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आंखों से जब देखेंगे तब सुने गए कश्मीर की बदल जाएगी छवि  

सार

कश्मीर के बारे में मीडिया और अन्य माध्यमों से देश में जो कुछ सुनाई पड़ता है, उसके कारण कई पर्यटक धरती के स्वर्ग कश्मीर का आनंद लेने से चूक जाते हैं. छुटपुट घटनाएं हो सकती हैं लेकिन संयोग बन रहा है तो चलो घूम कर आते हैं..!

janmat

विस्तार

ऐसा कहा जाता है सुनने और देखने में कई बार बहुत अंतर होता है। आज यही कश्मीर को लेकर हो रहा है। कश्मीर के बारे में मीडिया और अन्य माध्यमों से देश में जो कुछ सुनाई पड़ता है, उसके कारण कई पर्यटक धरती के स्वर्ग कश्मीर का आनंद लेने से चूक जाते हैं। पिछले दिनों परिवार के साथ कश्मीर जाने की योजना बनाते समय घरवाली ने तपाक से कहा कि वहां क्या मरने जाना है? रोज़ टीवी में देखते हैं, कैसी-कैसी घटनाएं हो रही हैं? कश्मीरी पंडित घाटी से भाग रहे हैं? फिर भी वहां घूमने का प्लान बना रहे हो? जब समझाया कि जैसा तुम सुन रहे हो ऐसा नहीं है, माहौल बदला हुआ है। छुटपुट घटनाएं हो सकती हैं लेकिन संयोग बन रहा है तो चलो घूम कर आते हैं। 

जैसे-तैसे परिवार के लोग तैयार हुए। सात दिन कश्मीर घाटी में बिताने के बाद जब घर लौटे तो हफ्तों कश्मीरियों की मेहमान नवाजी, प्राकृतिक सौंदर्य और पर्यटकों के प्रति प्रेम का एहसास मन को आह्लादित करता रहा। कश्मीर में धारा 370 हटाए 3 साल हो चुके हैं, जब यह कदम उठाया गया था तब ऐसी प्रतिक्रियाएं आई थीं कि न मालूम अब क्या होगा?

कश्मीर में आम आदमी और राजनीति से जुड़े लोगों की सोच में काफी अंतर है। कश्मीर को महसूस कर ऐसा लगा कि शायद धरती का स्वर्ग राजनीति के अतिवाद का शिकार रहा है। आतंक की घटनाएं भी नियोजित दिखाई पड़ती हैं। कश्मीरी पंडितों को टारगेट बनाना राजनीतिक और व्यवसायिक हितों से जुड़ा हुआ मसला दिखाई पड़ता है। 

कश्मीर में इस साल पर्यटकों के पहुंचने का रिकॉर्ड टूट गया है। इसके पहले कभी भी कश्मीर में इतने पर्यटक नहीं पहुंचे हैं। 10 लाख से ज्यादा पर्यटक कश्मीर जा चुके हैं। श्रीनगर में हर दिन 170 फ्लाइट आती जाती हैं। पर्यटकों के लिए हवाई यात्रा ही सहज है। कश्मीरी पर्यटकों को भगवान के रूप में मानते हैं। उनकी रोजी-रोटी इसी से चलती है। चाहे गाइड हों, घोड़े वाले हो गाड़ियों के ड्राइवर हों, होटल का स्टाफ हो या छोटे-मोटे दुकानदार। सभी जगह पर्यटकों का दिल खोलकर स्वागत किया जाता है। 

कश्मीरियों के दैनंदिन व्यवहार में ईमानदारी भी परिलक्षित होती है। दूसरे इलाकों में पर्यटन केंद्रों पर वस्तुएं महंगी होना स्वाभाविक हैं लेकिन कश्मीर में दूर पहाड़ियों के बीच में नदियों-घाटियों की तलहटी में भी पर्यटकों को पानी की बोतल ₹20 में ही मिलती है। अगर वहां बढ़ी हुई कीमत पर भी बेचा जाए तो पर्यटकों को कोई तकलीफ नहीं होगी लेकिन पर्यटकों के साथ किसी प्रकार का छल शायद कश्मीरियों के खून में नहीं है। 

कश्मीर का मौसम तो बेमिसाल है। वहां का प्राकृतिक सौंदर्य जिसने नहीं देखा, उसने बहुत कुछ खोया है। कल-कल करती नदी में राफ्टिंग स्वर्गिक आनंद का अनुभव कराती है। परिवार ने पहलगाम में राफ्टिंग का आनंद उठाया। कश्मीर यात्रा के लिए सोलो पैकेज बुक कर जब श्रीनगर एयरपोर्ट पहुंचे तो सबसे पहली भेंट कुली से हुई। बाहर आए तो बुक की गई टेंपो ट्रैवलर के ड्राइवर गुलज़ार से मुलाकात हुई। 

हमें एयरपोर्ट से सीधे सोनमर्ग जाना था। घर से बनी पूरी सब्जी साथ थी। रास्ते में पानी और अन्य सामान खरीद कर खाते-पीते परिवार सहित 2 घंटे की सड़क यात्रा ने मन मोह लिया। नदी और सड़क जैसे साथ-साथ ही कश्मीर में चलती हैं। जिधर भी जाओ सड़क नदी के समानांतर ही चलती है। सड़क से नीचे नदी को देखने पर जो मनमोहक दृश्य बनता है उस अनुभव को जीवन में भुलाया नहीं जा सकता। 

सोनमर्ग के आगे लद्दाख बॉर्डर पर जीरो पॉइंट पर भी जाने का मौका मिला। बर्फ की चादर से ढके पहाड़ पर चढ़ने का अद्भुत दृश्य आज भी मन में समाया हुआ है। नीचे से देखने पर पहले तो ऐसा लगा कि वहां जाना मुश्किल है लेकिन कश्मीरी युवकों ने बर्फ पर चलने वाली स्कूटर पर सुरक्षित ले जाने का जब भरोसा दिलाया तब डरते-डरते पति पत्नी चले गए लेकिन अगर नहीं गए होते तो अद्भुत दृश्य से चूक जाते। 

सोनमर्ग के बाद श्रीनगर में डल झील पर शिकारे का आनंद कभी भुलाया नहीं जा सकता। शिकारा चलाने वाले अब्दुल्ला के साथ 2 घंटे की सैर में कश्मीर के हालात और राजनीति पर भी चर्चा की। अब्दुल्ला ने जो कहा उससे आंखें खुली की खुली रह गईं। उसका कहना था कि कश्मीर में कोई हिंदू-मुस्लिम नहीं है यह जो कुछ भी हुआ है या हो रहा है, वह सब राजनीति के कारण है। 

जब हमने धारा 370 हटाए जाने के बारे में उसकी राय जानी, तो उसने सहज भाव से कहा कि कश्मीरी तो शांति से अपनी रोजी-रोटी और जीवन यापन करना चाहते हैं। उनके जीवन में 370 का कोई मतलब नहीं है। जब थी तब भी कोई मतलब नहीं था और आज हट गई है तब भी कोई मतलब नहीं है। कश्मीर में प्रकृति के बीच में पर्यटक तो आनंद के लिए आते हैं लेकिन यहां बसने के लिए बहुत कम लोग आते हैं। 

जब हमने कश्मीर में विकास पर पूछा तो उसने कहा कि सब कुछ राजनीति में गोलमाल हो जाता है। अगर यहां पर्यटक नहीं आए तो हमारा जीना दूभर हो जाए। हम सरकारों के भरोसे जीवन नहीं गुजार सकते। पर्यटन ही हमारी खेती-बाड़ी है। 

अब्दुल्ला ने यह जरूर कहा कि कश्मीरी पंडितों के साथ जो हुआ है वह यहां का आम कश्मीरी बिल्कुल भी नहीं चाहता था और ना ही उसको पसंद करता है। यह सब राजनीति के कारण हुआ है। आतंकवादी घटनाएं और हिंदू मुस्लिम को लड़वाना कुछ लोगों का नियोजित निवेश मान कर चलिए। पाकिस्तान और हिंदुस्तान में बहुत सारी सियासी और आतंक की दुकानें कश्मीर के नाम पर चलती रही हैं। उसने मुझसे प्रतिप्रश्न किया कि आप एक सप्ताह से आए हैं, कहीं आपको ऐसा महसूस हुआ कि कश्मीर में कोई हिंदू-मुस्लिम विरोध का माहौल है? 

यह बात बिल्कुल सच है कि हम को भी सब लोग मिलकर रहते हुए दिखाई पड़े। पर्यटकों की मिजाजपुर्सी में कश्मीरियों का कोई जवाब नहीं है। कश्मीर बदल रहा है, बदल गया है। राजनीति और आतंक की रणनीति पर जिस ढंग से नियंत्रण पाया गया है, इसे मजबूती के साथ आगे भी बनाए रखना होगा। श्रीनगर से पहलगाम जाते हुए रास्ते में पुलवामा में हमारे ड्राइवर ने वह स्थल भी दिखाया जहां विस्फोट में सैनिकों की शहादत हुई थी। 

ड्राइवर का दुखी भाव देख कर ऐसा लगा भारत और कश्मीर के सुख-दुख अलग नहीं हैं। सबका सुख और सबका दुख एक समान होता है। धारा 370 हटने के विरोधियों को 3 साल में करारा जवाब मिल चुका है। कश्मीर शांति की ओर तेजी से बढ़ रहा है। कश्मीर को सुनने की नहीं देखने की जरूरत है। आंखों से जब देखेंगे तब सुने गए कश्मीर की छवि बदल जाएगी। कश्मीर वास्तव में धरती का स्वर्ग लगता है।