• India
  • Fri , Feb , 23 , 2024
  • Last Update 02:38:PM
  • 29℃ Bhopal, India

विरासत के नाम पर संग्राम, विशिष्टता का अभिमान

सार

नेहरू मेमोरियल म्यूजियम का नाम बदलकर पीएम मेमोरियल म्यूजियम और लाइब्रेरी कर दिया गया है. तीन मूर्ति भवन दिल्ली में स्थापित इस म्यूजियम में पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की स्मृतियां ही संजोई गई थी. अब इसमें देश के पहले प्रधानमंत्री से लगाकर अब तक हुए सभी प्रधानमंत्रियों की स्मृतियों को संग्रहित किया गया है. शायद इसीलिए इसका नाम बदला गया है.

janmat

विस्तार

पंडित नेहरू के संग्रहित संदर्भों को व्यवस्थित करते हुए बाकी प्रधानमंत्रियों के इतिहास और संदर्भ को जनसामान्य के लिए इस म्यूजियम में प्रदर्शित करना निश्चित रूप से देश के प्रधानमंत्री की संस्था का सम्मान करना है. बीजेपी की मोदी सरकार भले ही अच्छी सोच के साथ कोई काम करें लेकिन कांग्रेस उसकी आलोचना नहीं करें, यह तो बहुत कम देखने को मिलता है. इस म्यूजियम का नाम तो नेहरू जी के नाम से हटाकर पीएम मेमोरियल किया गया है तो कांग्रेस का भड़कना बहुत स्वाभाविक हैं.

राहुल गांधी ने मेमोरियल का नाम बदलने पर अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि नेहरू की पहचान उनका नाम नहीं बल्कि काम है. राहुल गांधी कई बार दिल से ऐसी बात कर जाते हैं जिनके बहुत गहरे मायने निकलते हैं. उनका यह कहना कि किसी के भी जीवन में नाम का कोई महत्व नहीं है बल्कि उसके द्वारा किए गए काम उसकी पहचान बनते हैं. इतना उच्च विचार फिर क्यों राजनीति के लिए ऐसे नाम की तलाश की जिसको राष्ट्र के नाम के साथ जोड़ा जा सके. विपक्षियों के गठबंधन का नाम इंडिया से जोड़ने के लिए शब्दों का जाल बुना गया, जिससे इंडिया गठबंधन बनाया जा सके.

नेहरू के मामले में राहुल गांधी कह रहे हैं कि नाम से कुछ नहीं होता वास्तविक पहचान काम से होती है. विपक्षी गठबंधन के लिए क्या यह बात लागू नहीं होगी. इस गठबंधन में शामिल राजनीतिक दलों के काम और इतिहास पर अगर बीजेपी की ओर से हमला किया जा रहा है तो फिर उन हमलों को इंडिया गठबंधन नहीं बल्कि इंडिया पर हमले के रूप में दिखाने की कोशिश क्यों की जाती है? गठबंधन में जितने भी दल शामिल हैं क्या वह सभी अपने पूर्व कामों के लिए नाम में बदलाव के बाद जिम्मेदारी से मुक्त हो जाएंगे?

जहां तक नेहरू मेमोरियल म्यूजियम का नाम पीएम मेमोरियल म्यूजियम करने का सवाल है तो कांग्रेस को तो इसका समर्थन करना चाहिए, क्योंकि सबसे ज्यादा प्रधानमंत्री नेहरू-गांधी परिवार से ही हुए हैं जिनकी स्मृतियां और इतिहास इस संग्रहालय में संजोये गए हैं. अभी तक केवल पहले प्रधानमंत्री नेहरू की स्मृतियां संग्रहित की गई थी, अब तो इस परिवार के इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के स्मृतियों को भी इस संग्रहालय में स्थान दिया गया है. अभी तक इन दोनों प्रधानमंत्रियों के लिए अलग से कोई संग्रहालय नहीं था. तो एक तरीके से देखा जाए तो बीजेपी ने गांधी परिवार के दो प्रधानमंत्रियों की स्मृतियों को संग्रहित करने का महत्वपूर्ण कार्य किया है.

देश में बहुत दुर्भाग्यजनक स्थिति यह दिखाई पड़ रही है कि राजनीति की संपूर्ण ऊर्जा निंदा में उपयोग हो रही हैं. निंदा की राजनीति के कारण राजनीति में क्रोध और अवसाद भी दिखाई पड़ता है. नियंत्रण जैसे निमंत्रण बन जाता है, वैसे ही नकारात्मकता निराशा बन जाती है. अगर यह निर्णय पहले से ही ले लिया गया है कि विरोधी बुरा है तो फिर उसकी सकारात्मक ऊर्जा दिखाई नहीं पड़ सकती. 

हीनता और उच्चता का नशा सबसे खास होता है जो बारी-बारी से चढ़ता है. कांग्रेस इसी उतार-चढ़ाव का मैनेजमेंट नहीं कर पा रही है. उच्चता का इतना लंबा दौर इस पार्टी ने देखा है कि जब उसे हीनता का सामना करना पड़ रहा है तो नकारात्मकता और निराशा सकारात्मक ढंग से देश के सामने प्रस्तुत करने में सफल नहीं हो पा रही है. अतीत की लाश को ढोते रहने से वर्तमान में बहुत अधिक सार्थकता नहीं आती है. भारत माता की हत्या जैसी बात कांग्रेस के नेता की ओर से विरोधी की नकारात्मक छवि बताने के लिए भले ही कही गई हो, लेकिन इसने देशभक्त लोगों को आहत किया है. कांग्रेस ऐसी गलती कर रही है कि विपक्षी एकता को ही राष्ट्रीय एकता के रूप में पेश कर रही है.

सरकारे इसी बात के लिए काम करती हैं कि आवश्यकता और उपयोगिता के हिसाब से नीतियों और कार्यक्रमों का पुनर्निर्धारण करें. जनादेश से बनी सरकारे जो भी निर्णय करती हैं, उन्हें जनादेश का समर्थन मिला हुआ है. उनका विरोध सकारात्मक नजरिए से वैकल्पिक विचारों के साथ देश के सामने रखना राजनीति का लक्ष्य होना चाहिए. सरकारों के हर निर्णय का केवल विरोध विपक्ष की राजनीति कैसे हो सकती है?

कोई भी नेता या राजनीतिक दल कितना भी नापसंद हो लेकिन जनादेश से पोषित नेता या सरकार को नकारात्मक-नकारात्मक ही पेश करना देश हित में कैसे कहा जा सकता है. स्वाधीनता दिवस राष्ट्र का दिवस है. केवल किसी नेता या किसी पार्टी या किसी सरकार का यह आयोजन नहीं हो सकता है. लाल किले पर प्रधानमंत्री के राष्ट्र के संबोधन और ध्वजारोहण के कार्यक्रम का विपक्षियों द्वारा बहिष्कार नकारात्मक राजनीति की पराकाष्ठा कही जाएगी. 

भारतीय राजनीति आज एक दूसरे को घमंडिया, अहंकारी, रावण का अहंकार जैसे शब्दों से संबोधित करने में भी पीछे नहीं है. नफरत को बीजेपी के खिलाफ राजनीतिक मुद्दा बनाने वाला विपक्ष नफरत की राजनीति का शिकार हो गया है.

पंडित जवाहरलाल नेहरू सहित देश के सभी प्रधानमंत्री और उनका कामकाज देश का इतिहास है. इस इतिहास को कोई नहीं मिटा सकता. इतिहास अच्छे-बुरे दोनों को याद रखता है. इसे याद रखने तक ही सीमित रखा जाना चाहिए. इस पर चलकर राजनीतिक सफलता हासिल करने की कोशिश अदूरदर्शी ही साबित होती है. विशिष्टता का सम्मान काम के प्रति समाज का मान ही कहा जाएगा. इस मान को अभिमान बनाने की गलती इतिहास को भी लील जाती है.