महापुरुषों को लेकर विवाद जानबूझकर खड़े किए जाते हैं. महापुरुषों की तुलना कर उनके योगदान को राजनीति की बलिवेदी पर चढ़ाया जाता है. यह सब अनजाने में नहीं होता. यह राजनीतिक ध्रुवीकरण का पाप है जो राजनेताओं के सर चढ़कर बोलता है..!!
भारतीय संस्कृति में जैसा शुभ-लाभ का महत्व है राजनीति में वही महत्त्व ध्रुवीकरण और तुष्टीकरण के लिए महापुरुषों की तुलना पर से उपजे विवाद का है. महाराष्ट्र की मालेगांव नगर परिषद् में टीपू सुल्तान की फोटो पर छिड़े विवाद को शिवाजी महाराज से जोड़कर उसी पुराने हिंदू मुस्लिम ध्रुवीकरण के खेल को खेला जा रहा है.
धार्मिक मान्यता है कि शुभ और मंगल भगवान गणेश के पुत्र हैं जो रिद्धि-सिद्धि के साथ सुख-शांति और स्थिरता लाते हैं. इसे घर के मुख्यद्वार या व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की तिजोरी पर स्वास्तिक के साथ लिखा जाता है ताकि धन-धान्य बना रहे और सकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश हो. महापुरुषों पर राजनीति के निर्माता राजनीतिक शुभ लाभ का हिस्सा हैं.
भारत में तो भगवान राम पर ही विवाद खड़ा किया गया. उनके जन्मस्थान अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए कई शताब्दियों तक लड़ाई लड़नी पड़ी. आस्था के इस मुद्दे ने भारतीय राजनीति का स्वरूप बदल दिया. राजनीति की धुरी को बदलते हुए हिंदुत्व की राजनीतिक धारा केंद्र की सत्ता पर काबिज़ हुई. जब राजनीति में यह देखा गया तो सभी राजनीतिक दलों कि यह प्रवृत्ति बढ़ती गई कि महापुरुषों, जाति-धर्म, संप्रदाय, आस्था और शास्त्रों पर पक्ष विपक्ष में मुद्दे खड़े कर ध्रुवीकरण राजनीतिक लाभ का सौदा किया जाए.
टीपू सुल्तान विवाद की शुरुआत मालेगांव में नई महापौर द्वारा उनका चित्र अपने कार्यालय में लगाने से शुरू हुआ, क्योंकि उनके निर्वाचन में अधिकांश पार्षद एक ही समुदाय से चुने गए. जब विवाद हुआ तो चित्र हटाया गया लेकिन फिर चित्र की राजनीति पूरे राज्य में फैल गई. एक पक्ष एक महापुरुष का नाम अपने समर्थकों के ध्रुवीकरण के लिए करने में जुड़ गया तो दूसरा पक्ष अपनी आस्था के महापुरुष के साथ उनकी तुलना पर नाराज हो गया. महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष ने टीपू सुल्तान के कृत्य को शिवाजी महाराज से जोड़ते हुए जो तुलना की वह दूसरे लोगों को इतनी नापसंद आई कि हालात विस्फोटक हो गए.
अगर पिछले कुछ वर्षों के राजनीतिक मुद्दों पर शोध किया जाएगा तो गांधी नेहरू,अंबेडकर, काशी, मथुरा, अयोध्या बाबर, औरंगजेब और मनुस्मृति सबसे चर्चित विषय होंगे. ब्राह्मणवाद और जातिवाद भी राजनीतिक ध्रुवीकरण का ही गंदा खेल है. अब बंगाल में चुनाव है तो वहां बाबरी मस्जिद का निर्माण मुद्दा बन रहा है.
इतिहास के अच्छे और बुरे दोनों पक्ष होते हैं. इतिहास लेखन पर भी विवाद है. महापुरुषों के कृत्यों पर भी विवाद खड़े किए जाते हैं. अतीत का कोई अस्तित्व तो नहीं है. अतीत सबसे ज्यादा राजनीति में ही लाभकारी विषय दिखाई पड़ता है. महापुरुषों के बीच तुलना के विवाद और उसके कारण समाज में बढ़ती कटुता क्या कोई भी प्रगतिशील समाज स्वीकार कर सकता है? इसके लिए कोई एक दल दोषी है ऐसा नहीं कहा जा सकता.
जब पूरा दृष्टिकोण ही पक्ष में ध्रुवीकरण करना है तो फिर जो भी मुद्दा कारगर दिखाई पड़ता है उसकी राजनीति खेलने लगते हैं. हिंदू मुस्लिम तो भारत के अस्तित्व के साथ ही राजनीति का पसंदीदा खेल बन गया था, जो अब तक खेला जा रहा है. देश का विभाजन हो गया, धर्म के आधार पर जिनको पाकिस्तान जाना था वह चले गए, मुस्लिम जो भारत में रह गए उन्हें भारतीयता की जीवन पद्धति के अनुयायी कहा जा सकता है.
देश में जितने भी राजनीतिक विवाद हैं वे सब धर्म और जाति के नजरिए पर खड़े हैं. जो आक्रांता थे उनको अगर कुछ लोग अपनी आस्था के रूप में दिखाने की कोशिश करते हैं तो यह उनकी राजनीतिक लाभ की आस्था कही जा सकती है. भारत का मुसलमान मुगल आक्रांताओं को अपना आदर्श नहीं मानता लेकिन फिर भी राजनीतिक ठेकेदार अपने लाभ के लिए इन्हें उछालने में पीछे नहीं रहते.
महापुरुषों के मामले में वैचारिक संघर्ष भी दिखाई पड़ता है. महात्मा गांधी को सभी राजनीतिक दल अपनी आस्था का विषय मानते हैं लेकिन फिर भी कुछ दल एक दूसरे को गांधी विचार का विरोधी साबित करते हैं. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को तो गांधी की हत्या के लिए जिम्मेदार तक बताया जाता है. नाथूराम गोडसे को संघ का अनुयायी कहा जाता है. यह संगठन 100 साल का हो गया है. तमाम प्रतिबंधों के बावजूद भी वह अपने लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है. फिर भी राजनेता संघ पर ऐसे विवादस्पद बयान देते हैं जिनका कोई औचित्य नहीं है लेकिन इसका उद्देश्य राजनीतिक ध्रुवीकरण जरुर है.
बाबासाहेब अंबेडकर और सरदार वल्लभभाई पटेल पर भी यह कहकर विवाद खड़े किए जाते हैं कि भाजपा उनके विचारों के पक्ष में नहीं है जबकि बीजेपी ने इन दोनों महापुरुषों की स्मृतियों को संजोने का जो काम करके दिखाया है वह पुरानी सरकारों ने कभी नहीं किया.
मनुस्मृति पर विवाद खड़े कर ब्राह्मणवाद को गाली दी जाती है. UGC नियमों पर भले ही सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है लेकिन फिर भी इस पर आए दिन विवाद खड़े किए जाते हैं. हमारे महापुरुष और शास्त्रों ने अपने समय- नजरिये और परिस्थितियों के अनुसार हमारे देश को सर्वोत्तम दिया है. उस पर विवाद और तुलना से ज्यादा हमें प्रगति के रास्ते पर आगे बढ़ने के नए-नए मार्ग खोजने की जरूरत है.
महापुरुषों का तुलनावाद बहुत लंबे समय तक किसी भी राजनीतिक दल के लिए शुभ-मंगल नहीं बन सकता है. हर दल और नेता का व्यक्तिगत कार्य ही उसके शुभ और लोक मंगल के लिए महत्वपूर्ण है. राजनीतिक लाभ का लोभ देश का दुर्भाग्य नहीं बने यही सब का नजरिया होना जरूरी है.