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हिंदुत्व को हार्ड और सॉफ्ट बताना “सनातन दर्शन के साथ बेईमानी-सरयूसुत मिश्र

सार

पूरे देश में हिंदुत्व को समझने, जीने और उससे कुछ लाभ प्राप्त करने की कोशिशें चल रही हैं| इसमें राजनीतिक दल और मीडिया सबसे आगे हैं| न्यूज़ चैनल देखें “अजान बनाम हनुमान चालीसा” का धर्म युद्ध दिखाई पड़ता है| दंगाइयों के खिलाफ बुलडोजर को धर्म से जोड़कर अनेक कार्यक्रम दिखाए जा रहे हैं..! 

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विस्तार

महाराष्ट्र में शिवसेना और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के बीच हिंदू हृदय सम्राट बालासाहेब ठाकरे के असली राजनीतिक वारिश की लड़ाई सड़कों पर आ गई है| जब से शिवसेना ने कांग्रेस और एनसीपी के साथ वहां सरकार बनाई, तब से हिंदुत्व के असली वारिस का द्वंद बढ़ गया है| राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे एक दूसरे के खिलाफ बयानबाजी की तलवारें भांज रहे हैं|

संघ जिसने हिंदुत्व को भारतीय राजनीति का एजेंडा बनाने में सफलता हासिल की, वह हिंदुत्व की हकबंदी में लगे दूसरे राजनीतिक दलों की कसमसाहट और बेचैनी को हिंदुत्व के लिए अच्छा संकेत मान रहा हैं| राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने देश की सनातन सभ्यता, संस्कृति और जीवन पद्धति हिंदुत्व को भारत का राजनीतिक एजेंडा बनाने में कामयाबी हासिल की है|

अगर संघ नहीं होता तो शायद राजनीति में आया यह हिंदुत्व काल कभी नहीं आता| सभी राजनीतिक दल और राजनेता हिंदुत्व की अवधारणा पर चलें इसमें किसी को क्या आपत्ति हो सकती है| लेकिन किसी को भी हिंदुत्व की अवधारणा को तोड़ने मरोड़ने का हक नहीं है|  भारतीय सनातन हिंदुत्व को राजनीतिक दृष्टि से हार्डकोर और सॉफ्ट हिंदुत्व में बांटने वाले लोग हिंदू, हिंदुत्व और हिंदुस्तान के साथ बेईमानी कर रहे हैं|

सनातन हिंदुत्व की जीवन पद्धति को हार्डकोर और सॉफ्ट हिंदुत्व में कैसे बांटा जा सकता है? हिंदुत्व में यह विभाजन ना तो सनातन धर्म कर रहा है और ना इस धर्म के अनुयाई कर रहे हैं| जो लोग सनातन हिंदुत्व से राजनितिक नुक्सान झेल रहे हैं वही ऐसी बात और विचार सामने लाते हैं| इसके लिए बहुत हद तक राजनीतिक लोग जिम्मेदार हैं| जो हिंदुत्व पहले राजनीति के लिए फायदेमंद नहीं माना जाता था|

वही हिंदुत्व आज भारतीय राजनीति का एजेंडा बन गया है| हिंदुत्व के एजेंडे के कारण जिन राजनीतिक दलों को नुकसान होता दिखाई पड़ रहा है| उनकी ओर से ही हार्डकोर और सॉफ्ट हिंदुत्व की शब्दावली गढ़ी गई है| भारत का मीडिया भी जाने अनजाने राजनीतिक शब्दावली के जाल में फस कर सनातन हिंदुत्व के साथ न्याय नहीं कर रहा है|

भारत की सनातन संस्कृति और हिंदुत्व को सबसे पहले दुनिया के सामने स्वामी विवेकानंद ने 1893 में शिकागो धर्म संसद में रखा था| सनातन का अर्थ है जो कभी ना पैदा हुआ और जिसका ना कोई अंत है| धर्म वह है जो धारण करने योग्य है| जो देशकाल परिस्थितियों के अनुसार देश समाज व प्रजा के लिए सर्वोत्तम हो वही धर्म कहलाता है|

युवा स्वामी विवेकानंद ने धर्म संसद के माध्यम से पहली बार बंधुत्व की सनातन सभ्यता का विश्व में ध्वज फहराया| विश्व बंधुत्व का स्वामी विवेकानंद का संदेश आज तक दुनिया में गूंज रहा है| वसुधैव कुटुंबकम का सनातन संदेश देते हुए विवेकानंद ने सनातन धर्म, सभ्यता, संस्कार और हिंदुत्व के सार को पूरे जगत में पहुंचाया| हिंदुत्व आज भी तेरा मेरा नहीं बल्कि पूरी धरती को एक परिवार मानता है| जब हिंदुत्व विश्व को परिवार मानता है| तब हार्डकोर और सॉफ्ट हिंदुत्व कहां से आ गया? हिंदुत्व में ऐसा विभाजन क्या सनातन संस्कृति की अवमानना नहीं है?

सनातन दर्शन प्रत्येक पूजा पद्धति और आचरण को न केवल स्वीकार करता है बल्कि यह मानता है कि अलग-अलग धर्म ईश्वर तक पहुंचने के मार्ग हैं| अंत में सभी को वहीं पहुंचना है| जो दर्शन इतना सहज, सरल, सर्वस्पर्शी और सार्वभौमिक है, उस दर्शन को कमजोर करने के लिए राजनीतिक प्रयास क्षम्य नही हो सकते| राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दूसरे सरसंघचालक गोलवलकर, महात्मा गांधी, वीर सावरकर, बाल गंगाधर तिलक और अनेक महापुरुषों ने हिंदुत्व की सनातन संस्कृति पर ऐसे ही सर्वस्पर्शी विचार हमे दिए हैं| 

हिंदुत्व को हार्ड और सॉफ्ट में बांटने का पाप कांग्रेस पार्टी ने किया है| आरएसएस  आजादी के समय से ही हिंदुत्व की विचारधारा पर अपने विचार रखती और काम करती रही| जनसंघ के रूप में हिंदूवादी पार्टी बनी, लेकिन उसे बहुत ज्यादा चुनावी सफलता नहीं मिली| फिर जनसंघ के स्थान पर 1980 में बीजेपी का गठन किया गया|

इसके बाद धीरे-धीरे हिंदुत्व की विचारधारा राजनीति में सफलता दिलाने की ओर आगे बढ़ने लगी| भारत के बहुसंख्यक समाज में हिंदुत्व की राजनीति उभरने लगी| गुजरात और मध्यप्रदेश में भाजपा मजबूत होती गई| वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री उम्मीदवार बनने के बाद हिंदूवादी राजनीतिक विचार को देश में व्यापक समर्थन मिला और नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने|

इसके बाद से हिंदुत्व भारतीय राजनीति का एजेंडा बन गया है| विरोधी विचारधारा ने हिंदुत्व से मुकाबले के लिए हार्ड और सॉफ्ट हिंदुत्व शब्दावली इजाद की|  इन लोगों ने हिंदुत्व और हिन्दूइज्म  में भी अंतर बताकर बरगलाने की कोशिश की| ऐसे राजनीतिक लोग शायद सनातन हिंदुत्व की जीवन पद्धति को ना समझते हैं और ना जीते हैं| वह लोग ही हार्ड और सॉफ्ट कोर की सोच लेकर अपना राजनीतिक फायदा करना चाहते हैं| राजनीतिक फायदे के लिए सनातन हिंदुत्व के साथ यह बेईमानी देश कैसे बर्दाश्त करेगा?

जो हिंदुत्व सर्व स्पर्शी है, सार्वभौमिक है, विश्व बंधुत्व के भाव के साथ विश्व को परिवार मानता है| जहां कोई विभेद नहीं है| कांग्रेस ने बीजेपी को हार्डकोर हिंदुत्व वाली पार्टी बताकर स्वयं सॉफ्ट हिंदुत्व पर चलने का ढोंग किया| कांग्रेस शायद धोखे में रह गई कि वह हिंदुत्व को बांट कर राजनीतिक लाभ ले लेगी लेकिन ऐसा हो नहीं सका| हिंदुत्व की हिमायती बीजेपी हिंदू जन मन में स्वाभाविक रूप से स्थापित हो गई है| जब भी सॉफ्ट हिंदुत्व के नाम पर असली और नकली हिंदुत्व की लड़ाई  होती है| स्वाभाविक रूप से भाजपा ही विजयी होती है|

जनेऊधारी हिंदू होने का प्रमाण और मंदिर मंदिर दर्शन की चुनावी यात्राओं को भी देश ने नकली पन ही माना है| इसी प्रकार के पाखंड और कन्फ्यूजन के कारण कांग्रेस का चुनावी बंटाधार अब देश में सामान्य व्यवहार बन गया है| आज संचार के सभी माध्यमों विशेषकर इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया को इस बात की प्रमाणिकता दिखाना चाहिए कि  सनातन हिंदुत्व और सनातन दर्शन हार्डकोर और सॉफ्ट के रूप में न बांटा जा सके|

हिंदुत्व एक सामान्य जीवन पद्धति है और उसको उसी स्वरूप में सामने लाना चाहिए| हिंदुत्व किसी भी धर्म का विरोधी नहीं है कुछ मजहबों के प्रतीकों को लेकर विवाद पैदा हुए हैं उन्हें प्रतीकों और सिद्धांतों की लड़ाई तक सीमित रखा जाना चाहिए| हिंदुत्व का परचम लेकर सियासत कर रहे राजनीतिक दलों को सनातन हिंदुत्व के मान, सम्मान, गौरव और स्वाभिमान के प्रति हमेशा सचेत रहने की ज़रूरत है|