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कांग्रेस क्यों बन गई कटी पतंग? वंशवाद से क्या कट गया जनता का संग!

सार

देश के सबसे पुराने राजनीतिक दल का राष्ट्र और जनता से जुड़ाव क्या ख़त्म हो रहा है? कांग्रेस में क्या विचार शून्यता आ गई है? कांग्रेस में क्या विचार विमर्श लुप्त हो रहा है? क्या कांग्रेस पब्लिक से डिस्कनेक्टेड नेताओं के नियंत्रण में है? पब्लिक से कनेक्टेड कांग्रेसी नेता पार्टी में किनारे क्यों किए जा रहे हैं? 

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विस्तार

उत्थान और पतन जीवन का चक्र हैं। पतन के बाद उत्थान प्राकृतिक प्रक्रिया है। राष्ट्र की जन भावनाओं से दूर कांग्रेस ने पुनर्जीवित होने की आशा और विश्वास क्या खो दिया है?

आजादी के 75 साल बाद भी देश के चारों किनारों में कांग्रेस का जनाधार कायम है, भले ही वह बहुत सीमित हो चुका है। लेकिन अब धीरे-धीरे कांग्रेस का कैडर और समर्थक घोर निराशा से घिर रहे हैं। 

मजबूत विपक्ष लोकतंत्र और देश के लिए बेहद जरूरी है। कांग्रेस की विपक्ष की राजनीति देश को निराश कर रही है। कांग्रेस ने बहुत सी ऐतिहासिक भूलें की है और लगातार करती जा रही है। कांग्रेस की सबसे बड़ी भूल वंशवादी राजनीति साबित हुई है। 

राजनीतिक परिवार के नए वंश में लीडरशिप हो ये जरूरी नहीं। बिना लीडरशिप की काबिलियत के वंश को आगे बढाने से कांग्रेस इस हालत में पहुंच गयी है।
आजादी की लड़ाई के बाद कांग्रेस ने ही ज़्यादातर सरकारों का नेतृत्व किया है।

कांग्रेस की सबसे बड़ी भूल सेक्युलरिज्म के नाम पर तुष्टिकरण रही है। देश में सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून नहीं है। शिक्षा और पूजा स्थलों के प्रबंधन के लिए अलग-अलग कानून हैं। जब जमीन पर लोगों को सरकारी नीतियों में विभेद दिखता है तो नाराजगी बढ़ती है। दूसरे राजनीतिक दल इसी नाराजगी का लाभ उठाते हैं।

आजादी का एक पक्षीय इतिहास स्थापित करने का प्रयास भी कांग्रेस की बड़ी गलती थी। यही कारण है कि आज आज़ादी का नया इतिहास लिखने वाले जनता के असली नायक बने हुए हैं। 

शिक्षा पाठ्यक्रमों में भी ऐसा ही हो रहा है। आज जिन भी राजनीतिक बुराइयों को जनता दूर करना चाहती है, उन बुराइयों की स्थापना की जड़ में कांग्रेस ही रही है।

आज के राजनीतिक दौर में नकारात्मक पक्ष के लिए आम जनमानस कांग्रेस को ही जिम्मेदार मानता है।  

राजीव गांधी की हत्या के बाद गांधी परिवार बहुमत की कल्पना और प्रधानमंत्री बनने का सपना देख रहा है। लेकिन अब यह सपना शायद अधूरा ही रह जाए। 

गांधी परिवार का चुनावी कौशल और प्रबंधन क्षमता शायद अब समाप्त हो गई है। चुनावी रणनीति के लिहाज से अपग्रेडेशन के लिए पार्टी में अब शायद कोई सोच विचार और प्रयास भी नहीं हो रहे हैं। कांग्रेस आज अंतरकलह और अंतर्विरोध से गुजर रही है। जी 23 नेताओं की फौज पार्टी नेतृत्व के खिलाफ खुलेआम बगावत करती नजर आती है, नीतियों का विरोध करती है। पार्टी नेतृत्व की निर्णय क्षमता पर सवाल उठाए जा रहे हैं। इसका कारण भी इतिहास में छिपा है। कभी कांग्रेस अपने मुख्यमंत्री हटाने में 1 मिनट का समय भी नहीं लगाती थी, वह दौर खत्म हो गया है, लेकिन गांधी परिवार अभी भी उसी दौर की कार्यशैली से काम कर रहा है। कांग्रेस बुजुर्ग और युवा नेतृत्व के बीच भी उलझी हुई है। कांग्रेस ने पीढ़ीगत बदलाव को महत्व नहीं दिया। कांग्रेस ने अपने वरिष्ठ नेताओं के साथ जिस तरह का व्यवहार और बर्ताव किया है, उसने धीरे-धीरे पार्टी को ही कमजोर कर दिया है। 

मंडल कमंडल और सामाजिक न्याय की राजनीति के दौर में कांग्रेस ने जो गोलमोल स्टैंड लिया, उससे पिछड़ी जातियां कांग्रेस से दूर हुई।

राम मंदिर आंदोलन के समय भी कांग्रेस के स्टैंड के कारण उसे "खुदा मिला न मिसाले सनम" कांग्रेस राम और रहीम दोनों से दूर हो गई।

देश की शासन व्यवस्था में जहां जो कमियां जनता भुगत रही है, उसकी जड़ में कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराया जाता है। 

भ्रष्टाचार देश में नासूर बन गया है। भ्रष्ट कमाई से राजा महाराजा बने कई कांग्रेसी, अब जनता को रास नहीं आते। 

सुधार का कदम जिस क्षेत्र में भी उठाया जाए, उसमें व्याप्त गड़बड़ियों में कांग्रेस का हाथ दिखाई पड़ता है। 

किसी भी राजनीतिक दल का 75 साल से ज्यादा सत्ता की राजनीति में कायम रहना बड़ी बात होती है। कांग्रेस ने इसका भरपूर लाभ उठाया है। अब अगर कांग्रेस को फिर से सत्ता की राजनीति में अपनी हैसियत मजबूत करना है तो वंशवाद की राजनीति छोड़ना होगा। पार्टी में पीढ़ी का बदलाव करना होगा। छेत्रीय क्षत्रपों और सामाजिक राजनेताओं को सम्मान देना होगा। भ्रष्टाचार के अपने पुराने रास्तों और स्मृतियों को दूर करना होगा। पार्टी के भ्रष्ट नेताओं को बाहर करना होगा। जनहित के लिए स्वच्छता और पारदर्शिता बढ़ाने के लिए ईमानदारी से लड़ाई लड़नी होगी। तुष्टिकरण की राजनीति छोड़नी होगी। यह सारे सुधार करने के बाद भी लंबे संघर्ष के लिए कांग्रेस को तैयार रहना पड़ेगा। भारत में राजनीति के वैक्यूम को दूसरे राजनीतिक दलों ने भर दिया है। उन्हें कमजोर करना फिलहाल कांग्रेस के बूते की बात दिखाई नहीं पड़ती।

जनता और देश के मुद्दों पर राष्ट्र की राजनीति आज समय की धारा है। कांग्रेस ने अपने वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद को भाजपा सरकार द्वारा दिए गए पद्मभूषण सम्मान को भी राजनीति क़रार दिया।
राष्ट्रीय सम्मान राष्ट्र का सम्मान होता है। इसे भाजपा से जोड़ने वाली कांग्रेस पार्टी का सोचिये भविष्य क्या होगा? राष्ट्र और जनता से कटती कांग्रेस में कोरोनावायरस जैसे संक्रामक रोग लग गया है| यह  बढ़ता ही जाएगा तो पार्टी को सांस लेने में दिक्कत आएगी।