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पूर्व मुख्यमंत्रियों की रियासत, बदलती सियासत

सार

राज्य में कोई भी मुख्यमंत्री रहा हो उसकी सियासत और कार्यशैली का इतिहास जुदा-जुदा रहा है. आज मध्यप्रदेश में विपक्ष या सरकार में जो भी नेता नेतृत्व कर रहे हैं वह सभी पूर्व मुख्यमंत्रियों के समर्थक और शागिर्द रहे हैं..!

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विस्तार

एमपी कांग्रेस की सियासत में अर्जुन सिंह ने जो मुकाम हासिल किया था वह मुकाम कम ही राजनेताओं को नसीब होता है. कांग्रेस में अर्जुन सिंह का दौर खट्टे-मीठे अनुभव से भले ही भरा हुआ हो लेकिन वर्तमान कांग्रेस का नेतृत्व अर्जुन सिंह के शागिर्द ही माने जाते रहे हैं. अर्जुन सिंह और कैलाश जोशी के बीच कानूनी लड़ाई शायद मध्यप्रदेश की राजनीति में पहली बार हुई थी. जिसके कारण अर्जुन सिंह को मुख्यमंत्री का पद छोड़ना पड़ा था. चुरहट लाटरी, केरवा कोठी और आसवनी कांड से संबंधित मामलों को अदालत में ले जाकर कैलाश जोशी ने अर्जुन सिंह के खिलाफ ऐसी राजनीतिक धार पैदा की थी जो मिली जुली सियासत की आधुनिक शैली को नामंजूर करती है.

कैलाश जोशी के पुत्र दीपक जोशी को कमलनाथ ने कांग्रेस में शामिल कराया. दीपक अपने साथ कैलाश जोशी की तस्वीर ले गए थे. जिस पर कांग्रेस अध्यक्ष ने कांग्रेस कार्यालय में माल्यार्पण किया. कांग्रेस में चल रही सियासत में शायद अर्जुन की लय बिगड़ गई है इसीलिए कांग्रेस में कैलाश जोशी की जय-जय हो रही है.

निजी स्तर पर सभी दलों के नेताओं के बीच में सौहार्दपूर्ण रिश्ते लोकतंत्र की मांग हो सकते हैं लेकिन जनहित के मुद्दों पर रिश्तों के आधार पर मुखरता या चुप्पी लोकतंत्र के लिए अभिशाप मानी जाती है. आजकल तो राजनीति में मुद्दे केवल बयानों में उठाए जाते हैं. कानूनी कार्रवाई करके मुद्दों पर निर्णायक नतीजों तक पहुंचने से बचा जाता है. चुनाव के समय पक्ष और विपक्ष एक दूसरे पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हैं लेकिन बाद में इन सारे मुद्दों को भुला दिया जाता है.

कैलाश जोशी ने जनता के सामने कोई वायदा नहीं किया था लेकिन जब चुरहट लाटरी का मामला आया तब उन्होंने उसके खिलाफ हाईकोर्ट में लड़ाई लड़ी. दीपक जोशी अपने पिता की ईमानदारी और सच्चाई को पूंजी के रूप में लेकर कांग्रेस में शामिल हुए हैं. कैलाश जोशी की जिस पूंजी ने कांग्रेस के इतिहास को धूल-धूसरित कर दिया था, उस पूंजी से कांग्रेस क्या हासिल कर पाएगी यह कहना मुश्किल है.

एमपी की राजनीति में हमेशा जमीनी नेतृत्व को मौका मिलता रहा है. विरासत की राजनीति यहां बहुत अधिक सफल नहीं हुई है. कांग्रेस में प्रथम मुख्यमंत्री रविशंकर शुक्ला के पुत्र श्यामाचरण शुक्ला जरूर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर पहुंचने में सफल हुए थे लेकिन उसके बाद प्रदेश में जितने भी मुख्यमंत्री बने हैं उनका किसी का भी पिता मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नहीं रहा है. दीपक जोशी सौभाग्यशाली हैं कि उनके पास पूर्व मुख्यमंत्री पिता की विरासत है. 

कैलाश जोशी ने राजनीति में सफलता विरासत के कारण नहीं पाई है. बीजेपी में जितने भी मुख्यमंत्री मध्यप्रदेश में बने हैं उन सभी ने अपने बलबूते पर राजनीतिक मुकाम हासिल किया है. सुंदरलाल पटवा, वीरेंद्र कुमार सकलेचा, कैलाश जोशी, उमा भारती, बाबूलाल गौर और वर्तमान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी राजनीतिक विरासत के कारण राज्य की सियासत में मुकाम हासिल नहीं किया है.

कांग्रेस में भी अर्जुन सिंह, दिग्विजय सिंह जैसे नेताओं ने अपनी मेहनत से ही मुकाम हासिल किया है. कमलनाथ के बारे में भी यही कहा जाता है. उन्होंने तो दूसरे राज्य से आकर छिंदवाड़ा में अपना राजनीतिक घर बनाया और आज कमलनाथ और  छिंदवाड़ा एक दूसरे के पर्याय के रूप में देखे जाते हैं.

दीपक जोशी के कांग्रेस में शामिल होने की ज्यादा राजनीतिक चर्चा इसीलिए हो रही है कि उनके साथ कैलाश जोशी की विरासत शामिल है. पूर्व मुख्यमंत्रियों की विरासत के रूप में अगर उनके परिवारजनों की राजनीतिक स्थितियों का आकलन किया जाए तो मध्यप्रदेश में विरासत की राजनीति लंबे समय तक सफल होती दिखाई नहीं पड़ती. 

कांग्रेस की दृष्टि से अर्जुन सिंह की विरासत अजय सिंह ने संभाली थी. अर्जुन सिंह के निधन के बाद अजय सिंह को अपना स्वतंत्र राजनीतिक वजूद बनाए रखने मे आई मुश्किल साफ देखी जा सकती है. पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ के पुत्र नकुलनाथ और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के पुत्र जयवर्धन सिंह विरासत की राजनीति में सफलतम चेहरे के रूप में देखे जा रहे हैं. इन दोनों युवा नेताओं पर उनके राजनीतिक पिता की छत्रछाया सर्वविदित है. स्वतंत्र रूप से जब ये युवा नेता अपना राजनीतिक अस्तित्व स्थापित करने में सफल होंगे तभी यह माना जाएगा कि विरासत से आगे बढ़कर सियासत उनकी सफलता का आधार है.

बीजेपी में सुंदरलाल पटवा की विरासत सुरेंद्र पटवा संभाल रहे हैं. वह विधायक हैं लेकिन उनका राजनीतिक अस्तित्व भी डांवाडोल ही दिखाई पड़ रहा है. वीरेंद्र कुमार सकलेचा के पुत्र ओमप्रकाश सकलेचा राज्य में मंत्री हैं लेकिन उनका राजनीतिक अस्तित्व स्वतंत्र रूप से स्थापित होने में समय का इंतजार करना उपयुक्त रहेगा. 

कैलाश जोशी की विरासत के उत्तराधिकारी दीपक जोशी ने तो विरासत की सियासत को ही बदल दिया है. कांग्रेस के साथ उनकी सियासत और उसकी संभावनाओं पर भविष्य में ही नतीजे निकाले जा सकेंगे. गोविंद नारायण सिंह के पुत्र ध्रुव नारायण सिंह विरासत की राजनीति में एक चेहरा माने जाते हैं. उनके द्वारा भी राजनीतिक संघर्ष ही किया जा रहा है.

राजनीतिक दलों में दलबदल सामान्य बात हो सकती है. लेकिन अगर विरासत की राजनीति में ऐसा दलबदल हो जिनकी दिशाएं अलग हों तो फिर सवाल उठते हैं. दीपक जोशी ने कांग्रेस में शामिल होते समय जिस तरह की प्रतिक्रियाएं व्यक्त की हैं उससे  साफ दिखाई पड़ता है कि उनका पूरा राजनीतिक नाद ही आहत है. आहत नाद से कभी सत्ता के सुर नहीं साधे नहीं जा सकते.

कैलाश जोशी और कांग्रेस के दिग्गज अर्जुन सिंह के बीच राजनीतिक संघर्ष जिस स्तर पर हुआ था जिसके प्रमाण इतिहास में दर्ज हैं, उस इतिहास को न कांग्रेस बदल सकती है और ना ही दीपक जोशी कांग्रेस में जाकर उसमें कोई फेरबदल नहीं कर सकते हैं. राजनीति में आ रहा बदलाव मुद्दों से ज्यादा व्यक्तियों पर केंद्रित हो गया है. मुद्दे तो गायब से हो गए हैं.

कैलाश जोशी और अर्जुन सिंह के विचार निश्चित रूप से उनके दलों में जीवित होंगे. उन्होंने मुद्दों की जो विरासत अपने-अपने दलों में छोड़ी है उसको बदला नहीं जा सकता. भले ही इन दोनों नेताओं के मुद्दों और सिद्धांतों में सत्ता का कोई सुर नहीं दिखाई पड़ता हो लेकिन इन दोनों नेताओं के इतिहास को उपेक्षित करना दोनों दलों के लिए संभव नहीं है.

बुझा हुआ दीपक जैसे बिना ज्योति के प्रकाश नहीं कर सकता वैसे ही जनता की ज्योति के बिना कोई नेता किसी भी राजनीतिक दल में सत्ता का अंधकार दूर नहीं कर सकता. ऐसी दूरदृष्टि नेतृत्व के लिए बहुत जरूरी है लेकिन राजनीति में दृष्टि इतनी सूक्ष्म और नकारात्मक हो गई है कि दूर तक तो दिखाई ही नहीं पड़ता. ऐसी दृष्टि के परिणाम जब सामने आते हैं तब आशा निराशा में बदल जाती है.