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जीत के हथियार से खुद की हार

सार

रामायण के अनुसार किष्किंधा नरेश बाली को देवराज इंद्र से एक स्वर्णहार का वरदान था, इस वरदान के अनुसार बाली के सामने जो भी योद्धा आता उसकी आधी शक्ति स्वतः ही बाली के शरीर में समा जाती थी..!!

janmat

विस्तार

    पीएम मोदी को जनादेश ने भी ऐसी शक्ति दी है जिसमें विरोधी की जीत का हथियार ही उसकी हार का कारण बन जाता है. इसी बेचैनी में राहुल गांधी मोदी पर निजी हमले कर रहे हैं. यह सभी हमले कांग्रेस के लिए हलाहल साबित हो रहे हैं. राहुल गांधी ने हाल ही में पीएम पर ऐसे निजी आरोप लगाए हैं जो कांग्रेस के लिए हानिकारक साबित हो रहे हैं. 

    राहुल गांधी के आरोप हैं कि पीएम कॉम्प्रोमाइज्ड हैं, डरपोक है उनमें निर्णय की क्षमता नहीं है. पीएम मोदी को राहुल वोट चोर साबित कर रहे हैं. उनकी जीत को संदिग्ध बता रहे हैं. उन पर विदेशी दबाव का निजी आरोप भी लगा रहे हैं, उनके चरित्र पर भी धुंध पैदा करने की कोशिश की जा रही है. एपिस्टीन फाइल्स को उछालने  का उनका नजरिया पाक साफ नहीं है. चीन को लेकर पीएम मोदी को देशद्रोही साबित करने की कोशिश की जाती है, उनको मुस्लिम विरोधी और कम्यूनल कहने में कांग्रेस थकती ही नहीं है. चौकीदार चोर और अडानी-अंबानी से जोड़कर पीएम मोदी की इमेज को खराब करने की हर कोशिश कांग्रेस पर ही उल्टा भारी पड़ जाती है. 

    सोनिया गांधी ने गुजरात चुनाव में मोदी को मौत का सौदागर कहा था, वहां की जनता ने उन्हें अपना सिरमौर बना लिया . वोट चोर गद्दी छोड़ का नारा देते हुए राहुल गांधी ने बिहार में मोदी के खिलाफ अभियान चलाया, बिहार ने मोदी के पक्ष में ऐतिहासिक जनादेश दिया. किसी सरकार की नीतियों और पार्टी की विचारधारा की आलोचना विपक्ष का उत्तरदायित्व है लेकिन नेता पर व्यक्तिगत हमले और चरित्रहनन राजनीति का तकाजा नहीं है.

    सिर्फ नरेंद्र मोदी ही अकेले ऐसे नेता हैं जिन्हें तकनीकी तौर पर सांसदों द्वारा चुनने की बात कही जा सकती हैं लेकिन उन्हें जनादेश ने स्पष्ट बहुमत के साथ प्रधानमंत्री चुना. वे अकेले नेता हैं जो पीएम उम्मीदवार के रूप में चुनाव में गए थे और उन्हें पीएम के रूप में इस देश ने चुना है. उन पर निजी हमला जनमत के विवेक पर हमला है. 

    कांग्रेस की सभा में ‘मोदी तेरी कब्र खुदेगी’ के नारे भी उछलते हैं. कांग्रेस को इसका नुकसान भी उठाना पड़ता है. राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव का राज्यसभा में उत्तर देते हुए पीएम नरेंद्र मोदी ने अपना पूरा भाषण कांग्रेस के इसी नारे के इर्द-गिर्द बुना. उन्होंने अपनी सारी उपलब्धियां जिनको देश ने सराहा, इनको कांग्रेस की इसी नकारात्मक नारे से जोड़ दिया. 

    मोदी को सत्ता थाली में सजा कर नहीं मिली है. इसके लिए उन्होंने संघर्ष किया है. कांग्रेस की सरकारों के संताप भी भुगते हैं. यूपीए की सरकार में गुजरात के सीएम के रूप में उनकी जांच हुई थी, उन्होंने जांच प्रक्रिया का शांतिपूर्ण ढंग से सामना किया था. उनके लिए उनकी पार्टी ने आन्दोलन नहीं किया था. उन्होंने आरोपों पर सर्वोच्च न्यायालय तक लड़ाई लड़ी और क्लीन चिट हासिल की.

    राहुल गांधी उस परिवार की विरासत संभाल रहे हैं जिसने इस देश में लंबे समय तक सरकारें चलाई हैं. जब इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान से युद्ध में बांग्लादेश गठन की पहल की थी तब के नेता विपक्ष अटल बिहारी वाजपेई ने उनकी मुक्त कंठ से सराहना की थी. राहुल गांधी से इस तरह की कोई उम्मीद नहीं की जा सकती है.

    आज तक राहुल गांधी कोई भी आरोप पीएम नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार के खिलाफ साबित नहीं कर पाए हैं. चौकीदार चोर है के मामले में तो सुप्रीम कोर्ट में उन्हें माफी भी मांगनी पड़ी है. संसद और संवैधानिक संस्थाओं के प्रति राहुल का नजरिया कांग्रेस के प्रति विश्वास को बढ़ाने की बजाय कम करने वाला साबित हो रहा है. मोदी पर निजी हमले से हैडलाइन मिल सकती है लेकिन इससे वोट कांग्रेस के बढ़ने की बजाय कम हो जाते हैं.

    कोई भी राजनीतिक दल अपनी रणनीतियों को जनादेश की कसौटी पर बदलता है. अपनी गलती से सबक सीखता है, राहुल गांधी तो जैसे चुनाव जीतने के लिए नहीं मोदी पर निजी हमले करने की राजनीति को प्राथमिकता देते हैं. जब से मोदी सत्ता में है तब से राहुल ऐसा कर रहे हैं. उसका कोई भी असर जनमत पर नहीं हो रहा है फिर भी वे इस पर डटे हुए हैं. अब तो राहुल गांधी सीधे मीडिया पर बीजेपी के हाथों बिके होने का भी आरोप लगाने लगे हैं. 

    राहुल गांधी के मोदी पर निजी हमले और नारों से कांग्रेस फायदे में कम नुकसान में ज्यादा जा रही है. फिर भी न वह समझने को और न बदलने को तैयार है. राजनीति के फोकस में राहुल हो सकते हैं लेकिन जनादेश के फोकस में जब तक वे पार्टी को नहीं ला सकते तब तक उनकी सार्थकता साबित नहीं होगी.

    अब तो कांग्रेस में ही राहुल के खिलाफ आवाज उठने लगी है. मणिशंकर अय्यर जो राजीव गांधी के करीबी दोस्त और लंबे समय तक कांग्रेस सरकारों में मंत्री रहे हैं, अब राहुल गांधी की क्षमता पर सवाल उठा रहे हैं. बकौल मणिशंकर वे नेहरूवादी हैं, गांधीवादी हैं  राजीववादी हैं लेकिन राहुलवादी नहीं है. उनका सीधा मतलब राहुल गांधी की कार्यप्रणाली से कांग्रेस को हो रहे नुकसान की तरफ है.

    मोदी की सक्सेस में उनकी मेहनत, विचारधारा और जनादेश के साथ ही राहुल गांधी का फेल्योर भी है. राहुल की अनगाइडेड मिसाइल कांग्रेस को ही लहूलुहान कर रही है. अपने ही हथियार से कांग्रेस न केवल हार रही है बल्कि वह अपने ही मुंह से निकले जहर से मोदी को तो नुकसान नहीं पहुंचा पा रही है खुद ही जहरीली बनती जा रही है. जनता तो जहरीले तत्वों से वैसे ही दूर रहती है.