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तंत्र के मंत्र से चलता है “लीगल-इल्लीगल का गेम”फेम-डिफेम नेताओं की चिंता, अफसरों के लिए तो हमेशा “गेन”-सरयूसुत मिश्र 

सार

'सबै भूमि गोपाल की, नहीं किसी की मालकी’, “भूखे पेट भजन न होय गोपाला, ले लो अपनी कंठी माला” यह हम रोज सुनते, देखते हैं. सरकारों में लीगल(legal) और  इल्लीगल(illegal) का गेम तंत्र के मंत्र से चलता है. तन्त्र को साधने के मंत्र से बड़ा प्रोफेशन शायद आज दूसरा नहीं है..!

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विस्तार

आज पूरे देश में अवैध अतिक्रमण के नाम पर बुलडोजर चल रहे हैं| भूकम्प से ज्यादा लोगों को बु-कंप(बुलडोज़र कम्पन) डरा रहे हैं| सरकारों का दावा है कि बुलडोजर चलाकर हजारों एकड़ सरकारी जमीन भू माफिया के कब्जे से मुक्त कराई गई है| इसमें कई घर भी टूटे हैं| सपने और गृहस्थी भी टूटी है|

वैध या अवैध एक ही डोर के दो सिरे हैं| जैसे प्रेम और नफरत, खुशी और गम, दिन और रात हैं| वैध और अवैध का सरकार का पैमाना क्या है यह समझना बहुत कठिन है! देश के किसी भी शहर में देख लीजिए, लगभग एक तिहाई बस्ती, झुग्गियों में रहती है| झुग्गियां किसी प्राइवेट लैंड पर नहीं बनी हैं| सारी झोपड़ियाँ सरकारी जमीनों पर ही हैं| राजधानी भोपाल में भी बाणगंगा, ईश्वर नगर, भीम नगर, श्याम नगर आदि सैकड़ों बस्तियां हैं| यह बस्तियां नेताओं के लिए वोट बैंक बन जाती हैं|

राजधानी में आलीशान डीबी मॉल आज जहां खड़ा है| वहां कभी संजय नगर झुग्गी बस्ती हुआ करती थी| यहां से झुग्गी बस्ती को हटाकर जाट खेड़ी में शिफ्ट किया गया है| झुग्गियों को सभी तरह की  बुनियादी सुविधाएं दी गई हैं| झुग्गियों में रहने वालों के पास आधार कार्ड, वोटर कार्ड, सब सरकारी दस्तावेज हैं| प्रश्न यह है कि सरकारी जमीनों पर बनी झुग्गी बस्तियों को सरकार वैध मानती है या अवैध? जिनको सरकार ने स्वयं बसाया है, उसको सरकार अवैध तो नहीं मानेगी|

जब सरकार खुद ही झुग्गियों को बसाती है तो वह अवैध नहीं है| कोई गरीब आम आदमी मजबूरी वश सरकारी जमीन पर टूटा फूटा घर बनाकर रहता है, तो सरकार उसे अवैध मान भी कैसे सकती है? अगर वह अवैध है, तो फिर सारे शहरों की झुग्गियों को अवैध माना जाएगा| 

सरकार और तंत्र के लीगल इल्लीगल का यह है “गेम”| जो प्रशासन को सूट कर रहा है वह “लीगल” और जो किन्हीं भी परिस्थितियों में प्रशासन के खिलाफ हुआ वह इलीगल? क्या कोई कल्याणकारी सरकार ऐसा कर सकती है? एक और सवाल है जो अवैध निर्माण मानकर “बूकंप” से तोड़े जा रहे हैं, उनका सरकारी जमीन पर जब निर्माण हुआ था, तो क्या तंत्र आंखें मूंदे हुए था?

क्या यह निर्माण तंत्र की मिलीभगत, देखरेख और लापरवाही के कारण हुए थे? जो गरीब सरकारी जमीन पर अपना जीवन यापन कर रहे थे उन्हें तो बेघर बार कर दिया गया, और जिस तंत्र ने सरकारी जमीन पर अतिक्रमण होने देने की घोर लापरवाही की, उन पर कोई कार्यवाही नहीं की जा रही है? इस तरह का एप्रोच शासन तंत्र के इकबाल को समाप्त कर सकता है|

जनकल्याण के लिए समर्पित जिन सरकारों का तीर्थ यात्रा, कन्या विवाह कराना काम है, फ्री बिजली, फ्री राशन देना, जो सरकारें अपना दायित्व मानती हैं, उन सरकारों का किसी की भी छत उजाड़ने का अकल्याणकारी काम कैसे हो सकता है? सरकारें समानता और सामाजिक न्याय के लिए काम करती हैं| सरकारी जमीन पर एक जगह झुग्गी अवैध नहीं मानी जाती तो दूसरी जगह सरकारी ज़मीन पर वो कैसे अवैध मानी जाएगी ? 

जबकि वह जगह भी दूरदराज अंचल में है, सार्वजनिक महत्व के स्थान पर नहीं है| नेतागण हर परिस्थिति को अपनी राजनीति के लिए उपयोग करने में सिद्धहस्त होते हैं| शायद तोड़फोड़ की राजनीति उन्हें अनुकूल लग रही होगी| तभी बुलडोजर प्रशासन इतनी ताकत के साथ चल रहा है| जहां तक प्रशासन तंत्र का सवाल है वह तो हमेशा गेन की स्थिति में रहता है| उसकी हालत ऐसी होती है कि “जैसा तुम्हारा गाना वैसा मेरा बजाना” जैसा माहौल देखा वैसा मंत्र कान में फूंक दिया| तंत्र के मंत्र से ही लीगल-इल्लीगल का गेम चलता है|

मध्यप्रदेश में अवैध कालोनियों के नियमितीकरण के लिए कानून बनाया गया है| यह कानून केवल भाजपा की सरकार ने बनाया है| ऐसा नहीं है पहले भी कांग्रेस की दिग्विजय सरकार ने अवैध कालोनियों का नियमितीकरण करने का पुण्य लाभ उठाया है| सोचिए एक तरफ अवैध कालोनियों का नियमितीकरण सरकार का लक्ष्य है और दूसरी तरफ गरीब की झोपड़ी को अवैध बताकर तोड़ना|

इंसान पूरे जीवन आत्मा परमात्मा को समझने में लगाता है, फिर भी कुछ भी समझ में नहीं आता, और मृत्यु आ जाती है| ऐसी ही स्थिति सरकारों और सरकारी तंत्र के बारे में है| सरकारों के नियम कानून और तंत्र की मनमर्जी कब किस चीज को लीगल और कब इल्लीगल सिद्ध कर देगी, यह आज तक कोई नहीं समझ सका है| वैसे आज किसी भी शहर में हुए निर्माणों की कानून के अंदर समीक्षा की जाए तो हर मकान में कुछ ना कुछ इल्लीगल मिल जाएगा|

भोपाल के बाघ मूवमेंट इलाके और फॉरेस्ट एरिया में बड़े बड़े अफसरों के बंगले कैसे बन गए हैं? सरकार का बुलडोजर क्या कभी उस तरफ भी जाएगा? लो डेंसिटी एरिया में 10000 फीट के बंगले कैसे बन गए? उनको परमिशन कैसे मिली? “सैंया भए कोतवाल तो डर काहे का” जिनके बंगले हैं वह कभी  प्रशासन के मुखिया रहे हैं| उनके अवैध कामों की तरफ देखने की हिम्मत प्रशासन का कौन व्यक्ति कर सकता है|

मध्य प्रदेश में अवैध कालोनियों के नियमितीकरण के लिए जो कानून बनाया गया है| उसमें यह प्रावधान किया गया है कि अवैध निर्माण जिन अधिकारियों के कार्यकाल में हुआ है, उनके खिलाफ भी कार्रवाई की जाएगी, नियमितीकरण की प्रक्रिया चल रही है| लेकिन अभी तक किसी अधिकारी का नाम तो सामने नहीं आया, जिन्हें कार्यवाही के जद में लिया गया हो| राजनीति आज हर बात में पहुंच गई है|

तोड़फोड़ में राजनीति नहीं होगी ऐसा नहीं माना जा सकता| जिस तरह के संदेश बुलडोजर संस्कृति से सामने आ रहे हैं, उनसे वोटों के ध्रुवीकरण का लक्ष्य स्पष्ट दिखाई पड़ता है| गरीब हर बार जुल्म सहने को मजबूर है| किसी शायर ने कहा है “इन तीनों को बिल्कुल फुर्सत नहीं है, किसान को रोटी उगाने से, गरीब को रोटी कमाने से, और नेताओं को राजनीतिक रोटियां पकाने से” लीगल इल्लीगल के इस खेल में “गोपाल की सबै भूमि” में किसी भी इंसान को रहने के हक से कैसे वंचित किया जा सकता है?

शहरों के नियोजित विकास के लिए मास्टर प्लान की अवधारणा है| लगभग तीस सालों राजधानी का ही मास्टर प्लान नहीं बन सका है| इस दौरान दोनों दलों की सरकारें रहीं| मास्टर प्लान के अभाव में अनियोजित और इल्लीगल डेवलपमेंट की ज़िम्मेदारी किसकी है? निश्चित ही सरकारों, तन्त्र की है लेकिन जब भी कोई कदम उठेगा ज़ुल्म जनता पर ही होगा?