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पॉवर हंगरी कांग्रेस का विनाशकारी प्रतिगामी कदम

सार

आर्थिक सुधारों का जनक मानी जाने वाली भारत की ग्रैंड ओल्ड पार्टी कांग्रेस ने पॉवर की भूख में आर्थिक उदारीकरण के रास्ते में पहाड़ जैसी बाधा खड़ी कर दी है। यह अलग बात है कि ओल्ड पेंशन स्कीम (OPS) लागू करने की घोषणा करके कांग्रेस ने देवभूमि पहाड़ी राज्य हिमाचल में सत्ता हासिल कर ली है।  कांग्रेस शासित राजस्थान और छत्तीसगढ़ में पहले ही ओल्ड पेंशन स्कीम लागू करने की घोषणा की जा चुकी है।  

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विस्तार

राजनीतिक स्वार्थ पूर्ति के संक्रामक रोग से ग्रसित भारतीय राजनीतिक दलों आम आदमी पार्टी ने पंजाब में और झारखंड मुक्ति मोर्चा ने झारखंड में पुरानी पेंशन स्कीम लागू करने की घोषणा कर दी है। राष्ट्र और राज्य की दृष्टि से कांग्रेस ने ओल्ड पेंशन की घोषणा करके ऐसा राजनीतिक पाप किया है जिसका असर राज्य और भारत की सरकार को सदियों तक भुगतना पड़ेगा। ओपीएस का मामला अब ऐसा उलझता जा रहा है कि कोई भी राजनीतिक दल इस अनैतिक मांग को पूरा करने से पीछे रहने का साहस बहुत लंबे समय तक नहीं दिखा सकता है। 

 गुजरात के चुनाव में भी कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने पुरानी पेंशन स्कीम लागू करने की घोषणा की थी लेकिन भविष्यगामी गुजरातियों ने इन राजनीतिक दलों का जाल ही तोड़ दिया। कांग्रेस को देश के विकास के लिए प्रतिबद्ध पार्टी के रूप में देखा जाता था लेकिन अब वह भी सत्ता हासिल करने के लिए ऐसे अनैतिक, प्रतिगामी और दीर्घकालिक दायित्व वाली घोषणाओं का सहारा लेने लगी है जो उसे भविष्य में गहरे अंधकार में डाल सकते हैं। 

ओल्ड पेंशन स्कीम समाप्त कर नई स्कीम सरकारी कर्मचारियों के लिए 2004 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई के नेतृत्व में केंद्र सरकार द्वारा लागू की गई थी। इस स्कीम को राज्यों द्वारा अपनाया गया था। उस समय ही ऐसा महसूस किया गया था कि केंद्र और राज्यों का पेंशन व्यय लगातार बढ़ता जा रहा है। सरकारों के राजस्व का बड़ा हिस्सा पेंशन के भुगतान में खर्च हो जाता है। 

देश में आबादी का लगभग 2% हिस्सा सरकारी कर्मचारी हैं  जबकि जीडीपी का 12 से 13% पेंशन के भुगतान पर खर्च होता है। केवल 2% आबादी पर जनता के कर राजस्व का 12-13% खर्च होना, न्याय और समान वितरण का आधार कैसे हो सकता है? नई स्कीम लागू होने के बाद केंद्र में 10 साल कांग्रेस की सरकार रही है तब उसने इस पर कोई निर्णय नहीं लिया जबकि कांग्रेस सरकार का नेतृत्व मनमोहन सिंह जैसे अर्थशास्त्री कर रहे थे। 

राज्यों और केंद्र सरकार की वित्तीय हालात लगातार खराब होती जा रही है। भारत के पड़ोसी देशों में आर्थिक आपातकाल की स्थितियां बन चुकी हैं। श्रीलंका में तो वित्तीय अराजकता के कारण हालात यह हो गए कि राष्ट्रपति तक को देश छोड़कर भागना पड़ा। श्रीलंका में आम जनता का जीना दूभर हो गया है। वहां की सरकारों और राजनीतिक दल भी इसी तरीके से अदूरदर्शी और अनैतिक फैसले अपने राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए लेते रहे जिसका दुष्परिणाम पूरे देश को भुगतना पड़ा। 

एक सरकारी कर्मचारी को ओल्ड पेंशन स्कीम के अंतर्गत उसे नौकरी में मिल रहे वेतन का लगभग 50% पेंशन के रूप में प्राप्त होता है। महंगाई भत्ते में हर साल वृद्धि होती है। नई पेंशन स्कीम में कंट्रीब्यूटरी पेंशन की योजना लागू की गई इसके अंतर्गत कर्मचारी और सरकार की ओर से अपना-अपना अंश जमा किया जाता है। इसी फंड से रिटायरमेंट के बाद कर्मचारी को पेंशन देने की व्यवस्था नई पेंशन स्कीम में की गई है। यह स्कीम 2004 के बाद लागू हुई है।  कांग्रेस ओपीएस लागू करने का अनैतिक और विनाशकारी कदम इसलिए उठा रही है कि उसे पता है कि उसकी घोषणा का वित्तीय प्रभाव वर्तमान में उनकी राज्य  राज्य में चल रही सरकारों पर नहीं पड़ने वाला। 

जो कर्मचारी 2004 या उसके बाद भर्ती हुए हैं उनके रिटायरमेंट की आयु 30 वर्ष भी मान ली जाए तो 2034 के बाद रिटायरमेंट प्रारंभ होगा। ओपीएस लागू करने का दीर्घकालिक दायित्व तो उस समय की सरकार पर होगा। वर्तमान में कांग्रेस अन्य राजनीतिक दल ओपीएस लागू करने की घोषणा करने का जो महा पाप कर रहे हैं, उसका दुष्परिणाम 2034 के बाद राज्यों की सरकारों को भुगतना पड़ेगा। इस राजनीति को खराब राजनीति ही कहा जाएगा। साथ ही यह खराब अर्थशास्त्र देश के विकास के अर्थशास्त्र को बिगाड़ने का माध्यम बनेगा। 

कांग्रेस शासित राजस्थान और छत्तीसगढ़ की वित्तीय स्थिति संकट के दौर में है। रिजर्व बैंक आफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार राजस्थान के हालात कभी भी बिगड़ सकते हैं। हिमाचल में हाल ही में कांग्रेस की सरकार बनी है, वहां भी वित्तीय संकट की स्थिति है फिर भी वादा पूरा करने के लिए कांग्रेस सरकार निश्चित ही पुरानी पेंशन स्कीम लागू करेगी।

पेंशन के अलावा राज्य सरकारों के अन्य प्रतिबद्ध खर्चे राज्यों के खजाने पर भारी पड़ रहे हैं। राजस्व व्यय के अनुपात में प्रतिबद्ध खर्च के मामले में सभी राज्य कठिनाई महसूस कर रहे हैं। 35% से लेकर 45% के बीच में राज्यों का एक्सपेंडिचर कमिटेड है, जिसमें ब्याज भुगतान, वेतन और पेंशन शामिल है। इसके कारण विकास पर राशि खर्च करने के लिए राज्यों के पास सीमित संसाधन उपलब्ध हैं। 

कांग्रेस और अन्य राजनीतिक दलों द्वारा ओल्ड पेंशन स्कीम लागू करने की घोषणाएं राजनीतिक आत्मघात  साबित हो सकती हैं। शुरू में भले ही राज्यों में सत्ता हासिल की जा सके लेकिन इसके दूरगामी नतीजे राजनीतिक दलों के साथ राज्य सरकारों को भुगतना पड़ेगा। 

ओल्ड पेंशन स्कीम भारत में सभी राजनीतिक दलों की मजबूरी बन गई है। बीजेपी ने गुजरात में तो बिना ओल्ड पेंशन स्कीम की घोषणा किए चुनाव लड़ने का साहस दिखाया लेकिन अब आने वाले राज्यों के विधानसभा चुनाव में बीजेपी दूसरे राजनीतिक दलों के इस राजनीतिक द्रोह का मुकाबला कैसे करेगी? यह भाजपा के सामने बहुत बड़ी चुनौती है। देश में मुफ्तखोरी और रेवड़ी वाली योजनाओं से चुनाव में मिल रही सफलता को देखते हुए कोई भी राजनीतिक दल पीछे कैसे रह सकेगा?

राजनीतिक परिस्थितियों में सत्ता, स्वार्थ के लिए राष्ट्र और राज्य के हितों की बलि देने की आत्मघाती राजनीतिक प्रवृत्तियों को रोकने के लिए संवैधानिक प्रावधानों की जरूरत महसूस की जा रही है। इस बारे में बहुत शीघ्र कदम उठाए जाना चाहिए। ऐसे वायदे और घोषणाएं जो राष्ट्र और राज्य के लिए प्रतिगामी हैं, उनको कोई भी दल आगे नहीं बढ़ा पाए। ऐसी व्यवस्था अगर नहीं की गई तो सस्ती राजनीतिक लोकप्रियता के लिए ऐसे हालात बना दिए जाएंगे कि देश को उसकी सजा सदियों तक भुगतनी पड़ेगी। कांग्रेस पार्टी से ऐसे अनैतिक और प्रतिगामी कदम की उम्मीद नहीं की जा सकती थी लेकिन शायद वह कांग्रेस अब है ही नहीं जिसका समर्पण देश के प्रति था। 

हिमाचल प्रदेश की चुनावी सफलता के बाद अब तो यह निश्चित है कि मध्यप्रदेश में भी कमलनाथ ओल्ड पेंशन स्कीम लागू करने की घोषणा का पूरा चुनावी लाभ लेने की कोशिश करेंगे। इस संबंध में वे पहले ही कहते रहे हैं कि प्रदेश में ओल्ड पेंशन स्कीम लागू की जाएगी। पिछले चुनाव में किसान कर्ज माफी के नाम पर भी इसी तरीके का राजनीतिक पाप किया गया था। राजनीति के लिए देश  प्रदेश और आम जनता के भविष्य को दांव पर लगाने वाले राजनेताओं और राजनीतिक दलों को सबक सिखाना बहुत जरूरी हो गया है। 

नई पेंशन स्कीम में जो कर्मचारी यह जानते हुए भर्ती हुए हैं कि उन्हें पुरानी पेंशन नहीं मिलेगी तो उन्हें पुरानी पेंशन प्राप्त करने का नैतिक अधिकार भी नहीं बनता लेकिन राजनीतिक चालबाजियों पर अगर यह लाभ मिलता है तो हर कर्मचारी को प्रसन्नता होगी और निश्चित ही संबंधित राजनीतिक दल इस प्रसन्नता का लाभ उठाने की पूरी कोशिश करेंगे। ओपीएस की बहाली भारत के भविष्य के साथ राजनीतिक द्रोह साबित होगी।