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अमेरिका में सवाल, INDIAN TRUMP का भोपाल में बवाल 

सार

अमेरिका और भारत के बीच अब तक ट्रेड डील पर कोई एग्रीमेंट नहीं हुआ है. राष्ट्रपति ट्रंप की टैरिफ नीति पर अमेरिका में सवाल है. जो डील अभी तक फाइनल नहीं है उस पर भोपाल में राहुल गांधी चौपाल कर विरोध कर रहे हैं..!!

janmat

विस्तार

    राहुल गांधी बिना एग्रीमेंट देश को बेचने का आरोप लगा रहे हैं. किसानों-टेक्सटाइल के हित और डेटा को बेचने का दावा कर रहे हैं. सबसे बड़ा सवाल कि राहुल गांधी को ट्रेड डील के बारे में क्या सीधे अमेरिकी राष्ट्रपति से जानकारी मिली है? अमेरिका में चौतरफ़ा घिरे ट्रंप की बातों पर कांग्रेस आंदोलन कर रही है. ट्रंप पर अमेरिका भरोसा करे ना करे लेकिन भारत में कांग्रेस की पॉलिटिक्स ट्रंप के भरोसे चल रही है. खुद ट्रंप अमेरिकी पार्लियामेंट कांग्रेस से भयभीत हैं, तो कांग्रेस इंडियन ट्रंप राहुल गांधी से अभिभूत है.

    व्यापार राष्ट्रीय संप्रभुता का अभिन्न अंग है. वैश्विक व्यापार समझौते, राष्ट्रीय नीति और राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर किए जाते हैं. भारत ने कई देशों के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौते किए हैं. अमेरिकी ट्रेड डील पर अंतरिम सहमति बनी थी इस बीच अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप की टैरिफ पॉलिसी को अवैध करार दिया. फिर ट्रंप ने अमेरिकी कानून के अंतर्गत टैरिफ लगाने का ऐलान किया. भारत के साथ उनकी ट्रेड डील फाइनल नहीं हुई है. अभी केवल नेगोशिएशन ही चल रहा है,

    भारत सरकार ने संसद में ऐलान किया है कि ट्रेड डील में कृषि और दुग्ध क्षेत्र को प्रोटेक्ट रखा गया है. किसानों के हितों को देखते हुए इनको अमेरिकी बाजार के लिए नहीं खोला जा रहा है. कोई भी देश अपनी जरूरत का हर सामान और उत्पाद उस सीमा तक नहीं पैदा करता जो उसे आत्मनिर्भर बना सके. आजादी के इतने वर्षों बाद भी कई ऐसे क्षेत्र हैं जिनमें भारत को अपनी जरूरत के लिए आयात करना पड़ता है. सरकार और विपक्ष को चिंतन करना चाहिए कि देश में उत्पादन बढ़ाया जाए ताकि आयात की आवश्यकता न पड़े.

    देश की राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश नीति और व्यापार समझौते राष्ट्रीय संप्रभुता, एकता अखंडता के लिए सबसे महत्वपूर्ण हैं इनमें चुनावी राजनीति को नहीं लाया जाता. जब भी कोई ट्रेड डील होती है तो दोनों देशों को अपने कुछ हित त्यागने पड़ते हैं. डील का मतलब यही है कि व्यापार में लाभ का संतुलन निर्मित हो. 

    किसी दूसरे राजनीतिक दल को यह बात इतनी गंभीरता से समझ नहीं आए तो समझा जा सकता है लेकिन कांग्रेस तो भारत में सरकारों का पर्याय रही है. WTO समझौता और न्यूक्लियर डील भी कांग्रेस की सरकारों में ही की गई है. भारत तो अपनी रक्षा जरूरत के लिए भी आत्मनिर्भर नहीं बन पाया है. 

    रक्षा सौदों पर राजनीति बोफोर्स के समय हुई थी और यह कांग्रेस के भीतर से ही खड़ी हुई थी. जो कांग्रेस ट्रेड डील पर सवाल खड़े कर रही है, वह वर्तमान केंद्र सरकार के रक्षा सौदों में आर्थिक गड़बड़ी पर कोई सवाल नहीं खड़े कर पाई है. राफेल डील पर पहली बार राहुल गांधी ने ‘चौकीदार चोर है’ का नेरेटिव खड़ा किया था जिसके लिए उन्हें सर्वोच्च अदालत में माफी मांगनी पड़ी थी.

    अगर सरकार राष्ट्रीय और किसान हित के खिलाफ काम करती है तो विपक्ष का जन आंदोलन खड़ा करना राजनीतिक नहीं बल्कि संवैधानिक दायित्व है. ट्रेड डील पर सरकार तथ्य रखेगी तब देश आकलन करेगा कि राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा की गई या नहीं.

    राष्ट्रपति ट्रंप अमेरिकी कांग्रेस से भले ही भयभीत हों लेकिन भारत की कांग्रेस उन्ही ट्रंप के मुद्दों से अभिभूत है. ट्रंप जब ऑपरेशन सिंदूर को रोकने का दावा करते हैं तब कांग्रेस उनके साथ खड़ी होती है. जब ट्रंप भारत की अर्थव्यवस्था को डेड इकोनामी कहते हैं तो भारत में राहुल गांधी उसको दोहराने लगते हैं.

    सबसे बड़ा विपक्षी दल और देश के विपक्ष के नेता अगर नरेंदर सरेंडर को अपना राजनीतिक नारा बनाते हैं तो यह राष्ट्रीय सम्मान के प्रति उनके भाव को बताता है. जब देश बिकने का दावा करते हैं तो क्या वह ऐसा मानते हैं कि वे बिके हुए देश के नेता प्रतिपक्ष हैं. जबकि सरकार की ओर से संसद में कहा गया है कि दुनिया में कोई माई का लाल नहीं है जो भारत को बेच या खरीद सके. 

    किसी नेता या पार्टी की सरकार या उसके नेता के प्रति खुन्नस देश की भावना नहीं हो सकती. हर नेता और पार्टी देश के जनमत को प्रभावित करना चाहती है. इसीलिए ऐसे नेरेटिव बनाए जाते हैं जो अपील करें. आजकल पॉलिटिकल नारों के लिए प्रोफेशनल्स हायर किए जाते हैं. हेशटेग और पंच लाइन के लिए करोड़ों खर्च किए जाते हैं, लेकिन पंचलाइन से पॉलिटिक्स नहीं चल सकती. पॉलिटिक्स के लिए लीडर की विश्वसनीयता सबसे पहली जरूरत है. 

    अगर चर्चित ग्राफ का आंकलन किया जाएगा तो जितना राष्ट्रपति ट्रंप दुनिया में अपनी तुनक मिजाजी के लिए चर्चित हैं. उतना ही भारत में राहुल गांधी की चर्चा है. उन्हें ट्रंप के इंडियन वर्जन के रूप में देखा जा रहा है. वह जो भी मुद्दे उठाते हैं सब एक वक्त के बाद भूल जाते हैं. अभी उन्होंने ट्रेड डील और एपिस्टीन फाइल्स को पकड़ा हुआ है. इसके पहले वोट चोर गद्दी छोड़ उनका एजेंडा था. फिर एसआईआर पर आए. अब सब भूल गए जो ट्रेड डील हुई नहीं उस पर आंदोलन चालू कर दिया.

    अमेरिकी संविधान के मुताबिक ट्रंप का राष्ट्रपति के तौर पर यह आख़िरी मौका है. भारत में तो जनप्रतिनिधियों के लिए ऐसी कोई रोक नहीं है. 20 सालों से राहुल गांधी सत्ता के लिए देश का दिल जीतने की कोशिश कर रहे हैं. कांग्रेस तो राहुल गांधी पर न्यौछावर है, लेकिन सत्ता की चाबी सौंपने देश ने अब तक उन पर भरोसा नहीं किया है. बिना ट्रेड डील उस पर आंदोलन इस भरोसे को और कमजोर करेगा. लगता है राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों की हत्या के लिए प्रीमेच्योर डिलीवरी कांग्रेस  की किसी रणनीति का हिस्सा है.