णय सर्वसम्मति से लिया गया, जबकि दूसरे निर्णय पर एमपीसी (मौद्रिक नीति समिति) के छह सदस्यों में पांच ने पक्ष में और एक ने विरोध में मत प्रकट किया। वित्त वर्ष 2023 के लिए मुद्रास्फीति और आर्थिक वृद्धि के अनुमान में कोई बदलाव नहीं किया गया है। एमपीसी की बैठक में लिए गए सभी निर्णय और जो नहीं लिए गए वे भी आशाओं के अनुरूप ही रहे। मगर एक निर्णय ऐसा जरूर रहा जिसने बॉन्ड बाजार में खलबली मचा दी है।

आरबीआई ने नकदी प्रबंधन के लिए खुला बाजार परिचालन (ओएमओ) के माध्यम से सरकारी बॉन्ड बेचने की घोषणा की है। इसका समय और मात्रा का निर्धारण नकदी की स्थिति को देखते हुए किया जाएगा। सितंबर में आरबीआई के कुछ एक हजार करोड़ रुपये के बॉन्ड की बिक्री की थी मगर यह द्वितीयक बाजार में स्क्रीन बेस्ड ट्रेडिंग के माध्यम से हुई थी। ओएमओ बिक्री नीलामी के जरिये होगी।आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास ने अपने वक्तव्य में कहा है, ‘परिस्थितियां थोड़ी पेचीदा है और इन्हें देखते हुए हम सावधानी से निर्णय लेंगे।‘ कुल मिलाकर बॉन्ड की बिक्री बाजार के लिए एक पहेली है।’

ओएमओ प्रणाली नकदी आरक्षी अनुपात (सीआरआर) से थोड़ी अलग होती है। ओएमओ भी नकदी प्रबंधन का एक माध्यम है मगर इसका प्रभाव दो स्तरों पर दिखता है। सबसे पहले तो ओएमओ वित्तीय प्रणाली से नकदी खींचता है और दूसरी तरफ बाजार में बॉन्ड की आपूर्ति बढ़ जाती है क्योंकि आरबीआई बैंकों को इनकी बिक्री करता है। इसका परिणाम यह होता है कि सैद्धांतिक रूप में बॉन्ड पर प्रतिफल में बदलाव आने लगता है।

यही कारण है कि मौद्रिक नीति समीक्षा के बाद इस घोषणा से 10 वर्ष की परिपक्वता अवधि वाले बॉन्ड पर प्रतिफल 12 आधार अंक उछलकर 7.23प्रतिशत से 7.35 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच गया। बॉन्ड प्रतिफल और कीमतें एक दूसरे की विपरीत होते हैं। शक्तिकांत दास ने एक तीर से एक शिकार करने की बात कही। मगर वास्तव में आरबीआई किसी को नाराज किए बिना एक ही उपाय से कई चीजें साधना चाहता है।

ओएमओ के इस्तेमाल से सरकारी बॉन्ड पर प्रतिफल बढ़ जाएगा जिससे अमेरिकी और भारतीय बॉन्ड पर प्रतिफल के बीच अंतर अधिक हो जाएगा। प्रायः देखा गया है कि अमेरिका में बॉन्ड पर प्रतिफल अधिक होने से भारत में आने वाली रकम का प्रवाह थम जाता है, क्योंकि निवेशकों की नजर में अमेरिकी बॉन्ड में निवेश करना अधिक फायदेमंद हो जाता है। विदेशी रकम की आमद कम होने से रुपया कमजोर होने लगता है। पिछले कुछ सप्ताहों से यही हो रहा है।

आरबीआई ओएमओ के माध्यम से बॉन्ड की बिक्री कर विदेशी निवेश में कमी और रुपये में कमजोरी दोनों समस्याओं को दूर करना चाहता है और अपने इस प्रयास में यह अधिक आक्रामक भी नहीं दिखना चाहता है।

इस मौद्रिक नीति समीक्षा का मुख्य ध्यान नकदी प्रबंधन पर रहा है। बैंकिंग प्रणाली में 2,000 रुपये के नोट वापस आने के बाद नकदी की उपलब्धता बढ़ गई है। आरबीआई अधिशेष नकदी हटाने के लिए वेरिएबल रिवर्स रीपो रेट ऑक्शन और विदेशी मुद्राओं की अदला-बदली (करेंसी स्वैप) का सहारा लेता रहा है।

बैंकों को शुद्ध मांग एवं समय देयता (नेट डिमांड ऐंड टाइम लायबिलिटी) में बढ़ोतरी का 10 प्रतिशत तक अतिरिक्त सीआरआर रखने का निर्देश देकर आरबीआई ने 1.1 लाख करोड़ रुपये की अतिरिक्त रकम भी वित्तीय प्रणाली से वापस ली है। आरबीआई ने अगस्त में मौद्रिक नीति समीक्षा में इस अस्थायी प्रावधान की घोषणा की थी। इनमें आधी रकम वित्तीय तंत्र में वापस आ चुकी है। शेष रकम भी एक-दो दिनों में लौट आएगी।