सावन महीने में भगवान शिव की भक्ति की कावड़ यात्रा को भारतीय संस्कृति का बड़ा पर्व माना जाता है। राजनीतिक यात्रा सत्ता की दिशा में आगे बढ़ने के लिए सीढ़ी मानी जाती है। इस पर चलकर कई राजनीतिक यात्री सत्ता के शिखर पर पहुंच चुके हैं। इसलिए सत्ता का यह फार्मूला सोचा समझा और आजमाया हुआ है। सत्ता के रेगिस्तान में तब्दील हो रही कांग्रेस पार्टी ने यात्राओं के सुनिश्चित फार्मूले का प्रयोग दोहराया है। राहुल गांधी की डेढ़ महीने चलने वाली कन्याकुमारी से कश्मीर तक की भारत जोड़ो यात्रा एक साहसिक कदम मानी जाएगी।
प्रधानमंत्री के घर में पोते के रूप में चांदी के चम्मच के साथ पैदा होने वाला युवराज इतनी लंबी दूरी पैदल चलेगा यह कोई सामान्य बात नहीं है। जो प्रधानमंत्री का बेटा हो, जिसके परिवार ने कईयों को प्रधानमंत्री बनाया हो, वह आज सत्ता के लिए सड़कों पर भटकने के लिए मजबूर हुआ है। यह लोकतंत्र की जीत है। राहुल गांधी के इस साहसिक कदम की तारीफ की जाना चाहिए। यह अलग बात है कि यात्रा के सुफल क्या होंगे यह तो भविष्य में सामने आएंगे लेकिन कम से कम शुरुआत तो अच्छी हुई है। धार्मिक यात्राओं में तो ऐसा माना जाता है कि जितना शरीर को कष्ट होगा, उतना ही पुण्य मिलेगा।
भारत जोड़ो यात्रा में जिस तरह के दृश्य सामने आए हैं उससे दिख रहा है कि राहुल गांधी सुरक्षा घेरे में जनता को देश जोड़ने और राष्ट्रीय ध्वज के लिए अपना ज्ञान पिलाते हुए आगे बढ़ते जा रहे हैं। उनके ठहरने के लिए जिस तरह के कंटेनर ट्रकों पर लदे हुए हैं उनको नजदीक से देखना भी आम आदमी के लिए संभव नहीं है। इस यात्रा से उन्हें नए लोगों से संवाद का मौका मिलेगा, इसमें संशय है। आजकल तो प्रोफेशनल ट्रेवलर्स भी मौलिकता के साथ गाँव में ठहरना और अनुभव लेना चाहते हैं। इस यात्रा से अगर पब्लिक कनेक्ट बढ़ाना है तो जनता के बीच ठहरना और संवाद करना चाहिए था।
यात्रा के संयोजक मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने तो बड़ी सादगी के साथ नर्मदा परिक्रमा की थी। वह तो सामान्य रूप से नर्मदा यात्री के समान रास्ते में जहां भी स्थान मिला वहां ठहर गए थे, जहां भोजन मिला वहां भोजन करते गए थे। उनकी शैली ने मध्यप्रदेश में जनता को प्रभावित किया था और 15 साल बाद कांग्रेस को मध्यप्रदेश में सत्ता तक पहुंचने में सफलता मिली थी। उनके यात्रा के अनुभवों का इस कांग्रेस की यात्रा में उपयोग करना चाहिए था लेकिन शायद इस तरह की सादगी पसंदगी और आम आदमी सा आचरण हर व्यक्ति के बस में नहीं होता।
भारत जोड़ो यात्रा की शुरुआत पर राहुल गांधी ने भाजपा और संघ की विभाजनकारी नीतियों के विरुद्ध शंखनाद करते हुए नफरत खत्म करने की बात कही है। उनका यह विचार भी नफरत का ही एक रूप है। नफरत से नफरत का मुकाबला कैसे हो सकता है? नमक से नमक नहीं खाया जा सकता। मोदी-भाजपा और संघ में सब कुछ बुराई के रूप में देखना क्या नफरत नहीं कही जाएगी?
जिस पार्टी को जनता का समर्थन है, उसको नफरत के लिए जिम्मेदार बताकर भारत जोड़ने की बात क्या केवल कागजी नहीं मानी जाएगी? वास्तव में अगर भारत जोड़ना है तो नफरत से ऊपर उठकर विचार करने की जरूरत है। भाजपा में जो अच्छी बातें हैं उसको स्वीकार करने की जरूरत है। भाजपा व संघ में जो बुराई लगती है उनको सुधारने के लिए उनके साथ बात करने की जरूरत है। कांग्रेस में जो अच्छाई है उसे उन्हें स्वीकार कराने की जरूरत है और बुराई को छोड़ने की जरूरत है।
जब भारत आजाद हुआ था तब नफरत का जो माहौल था वैसी ही नफरत अभी भी दिखाई पड़ती है। नफरत में कोई अंतर नहीं आया है। केवल अंदाज बदला है। नफरत के दो पक्ष हैं। एक कांग्रेस की नफरत का है और दूसरा पक्ष भाजपा की नफरत का है। राष्ट्र को ऐसे हालात से निकालने के लिए बाहरी यात्रा की नहीं अंतरयात्रा की जरूरत है।
राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा कांग्रेस के गांधी परिवार के निष्ठावान कार्यकर्ताओं के लिए भक्तियात्रा नहीं बन जाए, इससे बचने की जरूरत है। संगठन में जो असहमत हैं, उनको भी जोड़ना जरूरी है। संगठन जोड़ने का ही नाम है। तोड़ और जोड़ एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जब तक मेरा रहेगा तब तक तेरा अलग नहीं हो सकता। मेरा छोड़ने पर ही तेरा से भी मुक्ति मिलेगी। तभी राष्ट्र के लिए सामूहिक चेतना प्रभावी हो सकेगी।
भारत जोड़ो यात्रा में युवाओं की कमी भी महसूस हो रही है। भारतीय जीवन परंपरा में ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम की परिकल्पना है। 25 वर्ष ब्रह्मचर्य फिर 50 वर्ष तक गृहस्थ इसके बाद 75 वर्ष तक वानप्रस्थ और इसके बाद संन्यास आश्रम का विचार ऋषि-मुनियों ने बहुत चिंतन-मनन के बाद हमें दिया है।
राहुल गांधी गृहस्थ आश्रम की आयु पूरी कर चुके हैं। यात्रा के संयोजक तो 75 वर्ष के करीब हैं। जिन दो नेताओं ने राहुल गांधी को तिरंगा सौंप कर यात्रा की शुरुआत कराई उनमें अशोक गहलोत 73 साल के हैं तो भूपेश बघेल 62 साल के हैं। जयराम रमेश जो यात्रा के लिए मीडिया की कमान संभाल रहे हैं वे 68 साल के हैं। इसमें 50 साल से नीचे का कोई भी युवा दिखाई नहीं पड़ रहा है। अगर युवा यात्रियों में शामिल भी होंगे तो नेतृत्व के स्तर पर तो उनकी कोई भूमिका नहीं दिख रही है। बदलाव हमेशा युवाओं ने किया है। भारत जोड़ो यात्रा में अगर हर राज्य से एक युवा को चुना जाता और ये सारे युवा सबसे आगे तिरंगे के साथ चलते तो वह दृश्य लोगों को कहीं ज्यादा अपील करता।
भारत जोड़ो यात्रा लोगों को नफरत छोड़कर जोड़ने की अपील करते-करते कहीं नफरत को विस्तारित करने के लिए जिम्मेदार ना हो जाए। ऐसा माना जाता है कि एक ही बात बार-बार दोहराई जाए तो वह नकारात्मक प्रभाव डालती है। यह भाषण यात्रा नहीं बन जाए इसके प्रति सतर्क रहने की जरूरत है। जहां तक भारत को जोड़ने का सवाल है जिस भारत को सदियों की गुलामी नहीं तोड़ सकी उसको भाजपा-संघ, कांग्रेस या और कोई क्या तोड़ सकेगा? तोड़ने और जोड़ने की बातें सत्ता संघर्ष की चाबी हो सकती हैं।
राहुल गांधी पर तरह-तरह की टिप्पणियां हंसी-मजाक और चुटकुले सोशल मीडिया पर अक्सर देखने को मिलते हैं। उनको गंभीर राजनेता के रूप में अभी सामने आना है। भारत जोड़ो यात्रा उनके लिए स्वर्णिम अवसर है। इस अवसर को चापलूसी और चहेतेबाज़ी में खराब नहीं करना चाहिए। कांग्रेस ने अब तक जो-जो खोया है उनके सही कारणों को समझना और भविष्य में उनको दूर करने के लिए ईमानदारी से काम करने से ही गांधी परिवार देश में अपनी प्रासंगिकता को बचा सकता है। यह बात भी है कि पहली बार कांग्रेस को सड़क पर उतरा देख जनता को भी सुखद अनुभूति हो रही है।