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गौशालाएं क्यों बन रही हैं श्मशान स्थल? गौ कैबिनेट, गौ अभ्यारण क्या केवल राजनीतिक पोस्टर हैं?

सार

राजधानी से 30 किलोमीटर दूर, गौ माता के साथ गौशाला में इतनी क्रूरता होती रही, और किसी को कानों कान खबर नहीं हुई, मध्यप्रदेश में गौशालाओं पर खूब राजनीति हुई, अभी भी हो रही है| कोई सरकार मॉडल गौशालाओं का प्रोपेगेंडा  कर रही थी, तो कोई गौ कैबिनेट और गौ अभ्यारण बनाकर गायों के सबसे बड़े रक्षक होने का दावा कर रही थी| इन सब की असलियत बैरसिया की गौशाला ने खोल दी है| इससे तो ऐसा लग रहा है कि मध्यप्रदेश में गौशालायें गौमाता के लिए संरक्षण स्थल की बजाए श्मशान स्थल साबित हुई हैं|

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विस्तार

आज कितने गौ भक्तों का खून खौल रहा है? कितने गौ भक्त रात भर सो नहीं पाए? इनके राजनीतिक बयान अभी तक सामने नहीं आए हैं| गौ रक्षा के लिए अपना सर्वस्व दांव पर लगाने वाले गौ रक्षक क्या भोपाल में नहीं रहते हैं? कहीं भी, किसी भी हाईवे पर, गौ तस्करी की आशंका में वाहन चालक और सहायक को पीट-पीटकर मार देने वाले गौ सेवक बैरसिया की गौशाला में गायों की हत्या पर क्या किसी को जिम्मेदार मानते हैं?

भारतीय संस्कृति में सनातन धर्मी हर परिवार मे  गाय पूजनीय है| आज भोपाल का हर ऐसा परिवार दुखी और द्रवित है, भले ही वह रजिस्टर्ड गौरक्षक न कहलाए, लेकिन गाय के प्रति उसकी आस्था से भरा मन, सारे तंत्र के प्रति आक्रोश और गुस्से में है| गौशाला में एक साथ इतनी बड़ी संख्या में मरी हुई गाय मिलना, क्या तंत्र के मुंह पर तमाचा नहीं है?

मध्यप्रदेश में शासन तंत्र में गौवंश संवर्धन को हमेशा महत्व मिलता रहा है| पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने तो ऐसा माहौल बना दिया था कि जैसे गाय की कृपा से ही सरकार चल रही है| उमा भारती अपने दिन की शुरुआत गाय को रोटी खिलाने के बाद ही करती थी| कई बार तो इसके लिए प्रशासन रास्ते में गाय ढूंढ कर खड़ी करता था| और वह अपना काफिला रुकवा कर गाय को रोटी खिलाती थीं, फिर जाकर सरकार में कोई काम करती थीं| उसके बाद की सरकारों में भी गाय के प्रति आस्था कम नहीं थी|

आज भी गौ संरक्षण के लिए मध्यप्रदेश में  कागजों पर जितनी पुख्ता व्यवस्था है, उतनी शायद कहीं भी नहीं होगी| मध्य प्रदेश गौपालन एवं पशु संवर्धन बोर्ड का गठन, 8 अक्टूबर 2004 को उमा भारती की सरकार में किया गया था| राज्य गौपालन एवं पशुधन संवर्धन बोर्ड के अध्यक्ष मुख्यमंत्री होते हैं| जिला स्तर पर जिला गोपालन एवं पशुधन संवर्धन समितियों का गठन किया गया है| जिला बोर्ड के अध्यक्ष कलेक्टर होते हैं| राज्य और जिले में सभी महत्वपूर्ण विभागों के अधिकारी सदस्य होते हैं| जिला बोर्ड ही गौशालाओं का पंजीयन  सुनिश्चित करता है|

मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री गौ सेवा योजना भी  संचालित की जा रही है| इसके अंतर्गत मनरेगा योजना में ग्राम पंचायतों में 1000  गौशालाओं का निर्माण कराया गया है| जिसका संचालन ग्राम पंचायत स्तर पर होता है| पशुपालन एवं डेयरी विभाग के 2020-21 के प्रशासकीय प्रतिवेदन के अनुसार अशासकीय स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा पंजीकृत, संचालित क्रियाशील गौशाला 627 हैं| मुख्यमंत्री गौ सेवा योजना अंतर्गत 905 गौशालायें संचालित की जा रही हैं| मध्य प्रदेश की स्वयंसेवी संस्थाओं एवं मुख्यमंत्री गौ सेवा योजना के अंतर्गत क्रियाशील गौशालाओं की संख्या 1532 है| इस प्रकार लगभग 3000 गौशालायें  राज्य में क्रियाशील है|

बैरसिया की गौशाला की  वीभत्स घटना से गौशालाओं के प्रबंधन और गायों के संरक्षण की वास्तविक स्थिति की कल्पना की जा सकती है| गाय और गौवंश शासन तंत्र  की चिंता का विषय शायद नहीं होता| राजनीतिक नेतृत्व जरूर इसके लिए चिंतित होता है| क्योंकि गाय उसके लिए प्रशासकीय विषय नहीं बल्कि जन भावनाओं से जुड़ने का विषय है| मध्य प्रदेश सरकार ने सबसे पहले गौकैबिनेट का गठन कर यह संदेश दिया था कि उसके लिए गाय और गोवंश का संवर्धन कितना महत्वपूर्ण है|

मध्यप्रदेश में गौ अभ्यारण अनुसंधान एवं उत्पादन केंद्र भी बनाया गया है| आगर जिले के सुसनेर के पास सालरिया में यह केंद्र काम कर रहा है| यह केंद्र 472 हेक्टेयर में स्थापित होना बताया गया है| केंद्र का महत्व प्रतिपादित करते हुए प्रशासकीय प्रतिवेदन में कहा गया है कि निराश्रित, दान में मिली और पुलिस अभिरक्षा में प्राप्त गौवंश के आवास तथा भरपूर आहार की सुनिश्चितता, उनके निर्भय एवं स्वतंत्र विचरण के लिए प्राकृतिक वातावरण का निर्माण गौ अभ्यारण्य द्वारा किया गया है| सरकार के प्रयास निश्चित ही अच्छे हैं और यह उम्मीद भी की जानी चाहिए कि सरकार की अपेक्षा के अनुरूप जमीन पर यह सारे कार्य गाय माता के हित में संपादित हो रहे होंगे| और प्रशासनिक तंत्र जो इसके लिए जिम्मेदार है वह ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभा रहा होगा| बैरसिया की गौशाला की घटना ने तंत्र में इस विश्वास को पूरी तरह से खंडित कर दिया है| तंत्र को नियंत्रित करने वाले जिम्मेदार लोगों के लिए यह चुनौती भरा अवसर है कि गौ संरक्षण के लिए पंचायत से लेकर राज्य स्तर तक जिम्मेदार तंत्र को आईना दिखाया जाए|

गौ माता ने भारतीय जनमानस और राजनीति की  सामूहिक  सोच को काफी अरसे से प्रभावित कर रखा है| 1857 के विद्रोह के पीछे भी इस अफवाह को ही माना जाता है कि बंदूक की गोली में गाय की चर्बी लगी है| आधुनिक दौर में गाय को लेकर काफी उग्र और हिंसक घटनाएं भी देश में हुई है| गाय के लिए भारतीय आस्था और भावनाओं को राजनीतिक लाभ के लिए उपयोग करने की प्रवृत्ति पिछले समय से बढी है| बैरसिया गौशाला की घटना ने गाय के लिए आस्थावादी भावनाओं को चोट पहुंचाई है| आजकल तो गाय को लेकर आस्था के नाम पर ऐसी दृष्टिहीनता पैदा करने की कोशिश की जाती है जिसका इलाज कोई भी विज्ञान नहीं कर पाता| फिर भी गायों की ऐसी हालत के लिए जिम्मेदार तंत्र को कभी क्षमा नहीं किया जा सकता| गाय की हाय से डरना जरूरी है| और गाय के लिए जो भी कहा जाए ईमानदारी से वैसा करना भी बहुत जरूरी है| बैरसिया की गौशाला में जैसा हुआ है, वैसा अब कहीं नहीं हो, यह तो तुरंत प्रशासकीय तंत्र और  सरकार को सुनिश्चित करना चाहिए|