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बंद कीजिए, वोट बैंक  बनाने की कवायदें

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Sat , 25 Jul

सार

दो दिन पहले मुंबई में शिवसेना के दोनों धड़ों का शक्ति परीक्षण हो या भाजपा के पितृ सन्गठन के मुखिया का मेल-मिलाप सब वोट बैंक बनाने या वोट दूसरे पाले में न जाने देने की कवायद है, ऐसे में यह जानना जरूरी है कि हिंदू होने का र्थ क्या हैं..!

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विस्तार

प्रतिदिन विचार-राकेश  दुबे

08/10/2022

अफ़सोस भारत में कोई ऐसा नेतृत्व नहीं है, जो नागरिकों को सही दिशा दे| कभी घर वापसी के कार्यक्रम आयोजित होते हैं, तो कभी चर्च पर हमले के मुद्दे उठते हैं । कभी कहा जाता है कि ज्यादा बच्चे पैदा करो, तो कभी बीफ पर प्रतिबन्ध लगाने की बात होती है। यह सब करने या कहने वाला जो भी हो, सब कुछ हिंदू या हिंदुत्व के नाम पर ही करता है।  इसका अर्थ हिन्दू वोटों का ध्रुवीकरण है | दो दिन पहले मुंबई में शिवसेना के दोनों धड़ों का शक्ति परीक्षण हो या भाजपा के पितृ सन्गठन के मुखिया का मेल-मिलाप सब वोट बैंक बनाने या वोट दूसरे पाले में न जाने देने की कवायद है | ऐसे में यह जानना जरूरी है कि हिंदू होने का र्थ क्या हैं?

हिंदू होना क्या है? क्या हिंदू देवी-देवताओं की पूजा करनेवाले, व्रत रखने वाले और हिंदुओं के त्योहार मनाने वाले ही हिंदू हैं या फिर हिंदू होने का अर्थ कुछ और है| यदि  हिंदू धर्म को एक संस्कृति से बांध देंगे, तो इसका दायरा बहुत सीमित हो जाता है। हिंदुत्व को संस्कृतियों के आर-पार जाने वाली जीवनशैली के रूप में देखा जाना चाहिए।वस्तुत: हिंदू  उपासना पद्धति को एक धर्म नहीं, जीवन जीने की शैली के तौर पर देखा जाना चाहिए। सर्वोच्च  न्यायलय ने 2005 के एक निर्णय में हिंदुत्व को और भी विस्तार देते हुए कहा था-हिंदुत्व एक जीवन शैली है। हिंदू शब्द की कोई परिभाषा नहीं है। ऐसा शख्स भी हिंदू हो सकता है, जो धर्म से तो हिंदू हो, लेकिन मंदिर जाकर पूजा करने में विश्वास न रखता हो।न्यायलय ने यह बात देवसम मंदिर मामले में सुनवाई करते हुए कही थी। एक श्लोक के मुताबिक 'हिमालय और हिंद महासागर के बीच की जमीन पर रह रहे लोग हिंदू हैं। यह एक भौगोलिक पहचान है। आज भी यह देश उत्तर भारत में हिंदुस्तान कहलाता है, क्योंकि लोग किसी धर्म के बारे में नहीं, बल्कि जमीन के बारे में बात कर रहे होते हैं। बाकी दुनिया हमें हिंदू कहती है, क्योंकि वह हमें खुद से अलग रूप में देखती है।' यानी हिंदुओं को सिर्फ धर्म से जोड़कर देखना सही नहीं होगा।

इन दिनों हिंदू और हिंदुत्व के नाम पर देश में खासी राजनीति होती रही है। इसकी आड़ में कुछ संगठन दूसरे धर्मों के लोगों पर पाबंदियों की बात करते हैं, तो राष्ट्र को हिंदूवादी बनाने के लिए बेसिर-पैर के बयान भी देते रहते हैं। मसलन, संघ के सर कार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले कहते हैं कि भारत के सब लोग ‘सांस्कृतिक राष्ट्रीयता और डीएनए से हिंदू’ हैं। देश में अल्पसंख्यक की कोई अवधारणा नहीं है, क्योंकि अल्पसंख्यक कोई है ही नहीं।कुछ ऐसी ही बात श्री मोहन भागवत ने भी कही है । उन्होंने टैगोर की ‘स्वदेशी समाज’ नाम की किताब  का उद्धरण भी दिया “हिंदू और मुस्लिम न सिर्फ आपस में लड़कर एक-दूसरे को खत्म कर देंगे, बल्कि उससे बाहर निकलने का रास्ता भी खोजेंगे और वह रास्ता होगा -हिंदू राष्ट्र का।“ भारत को हिंदू राष्ट्र की शक्ल देने की कुछ संगठनों की कोशिशें यहीं समाप्त नहीं हो जातीं।

साध्वी प्राची कहती हैं कि हिंदुओं को चार बच्चे पैदा करने चाहिए। एक सीमा पर रहे, दूसरा समाज की सेवा करे, एक संत को दे दें और एक विश्व हिदू परिषद को सौंपें, ताकि वह संस्कृति और राष्ट्र की सेवा करे। बीजपी सांसद साक्षी महाराज भी हिंदू महिलाओं से हिंदू धर्म की रक्षा के लिए 4  बच्चे पैदा करने की सलाह देते हैं। इस तरह की बातें अल्पसंख्यकों के मन में आशंका पैदा करती हैं।

इस तरह के बयानों के बीच हाल में सबसे ज्यादा चर्चित रहा है घर वापसी का मुद्दा , यानी दूसरे मजहब के लोगों को हिंदू बनाने या बताने  की कोशिशें। कहा गया कि ये लोग या इनके पूर्वज हिंदू थे। किन्हीं मजबूरियों या दबाव में इन्होंने दूसरे धर्म को अपना लिया। अब इन्हें वापस हिंदू धर्म में शामिल कर घर वापसी कराई जा रही है। वस्तुत: घर वापसी एक प्रतिक्रिया है। जो भारतभूमि के मूल्यों और संस्कारों से मेल नहीं खाती।

ऐसे बयानों पर समाज से स्पष्टीकरण  आना चाहिए ‘दिल्ली में हर रोज 70 हिंदुओं का धर्मांतरण हो रहा है। पिछले एक साल में 100  से ज्यादा चर्च बने हैं। ये हिंदूबहुल इलाकों में बने हैं, जहां कि एक भी ईसाई नहीं रहता। ताकि इलाके के लोगों का धर्मांतरण किया जा सके।
इसी तरह देश में बीफ यानी गोमांस को लेकर काफी बहस हुई। कुछ राज्यों में बीफ का कारोबार बैन किया गया। इसके पीछे मूल भावना यह रही कि गाय हिंदुओं के लिए एक पवित्र जानवर है, इसलिए इसका वध नहीं किया जाना चाहिए। हालांकि आंकड़े बताते हैं कि तीन राज्यों को छोड़कर देश में लगभग सभी जगह गोहत्या पर १९७६ से ही रोक लगी हुई है। इसके बावजूद गोवंश की तादाद घट रही है। 2012  में पशुओं की गणना हुई थी, तो गोवंश का दूसरे मवेशियों के मुकाबले 37.28 प्रतिशत था, जबकि 1951  में यह प्रतिशत 53.04 था।

भारत में धार्मिक असहिष्णुता वैश्विक चिंता का सबब बनती जा रही है| लोगों को सांप्रदायिकता या अन्य आधार पर बांटने की कोशिशों के खिलाफ सतर्क होना होगा और भारत तभी सफल रहेगा, जब वह धार्मिक या दूसरे किसी आधार पर नहीं बंटेगा। मजहब को लेकर मची खींचतान के बीच किसी भी शख्स या संगठन को यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत का संविधान हर नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है। इसे वोट बैंक समझना या वोट बैंक मजबूती में बदलने वाली कवायदें बंद होना चाहिए |