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बोलने वाले पर निर्भर होता है विश्वास

सार

नाम और शब्द के साथ काम भी बोलता है. नाम उत्तम स्वामी होने का मतलब यह नहीं है, कि आचरण भी सर्वोत्तम होगा. राजनीति में तो यह आम दिखता है, कि नाम में स्वामी की धुंध और काम प्रतिगामी है..!!

janmat

विस्तार

    एमपी सरकार के बजट पर कांग्रेस ख्याली पुलाव की खाली-थाली लेकर प्रदर्शन करती है. यह प्रतीक अकेले कांग्रेस के विरोध को विश्वसनीयता नहीं दे सकता. भरोसा आचरण से आता है. जब विरोध भी खुशहाली का आधार बन जाता है, तो फिर इसका पूरा ताना-बाना खुद ही ख्याली ही साबित हो जाता है. जहां तक बजट का सवाल है, वह केवल सरकारी प्रक्रिया है. कांग्रेस की सरकारों में भी ऐसे ही होता था. जहां कांग्रेस की सरकारें हैं, वहां भी ऐसे ही हो रहा है.

    पूरी सियासत अभिनय का अखाड़ा बन गई है. जो भी अभिनय कर रहा है, वह मंच पर कुछ और है और उसके पीछे असलियत है. मध्य प्रदेश को सेप देने के सरकारी प्रयासों में कांग्रेस की कोई कम भूमिका नहीं है. दो दशक पहले तो कांग्रेस की सरकारें ही मध्य प्रदेश को चलाती थीं. कांग्रेस के वर्तमान में जो भी अभिनेता दिखाई पड़ रहे हैं, अधिकांश सरकारों में मंत्री रह चुके हैं. सरकारों की कार्य प्रणाली और सरकारों में उनकी भूमिका किसी से छिपी नहीं है.

    सरकार में लूट और उसकी हिस्सेदारी के झगड़ों का यह आलम है कि जनादेश के अनुसार सरकार भी 5 साल नहीं चला पाए. कांग्रेस के सामने मध्य प्रदेश में नेतृत्व और चेहरों की विश्वसनीयता का संकट है. परिणाम से ज्यादा प्रदर्शन उनका नजरिया है. ऐसे प्रदर्शनों से मीडिया में जगह मिलती है. विरोध की भूमिका दिखाने में सहूलियत होती है. ऐसे विरोध का कोई प्रभाव नहीं होता. शायद कांग्रेस प्रभावी विरोध करना भी नहीं चाहती. विरोध से वर्तमान नेताओं को क्या मिलेगा अगर सरकार से सामंजस्य होगा तब तो कुछ हित साधे भी जा सकते हैं. 

    जैसा रहन-सहन है वह तो विपक्ष के नेताओं जैसा दिखता नहीं है. महंगी गाड़ियां और खर्चीली चमकदार जीवन शैली यही बताती है, कि यह सब केवल विधायक के वेतन से तो नहीं हो सकता. कोई भी तथ्यात्मक तथ्य नहीं रखे जाते केवल ऐसे प्रदर्शन और नारेबाजी खुद को या सामने वाले को खुश करने के लिए की जाती होगी.

    कांग्रेस ने यह एक ट्रेंड बना लिया है, विधानसभा की बैठकें वैसे भी कम होती जा रही हैं. सरकार अपना कामकाज करा ही लेती है. यह शायद पहला अवसर है, कि विधानसभा का बजट सत्र केवल नौ बैठकों तक सीमित है. इसमें राज्यपाल का अभिभाषण, बजट, धन्यवाद प्रस्ताव, बजट की सामान्य चर्चा और विभागों की अनुदान मांगों पर सार्थक और प्रभावी चर्चा ना हो सकती है और ना ही कोई करना चाहता है.

    अगर कुछ तथ्यात्मक कहना हो तो अध्ययन करना होगा. जमीनी स्तर पर जनता की परेशानियों को उजागर करना होगा. यह सरकार को असहज कर सकता है. ऐसा करने से विपक्ष को क्या लाभ होगा. चुनाव तो अभी होने नहीं हैं. अभी तो केवल चुनाव की तैयारी करना है, इसके लिए मनी मैनेजमेंट सबसे जरूरी होता है. सिस्टम में करप्शन बंद आंखों से देखा जा सकता है, लेकिन विपक्ष को यह खुली आंखों से भी नहीं दिखता.

    जब कभी दबाव बनाना होता है, तो प्रेस कांफ्रेंस करके अगली प्रेस कॉन्फ्रेंस में करप्शन उजागर करने के इशारे किए जाते हैं. फिर वह अगली  प्रेस कांफ्रेंस कभी नहीं होती, क्यों नहीं होती इस बारे में समझने के लिए ज्यादा दिमाग खपाने की जरूरत नहीं है. भयादोहन का यह सामान्य नियम है कि किसी भी गड़बड़ी का केवल इशारा उजागर करो और फिर उसके सहारे हित साधने का प्रयास करो.

    सूचना के अधिकार पॉलिटिकल बयान और प्रदर्शनों के जरिए अपनी इसी ताकत को स्थापित किया जाता है. यह बात जरूर है, यह ताकत तभी उपयोग आती है, जब सामने वाला गलती करता है. व्यवस्था का डीएनए तो एक ही होता है. सरकार किसी भी दल की हो, व्यवस्था तो एक ही ढर्रे पर चलती है. जो कभी सरकार में रहा है, वह सरकार के सारे ढांचे और उसकी कमजोरी को ना केवल जानता है, बल्कि उससे लाभ कमाने की शैली ही उसे राजनीति में मजबूती से खड़ा करती है.

    मीडिया रिपोर्टर विधानसभा के भीतर सार्थक और प्रभावी बहस सुनने के लिए तरस जाते हैं. अगर देखने को कुछ मिलता है तो ऐसे ही ख्याली प्रदर्शन जिनका डेमोक्रेसी के संचालन और मजबूती में कोई महत्व नहीं है. ऐसे प्रदर्शन सदन के रिकॉर्ड में नहीं होते. यह सब सदन परिषर में अभिनीत किए जाते हैं. सदन के रिकॉर्ड में अपनी बात को दर्ज करने के लिए संसदविद ना मालूम कितनी तैयारी करते थे.

    लोकसभा और विधानसभाओं में संसदविदों के भाषणों के संदर्भ आज भी हमें प्रेरित करते हैं. क्या कभी ऐसे प्रदर्शन प्रेरित कर सकते हैं. कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय दल द्वारा जिस तरह से स्वांग बनाकर प्रदर्शन किया जाता है, क्या उसका लोकतंत्र में कोई महत्व है? उसका केवल इतना महत्व है कि मीडिया में उनको जगह मिल जाती है.

    जहां तक विकास और जन कल्याण का बुनियादी प्रश्न है वह तो वहीं खड़े हैं. उन पर कोई भी दल बहुत अधिक कुछ करने की क्षमता खो चुके हैं. सरकारों के बजट केवल एक औपचारिकता बन गए हैं. राज्य सरकारें अपनी आय से व्यवस्था के सामान्य खर्च भी चलाने में कठिनाई महसूस करती हैं कर्जे बजट की सीमा से आगे निकल गए हैं.

    अर्थव्यवस्था उत्तरदायित्व के सिद्धांतों को कबके छोड़ चुकी है. इस पर कानून जरूर है, लेकिन वह भी कागजी ढंग से पूरा होना दिखा दिया जाता है. कर्जों की हालत चिंताजनक ढंग से राज्य के नागरिकों पर बढ़ते जा रहे हैं. कर्जों के मामलों में मध्य प्रदेश खतरे के निशान पर है. विक्रम की पीठ पर सवार कर्ज का बेताल जैसी टिप्पणी पूरी व्यवस्था के लिए चिंता बढ़ाने वाला होना चाहिए .

       पुलाव थाली में नहीं पकता लेकिन ख्याली पुलाव तो कहीं भी पकाया जा सकता है. विरोध की ऐसी बेसुरी कव्वाली पार्टी के सुर और ताल को प्रभावित करती दिखाई पड़ती है.