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दुर्भाग्य : औसत भारतीय के पास खराब हवा से बचने की कोई जुगत नहीं

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Fri , 05 Mar

सार

अध्ययन के मुताबिक करीब 67 प्रतिशत भारतीय ऐसे इलाकों में रहते हैं जहां 5 माइक्रोग्राम पर क्यूबिक मीटर प्वाइंट की सीमा का उल्लंघन होता है, 2013 और 2021 के बीच में दुनिया के प्रदूषण में हुए इजाफे में भारत 59.1 प्रतिशत के लिए जिम्मेदार रहा..!

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विस्तार

दुर्भाग्य है कि भारत की लगभग पूरी आबादी ऐसे इलाकों में रहती है जहां साल भर औसत प्रदूषण का स्तर विश्व स्वास्थ्य संगठन की 5 माइक्रोग्राम पर क्यूबिक मीटर प्वाइंट की तय सीमा से अधिक रहता है और इस अहम स्वास्थ्यगत मसले को लेकर हमारा नेतृत्व सामूहिक रूप से विफल रहा है। इस धारणा के पीछे एक अध्ध्यन है,पूर्ण वैज्ञानिक अध्ध्यन।

शिकागो विश्वविद्यालय के एनर्जी पॉलिसी इंस्टीट्यूट द्वारा कराए जाने वाले एयर क्वालिटी लाइफ इंडेक्स अध्ययन के नतीजे भारतीयों के लिए कतई चौंकाने वाले नहीं हैं लेकिन इन्हें ध्यान में रखते हुए केंद्र और राज्य सरकारों के स्तर पर आत्मावलोकन अवश्य शुरू होना चाहिए।

महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि भारत की लगभग पूरी आबादी ऐसे इलाकों में रहती है जहां साल भर औसत प्रदूषण का स्तर विश्व स्वास्थ्य संगठन की 5 माइक्रोग्राम पर क्यूबिक मीटर प्वाइंट की तय सीमा से अधिक रहता है।

राजधानी दिल्ली एक बार फिर दुनिया का सबसे अधिक प्रदूषित शहर बनकर सामने आया है। अध्ययन के मुताबिक यह इतना प्रदूषित है कि एक नागरिक के जीवन के औसतन 12 वर्ष छीन लेता है, परंतु  देश की राजधानी के इन आंकड़ों की वजह से हमें इस तथ्य की बिल्कुल अनदेखी नहीं करनी चाहिए कि औसत भारतीय भी खतरनाक स्तर के प्रदूषण में जीवन बिता रहा है।

अध्ययन के मुताबिक करीब 67 प्रतिशत भारतीय ऐसे इलाकों में रहते हैं जहां 5 माइक्रोग्राम पर क्यूबिक मीटर प्वाइंट की सीमा का उल्लंघन होता है। 2013 और 2021 के बीच में दुनिया के प्रदूषण में हुए इजाफे में भारत 59.1 प्रतिशत के लिए जिम्मेदार रहा। इन नाकामियों के मूल में खराब डिजाइन वाली नीतियां हैं जो प्रदूषण के अहम कारक खासकर पीएम 2.5 से निपटने में नाकाम रही हैं।

यूँ तो  2019 में राष्ट्रीय स्वच्छ हवा कार्यक्रम की घोषणा की गई थी जिसके तहत प्रदूषण के खिलाफ जंग छेड़ी जानी थी, इसकी मदद से पीएम 2.5 और पीएम 10 में 2024 तक 20-30 फीसदी की कमी लानी थी। बहरहाल भारत दुनिया में कोयले के सबसे बड़े ग्राहकों में बना हुआ है और इसकी खपत बढ़ रही है। इन अत्यधिक प्रदूषण फैलाने वाले ताप बिजली घरों से ही आज ज्यादातर बिजली का उत्पादन होता है और नवीकरणीय ऊर्जा की हिस्सेदारी केवल 12 प्रतिशत है।नवीकरणीय ऊर्जा का कमजोर प्रदर्शन मोटे तौर पर इसलिए है कि सौर ऊर्जा के आयात किए जाने वाले पैनलों पर शुल्क दर बहुत अधिक है। इसके अलावा घरेलू स्तर पर इन्हें जुटाने के मानक बहुत सख्त हैं तथा बिजली कीमतों की ढांचागत दिक्कतों और तकनीकी समस्याओं ने सरकारी बिजली वितरण कंपनियों को नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र के प्रति अनिच्छुक बना दिया है।

इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि जीवाश्म ईंधन पर भारत की निर्भरता वाहनों से होने वाले उत्सर्जन में कमी के लिए बिजली से चलने वाले वाहनों पर जोर के लाभ को विफल कर सकती है, क्योंकि चार्जिंग स्टेशन तो ताप बिजली से ही चल रहे हैं। गलत लक्ष्य वाली सब्सिडी ने भी उपभोक्ताओं के ईवी को अपनाने को प्रभावित किया है।

विनिर्माण से उत्पन्न होने वाली धूल प्रदूषण का अहम कारक बनी है। इसने वाहनों से होने वाले प्रदूषण को पीछे छोड़ दिया है। हालांकि राष्ट्रीय हरित पंचाट ने कई उत्पादकों को निर्देश दिया है कि वे विनिर्माण की जगहों से होने वाले धूल के प्रदूषण को नियंत्रित करें लेकिन इनका अक्सर उल्लंघन किया जाता है।फसल अवशेष को जलाना उत्तर भारत में प्रदूषण की नई वजह बनकर उभरा है। हमारी कृषि नीतियां ऐसी हैं कि वे अधिक पानी की खपत वाली फसलों को पानी की कमी वाले इलाकों में उगाने को प्रोत्साहित करती हैं।

हमारे देश में हवा की खराब गुणवत्ता वास्तव में गरीब और मध्य वर्ग के लोगों को अधिक प्रभावित करती है।अमीर जहां एयर प्यूरीफायर का इस्तेमाल करके या विदेश में जाकर खुद को बचा सकते हैं, वहीं औसत भारतीय के पास खराब हवा से बचने की कोई जुगत नहीं है और वह इसकी कीमत प्रदूषण से जुड़ी बीमारियों के मेडिकल बिल के रूप में चुकाता है। राजनेता अक्सर यह दावा करते हैं कि वे गरीबों को लेकर चिंतित हैं, ऐसे में स्वच्छ हवा उनकी प्राथमिकता होनी चाहिए।