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भाव और भंगिमा नहीं काम की भूमिका-व्यक्तित्व की लालिमा

सार

सुप्रीम कोर्ट की राहत के बाद संसद में बहाल राहुलयान की लांचिंग के लिए अविश्वास प्रस्ताव से बड़ा और शायद ही कोई दूसरा अवसर हो सकता था. कांग्रेस और उनके गठबंधन साथियों में इस बार अपूर्व उत्साह था कि उनका युवा नेता अविश्वास प्रस्ताव पर अपने बीस साला संसदीय अनुभवों का निचोड़ रखकर सरकार को न केवल कटघरे में खड़ा करेगा बल्कि 2024 में भारत के लोकतंत्र के चांद पर पहुंचने के लिए संकेत के चिन्ह जरूर छोड़ेंगे.

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विस्तार

पहले दिन अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा की शुरुआत का अवसर खोने के बाद विपक्ष का राहुलयान देशभक्ति, राष्ट्रप्रेम, नफरत, हत्या और फ्लाइंग किस की आंखमिचोली में लक्ष्य से भटकता हुआ दिखाई पड़ा. विपक्षी एकता की ताकत भी राहुलयान को भटकने से रोक नहीं पाई. वही हुआ जो पिछले अविश्वास प्रस्ताव के समय हुआ था. सदन में आँख मारना, प्रधानमंत्री के गले लगना और अब फ्लाइंग किस के आरोप भाषण के दूसरे मुद्दों से ज्यादा राष्ट्र चर्चा का विषय बन गए. 

जो पार्टी और नेता राहुलयान की संसद सदस्यता अदालती आदेश से समाप्त होने को देश का सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनाने में लगे थे वहीं, सुप्रीम राहत के बाद अपने सुप्रीम चुनावी यान की दिशा संभाल नहीं सके. राहुल गांधी भी अपने वक्तव्य के बाद सदन से चले गए जबकि अच्छा यह होता की वे गंभीरता दिखाते हुए सदन में चल रही चर्चा के दौरान पूरे समय मौजूद रहते.

राहुल गांधी का संसदीय जीवन 20 साल का होने जा रहा है. देश उनमें कई बार उम्मीद देखता है लेकिन हर बार उनके द्वारा कुछ ना कुछ ऐसा कर दिया जाता है जिससे लोगों को निराशा ही हाथ लगती है. राहुलयान की अविश्वास प्रस्ताव भाषण की दिशा पूरी तौर से लड़खड़ाती रही. भारत जोड़ो यात्रा के अनुभव के साथ राहुल गांधी ने अपने संबोधन के शुरू में यह कहा कि जब यात्रा शुरू करने का सोचा तब मन में यह अहंकार था कि रोज 10 किलोमीटर दौड़ते हैं तो 25 किलोमीटर चलने में क्या दिक्कत होगी? यात्रा पर क्यों चल रहे हैं? इस लक्ष्य का हमें पता नहीं था. जब हमने यात्रा शुरू की तो जोड़ों में दर्द हुआ तब अहंकार खत्म हुआ और फिर लोगों की आवाज सुनाई पड़ने लगी. 

राहुल यह बात निश्चित रूप से सही कह रहे हैं, दिल से कह रहे हैं लेकिन कोई खोज, वास्तविकता और तथ्यों की मांग करती है. भारत जोड़ो यात्रा के अनुभव अगर भारत की नई खोज का एक दृश्य दुनिया के सामने रख सकते तो कांग्रेस को और राहुल गांधी को भारत जोड़ो यात्रा का डॉक्यूमेंटेशन सार्वजनिक रूप से कॉपीराइट के साथ प्रकाशित करने से संकोच नहीं करना चाहिए.

राजनीति में हकीकत का सामना करना पड़ता है. हिंदुस्तान भूगोल के हिसाब से तब भी वही था जब कांग्रेस देश में राज करती थी और आज भी वही है जब एनडीए की सरकार है. हत्या का मतलब यह है कि किसी को जान से मार देना. हत्या किसी जीव की हो सकती है. राष्ट्र या भारत माता की हत्या तभी हो सकती है जब राष्ट्र गुलाम हो जाए. हिंदुस्तान गुलामी की लंबी दास्तां के बाद भी मरा नहीं तो अब भारत माता की हत्या की बात लोकतंत्र के नुमाइंदे सियासी लांचिंग के लिए करने का प्रयास करके अपना ही नुकसान करेंगे.

राजनीतिक भाषण आजकल तथ्यों और वास्तविकता से ज्यादा लच्छेदार कविता और शेरो शायरी की शक्ल में देने की जैसी आदत सी पड़ रही है. अभी तक तो भारतीय संस्कृति और रामायण यही बताती रही है कि रावण को राम ने मारा है. अब संसद में यह कहा जा रहा है कि रावण को राम ने नहीं रावण के अहंकार ने मारा है. अगर कोई यह पूछे कि देश पर राज करने वाली कांग्रेस को किसने मारा है? बीजेपी ने मारा है या जनता ने मारा है या उसके अहंकार ने मारा है?

राहुलयान अगर यह मानता है कि अहंकार ही सारे पतन की जड़ है तो फिर कांग्रेस के पतन के लिए भी अहंकार को ही जिम्मेदार मानना पड़ेगा. राहुल गांधी ने राष्ट्रपति के अभिभाषण के समय दिए गए अपने भाषण में अडानी से प्रधानमंत्री मोदी के रिश्तों पर गंभीर आरोप लगाते हुए एजेंडा बनाने की कोशिश की थी. एजेंडा से सच्चाई कभी स्थापित नहीं होती.

अब राहुल गांधी सांसदी बहाली के बाद कह रहे हैं कि इस बार अडानी पर आरोप नहीं लगाएंगे. अगर कोई भी आरोप तथ्यों के साथ लगाया जाएगा तो फिर आरोपों के तथ्य हमेशा उपलब्ध रहेंगे. हर बार उसके लिए आरोप लगाने की जरूरत नहीं है लेकिन अगर केवल भाषण लच्छेदार और न्यूज़कैची बनाने के लिए डायलॉग के रूप में उपयोग किया जाएगा तो फिर चाहे उसे हजार बार दोहराया जाए कभी भी अपनी गंभीरता वह साबित नहीं कर सकेगा.

मणिपुर मैं हो रही घटनाएं निश्चित रूप से देश के लिए शर्मनाक और चिंतनीय हैं. यह घटनाएं राजनीति का विषय हो ही नहीं सकती हैं. महिलाओं की सुरक्षा कानून व्यवस्था राज्य का विषय है. यह किसी दल और नेता की छवि बनाने या बिगाड़ने का विषय कैसे हो सकता है? संसदीय शासन पद्धति में राजनेताओं की विश्वसनीयता सबसे महत्वपूर्ण होती है. अगर इस पैमाने पर भारत की व्यवस्था को मापने की कोशिश करेंगे तो चिंताजनक स्थिति दिखाई पड़ेगी. राजनीति में कुछ भी कह देना और उसकी जवाबदेही तय होने पर मुकरने की प्रवृत्ति लोकतंत्र के लिए घातक है. राजनेताओं पर मानहानि के मुकदमे ऐसी ही गंदी राजनीति को प्रदर्शित करते हैं.

एक बीमारी भुगतकर खड़ा हुआ कोई भी व्यक्ति कम से कम उस तरह की गलती तो दोबारा नहीं दोहराता जिससे कि उसी तरह की बीमारी से फिर गुजरना पड़े. सदन के बाहर बोली गई बातों के लिए तो मानहानि के मुकदमे का सामना करना पड़ता है. चाहे भारत माता की हत्या की बात कही जाए, चाहे हिंदुस्तान की हत्या की बात कही जाए, चाहे चिंगारी लगाई जाए, चाहे केरोसिन डाला जाए, उसकी कोई जवाबदेही न्यायलय में तय नहीं की जा सकती. संसद को मिले विशेषाधिकार का कई बार दुरूपयोग दिखाई पड़ता है.

कहने के लिए तो दिल का भोला आदमी बहुत अच्छा होता है लेकिन इसको मापने का अभी तक कोई यंत्र नहीं बना है. भाव और भंगिमा से नहीं बल्कि काम से व्यक्तित्व की लालिमा बढ़ती है. मणिपुर के बहाने एनडीए और आईएमडीआईए गठबंधन एक दूसरे को राष्ट्रभक्त और राष्ट्रविरोधी स्थापित करने की जंग में जुटे हुए हैं. हिंदुत्व और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद बीजेपी का तो बुनियादी आधार माना जाता है. कश्मीर में धारा 370 का मुद्दा कांग्रेस के खिलाफ हमेशा उठाया जाता रहा है. मणिपुर के जवाब में कांग्रेस के समय कश्मीर में अलगाववाद के कारण कश्मीरी पंडितों के साथ अत्याचार और अनाचार संसद में आज भी उठाया गया है. सिखों के खिलाफ कांग्रेस के बर्ताव को भी बीजेपी हमेशा उभारती रहती है.

राहुल कांग्रेस की दृष्टि से जन आधार को अपने पुराने मुकाम पर लौटाने की कोशिश में तुष्टीकरण वाले राष्ट्रवाद को आगे बढ़ा रहे हैं लेकिन उसके गठबंधन के सहयोगी भी इससे प्रभावित हो सकते हैं. पाकिस्तान जब बना था तब राष्ट्र की हत्या हुई थी. राष्ट्र का जो भूगोल आजादी के समय था वह अखंड और अटूट है. यह भारतीयता की विरासत है.