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अज्ञानता-अनभिज्ञता और ग़ैरजवाबदेही का कौन ज़िम्मेदार?

सार

अफसरशाही के कामकाज को लेकर सवालों की कोई कमी नहीं होती। जनता तो सवाल उठाती है लेकिन उसकी आवाज सिस्टम के नक्कारखाने में सुनी नहीं जाती। जब कभी अफसरों की अज्ञानता और नाफरमानी पर निर्मल मन से सच बात जननेताओं के मुंह से सामने आती है, तब अफसरों की चाल और उनके कमाल चर्चा का विषय बन जाते हैं..!

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विस्तार

केंद्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने पिछले दिनों भोपाल के दौरे के समय मध्यप्रदेश के बड़े अफसरों को ऐसा आईना दिखाया कि अफसरशाही की अज्ञानता और गैरजवाबदेही एक बार फिर उभरकर सामने आ गई। मध्यप्रदेश के अधिकारियों के साथ राज्य की योजनाओं के संबंध में समीक्षा करते हुए केंद्रीय वित्त मंत्री ने अधिकारियों से सवाल पूछा कि मध्यप्रदेश में राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन यानी नमामि गंगे योजना के अंतर्गत मंजूर प्रोजेक्ट में क्या प्रगति हुई है? 

मुख्यमंत्री की उपस्थिति में हो रही इस बैठक में केंद्रीय वित्त मंत्री के सवाल पर अधिकारी बगले झांकने लगे। दरअसल अधिकारियों को इस बारे में कुछ पता नहीं था। गंगा प्रोजेक्ट का मध्यप्रदेश से स्वाभाविक रूप से रिश्ता भी नहीं हो सकता लेकिन वित्त मंत्री ने जानकारी दी कि नमामि गंगे योजना में मध्यप्रदेश में ग्वालियर की मुरार नदी को ₹40 करोड़ मंजूर किए गए हैं। गंगा की सहायक नदियों के लिए यह प्रोजेक्ट दिया गया है। जब प्रोजेक्ट के बारे में ही अधिकारियों को नहीं पता है तो फिर उसके क्रियान्वयन की स्थिति के बारे में तो पता होने का कोई सवाल ही नहीं है। 

राज्य के वित्त विभाग द्वारा केंद्र से जुड़ी स्कीम पर राशि की मांग करते हुए प्रजेंटेशन के दौरान केंद्रीय वित्तमंत्री ने जो टिप्पणी की वह भी आंख खोलने वाली है। निर्मला सीतारमण ने कहा-सिर्फ लेना नहीं,  देने वाले मदों के संदर्भ में भी जानकारी दी जानी चाहिए। ऊर्जा विभाग की योजनाओं के संदर्भ में अधिकारियों द्वारा एक साल के अंदर पूरी देनदारियों का भुगतान करने में असमर्थता व्यक्त करने पर केंद्रीय वित्त मंत्री गरज पड़ी और कहा कि यह योजना एक साल की नहीं चार साल के लिए है। केंद्रीय वित्तमंत्री ने यह टिप्पणी की कि अधिकारी सीएम को भी सही बात नहीं बताते। 

मध्यप्रदेश की ब्यूरोक्रेसी को सामान्य रूप से परफॉर्मिंग ब्यूरोक्रेसी के रूप में देखा जाता है। केंद्रीय स्तर की योजनाओं के क्रियान्वयन में दूसरे राज्यों की ब्यूरोक्रेसी द्वारा बेहतर परफॉर्मेंस, मध्यप्रदेश की अफसरशाही पर सवाल खड़े करती है। मध्यप्रदेश में 2003 के बाद स्थायित्व देने वाली सरकार काम कर रही है। ऐसी स्थिति में ब्यूरोक्रेसी के परफॉर्मेंस में सुधार की उम्मीद की जाती है लेकिन प्रदेश में ब्यूरोक्रेसी के स्तर में गिरावट स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। 

कांग्रेस के 15 महीने के शासनकाल में ब्यूरोक्रेसी के सर्वोच्च पद पर पदस्थ अधिकारियों को आज जांच का सामना करना पड़ रहा है। प्रदेश में दो दलीय व्यवस्था अब तक बनी हुई है। दोनों दल विपक्ष में रहने पर ब्यूरोक्रेसी पर सवाल उठाते हैं। नौकरशाही के तबादले राजनीतिक नजरिए से किए जाने पर एक दूसरे पर आरोप लगाने में कोई कमी नहीं बरती जाती। 

मध्यप्रदेश में अफसरों की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान हाल ही में अदालत द्वारा ई-टेंडर घोटाले पर दिए गए फैसले से भी उजागर हुए हैं। अदालत द्वारा कहा गया है कि अभियोजन पक्ष द्वारा इस प्रकरण में साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए जा सके। इसके कारण सभी आरोपियों को बरी कर दिया गया है। इस प्रकरण में बड़ी-बड़ी राजनीतिक और प्रशासनिक बातें की गई थी और जमकर आरोप प्रत्यारोप सामने आये थे। 

इस प्रकरण को प्रशासनिक स्तर पर ही उजागर किया गया था। इस घोटाले को उजागर करने वाले अफसर की ईमानदारी और कार्यक्षमता पर प्रशंसा के पुल बांधे गए थे। जब राज्य के वरिष्ठ अफसर ने यह घोटाला पकड़ा था तब स्पष्ट है कि साक्ष्य रहे होंगे। फिर जांच प्रक्रिया में साक्ष्य कैसे अदालत के सामने साबित नहीं किये जा सके? यह बहुत बड़ा सवाल हमारे सामने है। 

जब इस घोटाले पर जांच की प्रक्रिया प्रारंभ की गई थी उस समय कांग्रेस की सरकार में तत्कालीन मुख्यमंत्री ने इस घोटाले को राज्य के साथ धोखा बताते हुए सभी दोषियों को दंडित करने का दंभ जनता के सामने भरा था। इस पर राजनीतिक बयानों के अंबार लगाए गए थे। फिर यह सब कहां गायब हो गए? जब घोटाला अदालत में साबित नहीं हो सका तो इसका मतलब है कि अफसरशाही ने जिसे घोटाला बताया था वही बुनियादी रूप से गलत था। 

केंद्रीय वित्तमंत्री ने जो एक वाक्य कहा है कि अफसर सीएम को भी सही जानकारी नहीं देते उससे ऐसा लगता है कि अफसरों के लिए यह सार्वभौमिक वाक्य है। ई-टेंडर घोटाले में अगर सही तथ्य उस समय के मुख्यमंत्री को दिए गए होते तो शायद इस प्रकरण को घोटाले के रूप में मीडिया में इतना स्थान नहीं मिलता। जिन अधिकारियों को या कंपनियों को इस घोटाले के लिए जांच प्रक्रिया में परेशान होना पड़ा, क्या उसे अफसरशाही की गलती नहीं माना जाएगा?

अफसरशाही कई बार राजनीतिक कारणों से भी अपनी जवाबदेही और जिम्मेदारी को सही ढंग से अंजाम नहीं दे पाती। मलाईदार पदों पर बैठने की प्रतिस्पर्धा में निर्णायक सत्ताधीशों को राजनीतिक स्वार्थ सिद्धि का अवसर मिलता रहता है। मध्यप्रदेश में अफसरशाही किस तरह से अपनी जिम्मेदारी के अतिरिक्त कार्यों में संलग्न होती है, इसका एक बड़ा उदाहरण तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलनाथ के करीबियों के यहां पड़े आयकर छापों में भी सामने आया था। 

चुनाव आयोग ने कई अधिकारियों के खिलाफ राजनीतिक लोगों के लिए धनराशि इकट्ठा करने के आरोप में प्रकरण जांच के लिए कायम कराये थे। इस प्रकरण की वर्तमान स्थिति अभी पता नहीं चल पा रही है। संभवत यह पहला मामला है कि एक संवैधानिक संस्था ने वरिष्ठ अफसरों पर राजनीति के लिए पैसा इकट्ठा करने का सवाल उठाया है। 

ब्यूरोक्रेसी के बिना विकास और सिस्टम का संचालन संभव नहीं है। राजनीतिक सत्ताधीशों का लक्ष्य राजनीतिक हो सकता है लेकिन ब्यूरोक्रेसी राज्य के विकास और जनकल्याण को अंजाम देने के लिए जवाबदेह और समर्पित मानी जाती है। जब कोई अफसर स्वयं अनभिज्ञ होगा तो जवाबदेही के साथ कर्तव्य का निर्वहन कैसे कर सकेगा? 

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण अर्थशास्त्री हैं। उन्होंने निर्मल मन से सच कहने का साहस दिखाया है। सामान्य रूप से राजनीतिक नेतृत्व सच्चाई के साथ बात रखने से कतराते देखे जाते हैं। ब्यूरोक्रेसी पर पकड़ नहीं होने के राजनीतिक आरोप अक्सर राजनेताओं पर लगते रहते हैं। ज्ञान ही शक्ति है, ज्ञान ही विजय है। जो भी अपने पद से संबंधित नियम कानून और अन्य प्रक्रियाओं का ज्ञान रखेगा, वही ऐसे सवाल खड़े करने का साहस कर सकता है। चाहे वह राजनेता हो चाहे अफसर हो. उसकी चमक, उसके ज्ञान और कर्तव्यनिष्ठा से ही उभरती है।