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बातें लोकतंत्र की, काम गांधी परिवार की पूजा

सार

दुनिया में वर्चुअल गेम्स का ट्रेंड बढ़ रहा है। सॉफ्टवेयर से संचालित वर्चुअल गेम्स, रियल गेम्स से प्रेरित फेंटेसी गेम्स होते हैं। ऐसी ही ऑनलाइन काल्पनिक आभासी दुनिया का एहसास कांग्रेस अध्यक्ष की चुनावी क्रिया कांड से हो रहा है। 22 साल बाद पार्टी में चुनाव की लोकतांत्रिक प्रक्रिया का आभास देने के लिए जिस तरह की चुनाव प्रक्रिया चल रही है वह लोकतंत्र के नाम पर पाखंड, परिवारवाद के नाम पर मुखौटेवाद से ज्यादा कुछ दिखाई नहीं पड़ रही है। 

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विस्तार

सोनिया गांधी और गांधी परिवार के चेहरे के रूप में मल्लिकार्जुन खड़गे के निर्वाचित होने की घोषणा राजनीतिक से अनजान कोई व्यक्ति भी कर सकता है।  फिर भी चुनाव का प्रहसन, राज्यों में प्रचार की प्रतिध्वनि किस को धोखा देने के लिए रची जा रही है? खड़गे का अध्यक्ष निर्वाचित होना उसी दिन तय था जिस दिन उनका नामांकन भरा गया था। 

जैसे ही यह संदेश फैलाया गया कि वे गांधी परिवार के उम्मीदवार हैं उसके बाद किसी निर्वाचन की क्या कोई आवश्यकता रह जाती है? क्या इसे निष्पक्ष निर्वाचन कहा जाएगा? अगर गांधी परिवार अध्यक्ष मनोनीत ही कर देता तब भी ऐसी ही स्थिति रहती। ऐसा लगता है कि लोकतांत्रिक पार्टी का आभास कराने के लिए गांधी परिवार ने अध्यक्ष पद के चुनाव का जो क्रिया कांड कराया है उससे पक्षपात और गुटबाजी का घाव बढ़ गया है। 

कांग्रेस में गांधी परिवार पूजक के अलावा कोई दूसरा सर्वाइव कर सकता है, यह वर्तमान हालातों में तो संभव नहीं दिखाई पड़ता है। अध्यक्ष के स्वतंत्र उम्मीदवार शशि थरूर भी अपना प्रचार कर रहे हैं। विरोध के डर से वे लखनऊ तो नहीं जा पाए लेकिन आज भोपाल में उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष के निर्वाचक मंडल के लोगों से मुलाकात की। जो दृश्य और हालात पता चल रहे हैं, उससे तो यही लगता है कि कांग्रेस ने थरूर को केवल रस्म अदायगी का मौका दिया है। 

थरूर के विपरीत जब गांधी परिवार के उम्मीदवार मल्लिकार्जुन खड़गे भोपाल आए थे तो उनका गर्मजोशी से स्वागत हुआ था। बुजुर्ग खड़गे पत्रकारों से बात करते हुए बलि के बकरे तक की बात कह गए थे। इसका आशय भी यही निकलता है कि उन्हें खुद ऐसा लग रहा है कि अध्यक्ष पद पर उनका निर्वाचन महज औपचारिकता है। पार्टी परिवारवाद के सहारे ही चल रही है, चलती रही है और आगे भी चलती रहेगी। 

शशि थरूर स्वयं भी निर्वाचन की प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर रहे हैं। उनका कहना है कि कई प्रदेश इकाइयों में उनके प्रतिद्वंदी मल्लिकार्जुन खड़गे का स्वागत किया जाता है। बड़े-बड़े नेता उनसे मिलते हैं लेकिन उनके साथ ऐसा नहीं होता। थरूर ने निर्वाचक मंडल (डेलीगेट्स) की सूची नहीं मिलने की बात भी उठाई है। उनका कहना है कि पहली बार जो सूची मिली थी उसमें टेलीफोन नंबर अपडेट नहीं थे। नंबरों की जानकारी अभी हाल ही में दी गई है। सभी डेलीगेट से बिना फोन नंबर के कैसे संपर्क किया जा सकता है? सूची में अंतर होने की बात भी उन्होंने उठाई है। उन्होंने यह गंभीर प्रश्न भी उठाया है कि प्रदेश इकाइयों द्वारा उनके प्रतिद्वंदी के लिए तो सभी डेलिगेट्स को बुलाया जाता है लेकिन उनके आगमन पर कोई सूचना ही नहीं दी जाती है। 

मल्लिकार्जुन खड़गे की उम्मीदवारी रातों-रात उभर कर आई थी। दिग्विजय सिंह जैसा कद्दावर नेता उनके लिए नामांकन भरने से पीछे हट गया था। इसका मतलब यह नहीं है कि यह सब खड़गे के कारण संभव था। गांधी परिवार का हाथ खड़गे के साथ होने के कारण ही उन्हें पीछे हटना पड़ा था। जब सब कुछ इतना साफ है तो फिर निर्वाचन की प्रक्रिया और आंतरिक लोकतंत्र के दिखावे से क्या पार्टी परिवारवाद के आरोप से बच जाएगी? 

परिवारवाद आज देश में एक बड़े मुद्दे के रूप में स्थापित हो गया है। भाजपा, कम्युनिस्ट और आप के अलावा सभी राजनीतिक दलों में परिवारवाद हावी है। परिवारवाद से हो रहे नुकसान से ही खुद को बचाने के लिए शायद कांग्रेस अध्यक्ष के निर्वाचन का आभास देने का प्रयास किया जा रहा है। खड़गे और थरूर के बीच में जब बराबरी का निष्पक्ष मुकाबला ही नहीं है तो फिर इसको निर्वाचन की बात कहना कहां तक तर्कसंगत है?
 
वैसे तो सभी राजनीतिक पार्टियों में आंतरिक लोकतंत्र दम तोड़ता हुआ दिखाई पड़ रहा है। परिवारवादी पार्टियों में तो लोकतंत्र की बात करना ही बेईमानी है लेकिन बीजेपी, आप और अन्य पार्टियों में भी नेतृत्व का एकाधिकार अभी दिखाई पड़ता है। राजनीति में केवल परिवारवाद नहीं एकाधिकारवाद और व्यक्तिवाद भी लोकतंत्र को उतना ही नुकसान पहुंचाता है। राजनीतिक दलों में हाईकमान संस्कृति राजनीति के स्वाभाविक विकास के बाधक के रूप में काम करती है। 

राजनीति में कथनी और करनी का संकट लगातार बढ़ता जा रहा है। राजनीति में जो कहा जाता है, वह पूरा हो जाए ऐसा सामान्य रूप से होता नहीं है। विकृत हो रही राजनीति का सारा दोष कांग्रेस को ही देना ठीक नहीं होगा। सभी राजनीतिक दलों का उसमें बराबरी का योगदान दिखाई पड़ता है। राजनीतिक दलों और राजनेताओं की विश्वसनीयता का घटता स्तर लोकतांत्रिक प्रणाली पर ही सवाल खड़े कर रहा है। अच्छी नियत और भाव से की गई पूजा भी कल्याण के मार्ग पर पहुंचा देती है। राजनीतिक दलों में पूजा भी दिखावे और पद की लालसा में ज्यादा होती है।  

कोल्हू का बैल मुहावरा अपने मूल स्वरूप में तो आज लुप्त सा ही हो गया है क्योंकि न कोल्हू बचे हैं और ना ही बैल कोल्हू में जोते जाते हैं। अब तो कोल्हू का यंत्र भी बिजली से चलने लगा है। कोल्हू का बैल की कहावत राजनीतिक दलों की हाईकमान संस्कृति और कार्यकर्ताओं पर जरूर फिट बैठती है। हर राजनीतिक पथिक हाईकमान के कोल्हू में 24 घंटे कोल्हू के बैल जैसा तेल या रस निकालने के लिए जुता रहता है। कांग्रेस अध्यक्ष के निर्वाचन की पूरी प्रक्रिया को राजनीतिक दल के कोल्हू से रस निकालने की क्रिया के रूप में ही देखना उचित रहेगा। 

डिजिटल युग में सॉफ्टवेयर संचालित दुनिया में राजनीति भी हाईकमान या परिवारवाद के सॉफ्टवेयर से ही चलती है। कांग्रेस का हार्डवेयर कैसा भी दिखाई पड़े लेकिन उसमें सॉफ्टवेयर तो गांधी परिवार का ही काम करेगा। इंदिरा गांधी ने अपने शासनकाल में एक नारा दिया था ‘बातें कम काम ज्यादा’ अब सोनिया गांधी और गांधी परिवार ने कांग्रेस पार्टी के लिए यह नारा दिया है बातें लोकतंत्र की लेकिन काम परिवार की पूजा’।  

यह सब जानते हुए भी थरूर न मालूम क्या साबित करने के लिए चुनाव मैदान में डटे हुए हैं? थरूर को सम्मानजनक मत मिल जाएं इसमें भी शंका है। कांग्रेस का सोनिया सॉफ्टवेयर बिल्कुल भी नहीं चाहेगा ऐसा कोई भी संदेश जाए कि गांधी परिवार की मंशा के विरुद्ध उम्मीदवार को कोई समर्थन मिल सकता है। थरूर को थोड़े बहुत डेलिगेट्स के वोट मिल जाए तो वही उनके लिए बहुत होगा। 

चुनाव पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए कराए जाते हैं। चुनाव से पार्टी में उत्साह और गर्मजोशी बढ़ना चाहिए लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव तो पक्षपात और गुटबाजी के घाव को बढ़ाते हुए दिख रहे हैं। चुनाव बाद पार्टी में फिर से बिखराव प्रारंभ हो जाए तो इसे आश्चर्यजनक नहीं कहा जाएगा। इसमें किसी को भी शंका नहीं है कि मल्लिकार्जुन खड़गे कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष निर्वाचित नहीं होंगे। उनका निर्वाचन सुनिश्चित है। अब केवल यह कवायद चल रही है कि ज्यादा से ज्यादा मत खड़गे को ही मिलें।  

मल्लिकार्जुन खड़गे और थरूर के बीच में अध्यक्ष पद पर लड़ाई कांग्रेस और जी-23 के बीच में लड़ाई मानी जा सकती है। अभी तक पार्टी में असंतुष्ट नेताओं द्वारा निर्वाचन की मांग की जा रही थी इसलिए निर्वाचन का आभास कराया जा रहा है। कांग्रेस में पदों पर बैठे हुए लोग खड़गे के पक्ष में मतदान के लिए अपील कर रहे हैं। प्रदेश इकाइयां डेलीगेट्स को इस तरह के निर्देश दे रही हैं। एक वीडियो वायरल है जिसमें राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत खड़गे के पक्ष में कांग्रेस डेलीगेट्स से अपील कर रहे हैं। कमोबेश ऐसा ही हर राज्य में हो रहा है फिर निर्वाचन क्यों और कैसा?

शशि थरूर उच्चशिक्षित और प्रतिभावान नेता हैं। उनके लिए तो इन हालातों में अध्यक्ष पद के निर्वाचन की इस प्रायोजित लड़ाई से खुद ही अपने आप को बाहर कर लेना ज्यादा बेहतर होगा। यद्यपि थरूर के मैदान में आने के बाद ही कांग्रेस के कथित लोकतंत्र की पोल खुली है। इसलिए जब स्पष्ट तौर पर दिखने लगा है कि निर्वाचन एक तरफा है और चुनाव गांधी परिवार के उम्मीदवार और उनके बीच है तो फिर इस लड़ाई को लोकतांत्रिक स्वरूप दिखाने में उन्हें योगदान देने की क्या आवश्यकता है?

थरूर अगर इस दिशा में अभी भी नहीं चेतते हैं तो यही माना जाएगा कि वे भी चुनाव को लोकतांत्रिक बताने के लिए गांधी परिवार के मोहरे के रूप में काम कर रहे हैं। मनोनीत मुखोटे और मोहरे को लोकतांत्रिक ढंग से निर्वाचित होने का मुल्ल्म्मा चढ़ाने की जरूरत समझ से परे लगती है। पार्टी या तो स्वयं को धोखे में रख रही है या लोकतंत्र को धोखा देने की कोशिश कर रही है।