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हिंदी दिवस पर यह भाषा युद्ध

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Thu , 22 Apr

सार

संस्कार से भाषा उदित होती है और भाषा के बिना हम समाज-संस्कृति व साहित्य की कल्पना नहीं कर सकते, मनुष्य के साथ-साथ भाषा का और भाषा के साथ-साथ मनुष्य का विकास हुआ, इसमें दो मत नहीं हो सकते..!

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विस्तार

प्रतिदिन-राकेश  दुबे

15/09/2022

बीते कल  अर्थात 14 सितम्बर को हिंदी दिवस था |  मध्यप्रदेश  के  एक प्रमुख व्हाट्स एप समूह में हिंदी प्रेमियों ने कुछ लिखा पढ़ा मिसाल बन गया |भाषा हमारे जीवन का पर्याय है। भाषा केवल विचार-अभिव्यक्ति का ही साधन नहीं है, बल्कि सोचने का भी माध्यम है और इस साधना की पहली सीढ़ी सम्मान है, खास तौर पर उन आदरणीय विभूतियों का जो प्रदेश ही नहीं देश के लिए भी प्रकाश पुंज रहे हैं | नई पीढी को पहले संस्कारवान होना होगा |संस्कार से भाषा उदित होती है और  भाषा के बिना हम समाज-संस्कृति व साहित्य की कल्पना नहीं कर सकते। मनुष्य के साथ-साथ भाषा का और भाषा के साथ-साथ मनुष्य का विकास हुआ, इसमें दो मत नहीं हो सकते ।

मध्यप्रदेश की बोलियाँ और भारत की भाषायी विविधता दुनियाभर के लिए आश्चर्य का विषय है। भारत में 1500 मातृभाषाएं हैं। 121 भाषाओं को तो 10हजार से अधिक लोग बोलते हैं। संविधान की 8 वीं अनुसूची में ही 22  भाषाएं हैं। दुनिया के किसी देश में शायद ही इतनी अधिक भाषाएं और बोलियां हों और उनमें ज्ञान का इतना विपुल भंडार हो। ऐसा भी शायद ही कोई देश होगा, जहां पर इतनी समृद्ध भाषाएं होने के बावजूद शासन व लोगों में अन्य किसी भाषा के प्रति इतनी दीवानगी हो। औपनिवेशिक गुलाम मानसिकता की प्रतीक भाषा सीखने-सिखाने का धंधा भारत में  चरम पर है। यहां पर गांव-गांव में अंग्रेजी माध्यम के स्कूल खुलते ही जा रहे हैं, जिनसे निकले अधकचरे विद्वान् सबसे पहले अपने पूर्वजों के नतमस्तक होने की जगह उनकी आलोचना करना ही अपनी श्रेष्ठता मानते हैं |

 विडम्बना देखिये,सरकारी स्तर पर अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा देने को ही गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के रूप में प्रचारित करने का काम हमारे राजनीतिक दलों व नेताओं द्वारा किया जा रहा है। हिन्दी को प्रचारित करने के लिए हिन्दी दिवस, हिन्दी साप्ताह और हिन्दी पखवाड़ा मनाए जाते हैं, जिनमें हिन्दी बुलवाने के लिए इनाम दिए जाते हैं। यह बेहद विडंबना वाली स्थिति है। सवाल यह है कि क्या दिवस, सप्ताह व पखवाड़े मनाकर ही किसी भाषा को समृद्ध बनाया जा सकता है? जी नहीं पहले संस्कारवान होना होगा |

इन दिनों भाषा के नाम पर देश को बांटने का काम हो रहा है। सत्ताधीशों ने जन भाषाओं को कभी स्वीकार्यता नहीं दी। संविधान में भाषा का दर्जा तो दिया गया लेकिन आमजन की भाषा को राजकाज के काम में लेने में हमेशा गुरेज किया जाता रहा। हिंदी की ही बात करें तो संविधान में हिन्दी को पूरी तौर पर राजभाषा के रूप में विकसित करने के लिए 15  वर्ष तक का समय दिया गया था। इतने तक अंग्रेजी को राजभाषा के रूप में इस्तेमाल करने की छूट थी। लेकिन मानसिक गुलामी का शिकार शासन व नौकरशाही में बैठा आभिजात्य वर्ग संविधान की मूल भावना को पूरा करने में असफल रहा। संभवत: यह आम लोगों को सत्ता से दूर रखने का ही प्रयास था।

यदि हिन्दी व भारतीय भाषाओं को बतौर राजभाषा इस्तेमाल किया जाता तो इससे अंतत: आम जनता ही सशक्त होती और लोकतंत्र मजबूत होता। आज शिक्षा, प्रशासन हो या न्यायपालिका- हर क्षेत्र में अंग्रेजी का ही वर्चस्व है। न्यायालयों की कार्रवाई और निर्णयों का उन लोगों को पता तक नहीं होता, जिनके वर्षों न्यायालयों के चक्कर काटते गुजर जाते हैं।

किसी भाषा को आगे बढ़ाने में उसके पढ़े-लिखे वर्ग की जिम्मेदारी होती है, भारत में विशेषकर हिन्दी भाषी क्षेत्र के पढ़े-लिखे वर्ग ने अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई। वह अंग्रेजी का पिछलग्गू बना रहा या अपने ही हित साधता रहा। जिन हिन्दी विद्वानों को इसकी क्षमता को बढ़ाते हुए लोगों का अभिव्यक्ति-सामर्थ्य समृद्ध करना था, उन्होंने हिन्दी को संस्कृतनिष्ठता के चंगुल में उलझाने की ही कोशिश की, जिससे हिन्दी और अधिक क्लिष्ट होती चली गई। हिन्दी फिल्मों ने इस पर व्यंग्यात्मक प्रतिक्रिया दी। संस्कृतनिष्ठ हिन्दी को उपहास का पात्र दिखाया गया, लेकिन हिन्दी विद्वान इसे उलझाते ही गए।

स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भी  बंगाल, गुजरात, महाराष्ट्र सहित कितने ही गैर-हिन्दी राज्यों के स्वतंत्रता सेनानियों व समाज सुधारकों तक ने हिन्दी की पक्षधरता की। महात्मा गांधी ने स्पष्ट कहा था, “राष्ट्रभाषा का स्थान हिन्दी ही ले सकती है, कोई दूसरी भाषा नहीं|” राजाराम मोहन राय, स्वामी दयानंद, स्वामी विवेकानंद, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और नेताजी सुभाष चन्द्र बोस सहित कितनी ही शख्सियतों ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाए जाने की पक्षधरता की। आजादी के बाद जितने भी शिक्षा आयोग व शिक्षा नीतियां बनीं, सभी ने हिन्दी व मातृभाषाओं को शिक्षा का माध्यम बनाए जाने की बात कही है । राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 भी प्राथमिक शिक्षा मातृभाषाओं में देने की बात कर रही है। इसके बावजूद बाजार के हितों की रक्षा के लिए हिन्दी व भारतीय भाषाओं की उपेक्षा की जा रही है। यदि लोगों को यह लगता है कि हिन्दी व मातृभाषाओं को शिक्षा का माध्यम बनाने से देश पिछड़ जाएगा, तो हमें जापान, चीन, जर्मनी, फ्रांस सहित मातृभाषाओं को शिक्षा व राजकाज का माध्यम बनाने वाले देशों से सीखना चाहिए। सबसे खतरनाक “हिंगलिश” है जो आपको कहीं का नहीं रहने देगी, इससे बचें |