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पावर के द्वार, पावर का अहंकार

सार

लोकतंत्र के मंदिर में जो भी औकात होती है वह व्यक्ति की नहीं जनतंत्र की होती है. बार-बार चुने जाने वाले विधायक शायद खुद की औकात को ही लोकतंत्र की औकात समझने लगते हैं..!!

janmat

विस्तार

    ऐसा तब कहना पड़ता है जब विधानसभा के भीतर एक दूसरे की औकात पर सवाल खड़े किए जाते हैं. निजी तौर पर किसी की कोई भी औकात हो सकती है लेकिन विधानसभा में अगर कोई औकात है तो वह सेवक की भूमिका में है. नेता को सदन में भेजने के लिए हैसियत देने के लिए,अगर किसी की औकात है तो वह मतदाता है.  

    सेवा ही लोकतंत्र में सबसे बढ़िया औकात होती है. सेवक के रूप में निर्वाचित प्रतिनिधि जब तक विनम्रता और ईमानदारी से सेवा करता है तभी तक वह लोकतंत्र का सिपाही होता है, जब उसकी औकात, उसके पद पावर, विषाद, जाति और जमावट से होने लगती है तभी इस तरह के विवाद खड़े होते हैं. कई बार अनुभवी लोग भी इतना चिड़चिड़ा जाते हैं कि उनका संसदीय अनुभव भी कमजोर पड़ जाता है. 

    केवल मध्यप्रदेश के विधानसभा में ही ऐसे दृश्य उपस्थित नहीं हो रहे हैं बल्कि लोकसभा में तो इससे भी ज्यादा खतरनाक नजारा दिखता है. स्पीकर सदन का संरक्षक होता है. लेकिन अब तो स्पीकर पर ही अविश्वास की तलवार भांजी जाती है.  लोकसभा के स्पीकर के खिलाफ नो कॉन्फिडेंस पेंडिंग है. लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष के खिलाफ भी सब्सटेंसिव मोशन एक सदस्य द्वारा लाया गया है. 

    विधानसभा संवाद का स्थान है. संवाद तभी हो सकता है जब गरिमा, मर्यादा और सभ्य शब्दों का उपयोग किया जाए. सदन के नेता मुख्यमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और संसदीय कार्य मंत्री पर सदन के व्यवस्थित संचालन का दायित्व होता है. जब ये ही एक दूसरे की औकात उतारते हैं तो फिर वैसा ही लगेगा जैसे मंदिर के मुख्य पुजारी ही आपस में लड़ने लगें. संसदीय कार्य मंत्री और नेता प्रतिपक्ष विधानसभा में एक दूसरे को औकात में रहने की सलाह दें तो विवाद स्वभाविक है. 

    सामान्य रूप से ऐसा दिखता है कि पक्ष और विपक्ष दो अलग-अलग पक्ष हैं लेकिन राजनीति में जो दिखता है वह होता नहीं है और जो होता है वह दिखता नहीं है. विधानसभा सत्र के पहले ही कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने ऐलान किया था कि विधानसभा में उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल, संसदीय कार्य मंत्री कैलाश विजयवर्गीय और अनुसूचित-जनजाति मंत्री विजय शाह को बोलने नहीं दिया जाएगा. अगर ये मंत्री बोलेंगे तो कांग्रेस उसका बहिष्कार करेगी. विधानसभा की कारवाई पर विपक्ष के निर्णय का अधिकार नेता प्रतिपक्ष को होता है लेकिन ऐलान कांग्रेस अध्यक्ष कर रहे हैं कि मंत्रियों का बहिष्कार किया जाएगा. यह बहिष्कार की रणनीति कांग्रेस की राजनीति से ज्यादा सत्ता पक्ष की राजनीति का हिस्सा दिखाई पड़ती है.

    अगर किसी के मुंह से कोई शब्द निकलता है तो वह अचानक नहीं होता उसके पीछे लंबा सोच विचार और कई बार तो फ्रस्ट्रेशन भी होता है. राजनीतिक अफवाहें जो लंबे समय से तैर रही है कि सत्ता धारी दल की अंदरूनी राजनीति में कुछ मंत्रियों और नेताओं को किनारे करने के लिए विपक्षी दल सुपारी पर काम कर रहे हैं. सियासत में वरिष्ठता अपनी जगह है लेकिन राजनीतिक पद वरिष्ठता और अनुभव से नहीं मिलते. अनुभवी राजनेता ऐसी परिस्थितियों को जज्ब कर लेते हैं लेकिन फ्रस्ट्रेशन तब बढ़ता है जब उसकी सरपरस्ती में राजनीति करने वाले भी उसकी गर्दन पकड़ने लगते हैं. यद्यपि यही राजनीति है, जिसको भी राजनीति में रहना है उसको ऐसी परिस्थितियों से गुजरने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए.

    किसी की भी निजी औकात आँकने का किसी को भी अधिकार नहीं है. लोकतंत्र में तो सेवा भावना ही विश्वसनीयता और जन विश्वास के शिखर पर पहुंचाती है.जनता का जनता द्वारा जनता के लिए बना लोकतंत्र अब तो एक दूसरे की औकात बताने लगा है. लोकसेवक के रूप में किसी भी प्रतिनिधि के हाथ में केवल सेवा का अधिकार होता है लेकिन अब तो इस तरह की बात पागलपन समझी जाती है. 

    विधानसभा में नीतिगत मुद्दों से ज्यादा ऐसे मुद्दों पर फोकस किया जाता है जो अतीत बन चुके हैं जो किसी नेता से जुड़े होते हैं जिसका नुकसान या फायदा किसी नेता के खाते में जा सकता है. पुरानी घटनाओं पर सदन में चर्चा क्या कोई सुधार ला सकती है? सुधार तो तभी होगा जब नीतिगत मुद्दों पर हमारे जनप्रतिनिधियों की समझ होगी. विकास की नीतियों, कार्यों में पारदर्शिता और ईमानदारी पर कोई भी जनप्रतिनिधि बात नहीं करना चाहता.

    औकात पर टकराव अहंकार भी प्रदर्शित करता है. पद और पॉवर का अहंकार सेवा भावना खत्म कर देता है. चाहे भागीरथपुरा की घटना हो चाहे कोई बांध टूट जाता हो चाहे जहरीले सिरप से बच्चों की मौत हो, सब इसी व्यवस्था की सरपरस्ती में हो रहा है. व्यवस्था को सुधारने का लक्ष्य अगर ईमानदारी से होता था तो फिर कम से कम ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति तो नहीं होती. 

    विधानसभा में तो पद के हिसाब से तो हर व्यक्ति की औकात बराबर है. सभी विधानसभा के निर्वाचित सदस्य हैं. केवल शब्द ही नहीं बोलते, व्यवहार बोलता है. धन बोलता है, पद बोलता है, बॉडी लैंग्वेज बोलती है. भाषा बोलती है. देश बोलता है, रहन-सहन बोलता है. लोकतंत्र के मंदिर में पद पावर और धन  की औकात नहीं हो सकती. चुनाव में जरूर जाति और धर्म का उपयोग होता है लेकिन विधानसभा के भीतर तो इसकी भी कोई औकात नहीं होती. सदन में तो वही याद किया जाता है जो संसदीय मर्यादा और गरिमा के अनुरूप जनहित के विषयों पर पूरी मेहनत ईमानदारी से अपनी बात रखता है. 

    सदन में खड़े होने की जनता ने जो औकात दी है, वह हमेशा नहीं रह सकती. जिसको इसका आभास होता है जिसको लोकसेवा का संकल्प निभाना आता है लोकतंत्र में उसी की असली औकात होती है और यह अंततः जनता तय करती है.