दृश्य नहीं दृष्टि बदलते हैं – गुरू

भारतीय संस्कृति और आध्यात्म में गुरू का स्थान सबसे ऊँचा है। यह बात बार-बार दोहराई अवश्य जाती है, लेकिन इसका कारण समझने की चेष्टा कम ही होती है। इस बात को यंत्रवत दोहराने का चलन अधिक होता जा रहा है।

 

गुरु को सर्वोत्तम इसलिए माना गया है क्योंकि वह शिष्य के ह्रदय से अज्ञान के अँधेरे को दूर कर उसे उसके चेतन-अमल-सहज स्वरूप की पहचान की कराते हैं। गु- शब्द का अर्थ है अंधकार और रु – का अर्थ है प्रकाश. ऋषियों ने कहा है कि श्री हरि किसी से रुष्ट हो जाएँ, तो गुरु उसकी रक्षा कर सकते हैं, लेकिन यदि गुरु रुष्ट हो जाएँ तो श्री हरि उसकी रक्षा नहीं कर सकते। हालाकि गुरु कितने भी अधम कार्य के दोषी शिष्य का कभी अमंगल नहीं करते; वह सदा-सर्वदा मंगलकारी हैं।

 

बात अज्ञान के अंधकार और ज्ञान के आलोक की हो रही है, तो यह समझना जरूरी है की ज्ञान क्या है और अज्ञान क्या? अध्यात्म की दृष्टि के अनुसार शरीर में आत्मभाव ही अज्ञान है और आत्मभाव की ऊँचाई प्राप्त करने के लिए शरीर को साधन मानना ज्ञान है। संतों का यह भी कहना है कि भौतिक-दृष्टिगत जगत में सत्यता का बोध अज्ञान है और इसके आगे सूक्ष्म जगत की समझ ज्ञान है। इस बात को अनेक तरह से कहा गया है, लेकिन इसका सारतत्व यही है कि आत्मभाव की प्राप्ति ही ज्ञान है।

 

अब बात आती है कि गुरु इसमें क्या करते हैं? जगत-संसार जैसा आज है, वह सदा से ऐसा ही रहा है। इसे बदलने के प्रयास होते रहे लेकिन परिणाम ढाक के तीन पात ही रहा। सद्गुरू शिष्य का दृष्टि-दोष दूर कर उसे ऐसी दृष्टि प्रदान करते हैं कि वह दिखाई देने वाले जगत से आगे इसके तात्विक रूप को समझने योग्य हो जाता है।

 

अपने आंतरिक गुरु को कैसे खोजें ? 

 

दृश्य जगत पल-पल बदल रहा है, लेकिन सद्गुरु की कृपा से सूक्ष्म दृष्टि प्राप्त शिष्य इस प्रतिपल परिवर्तित होने वाले जग में उस तत्व देख पाता है, जो नहीं बदलता।

 

शिष्य कहता है कि पर्वत दिखाई नहीं देता, तो गुरु उसके सामने पर्वत लाने नहीं चले जाते, बल्कि शिष्य की आँख से उस तिनेके को हटा देते हैं, जिसके कारण उसे पर्वत दिखाई नहीं देता।

 

वह उस अंतर्गुरु को शिष्य में प्रगट कर देते हैं, जिससे वह अपने जीवन का प्रतिपल आत्म-साधना को समर्पित करता हुआ जीव-भाव से देव-भाव की ओर बढ़ता चला जाता है।

 

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यह तो हुई आध्यात्मिक दृष्टि और गुरु-शिष्य की बात, लेकिन शिक्षण संस्थानों में पढ़ाने वाले शिक्षक और पढ़ने वाले विद्यार्थी के बीच भी यही होता है। सच्चा शिक्षक विद्यार्थी को रटंत विद्या में नहीं लगाता और न उसे किताबी कीड़ा बनाता। वह विद्यार्थी को सूत्रों में विषय का मर्म समझाकर उसे स्वयं विषय का प्पोरा अनुशीलन करने की अंतर्दृष्टि प्रदान करता है। विद्यालयों-महाविद्यालयों में जो शिक्षक अपने विद्यार्थी को इस प्रकार की अंतर्दृष्टि (insight) प्रदान करते हैं, वे ही सच्चे अर्थों में शिक्षक होते हैं और गुरु का दर्जा पाते हैं।

 

पूर्व राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम अपने किसी भी भाषण में अपने गुरु प्रोफेसर सतीश धवन को याद करना नहीं भूलते। भारत के दूसरे राष्ट्रपति महान चिन्तक डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन शिक्षक और विद्यार्थी के बीच व्यक्तिगत और आंतरिक संबंध को सर्वाधिक महत्व देते थे। आज शिक्षा के लिए इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, का सहारा लिया जा रहा है। यह अपनी जगह ठीक है, और काफी हद तक वक्त की माँग भी, लेकिन शिक्षक और विद्यार्थी में परस्पर आंतरिक संबंध होने से शिक्षक के गुण अपने आप ही विद्यार्थी में आ जाते हैं।

 

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यह आवश्यक है कि गुरु-शिष्य संबंध होने चाहिए। वक्त की अन्य माँग अपनी जगह, मैं वक्त की इसी माँग पर बल दूंगा कि शिक्षक और विद्यार्थी सच्चे रूप में गुरु-शिष्य बनें। वे अपने-अपने कर्तव्यों का पूरी निष्ठा से पालन करते हुए मानवता के गौरव और भारत-भूमि के सच्चे पुत्र बनें।


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