कोरकू जनजाति की उत्पत्ति ....Korku people
जनजातीय संस्कृति परम्परा और संस्कृतिक बोध समग्र और सुमेकित है| कला अपने तात्विक रूपों में संस्कृति परम्परा की अपनी विशित्ता और समुदायों को रचने की छमता पर निर्भर करती है| जिसमें हर समुदाय की अपनी छाप होती है मध्य प्रदेश मैं जनजातियों की बहुलता है| जनजातियों के जीवन की भिन्नता होने के कारण प्रदेश को पांच अलग अलग संस्कृति परिछेत्र में जाना जाता है| मंडला, बेतुल, सिवनी, छिंदवाडा, बालाघाट, सागर और शहडोल जिले में गोंड,कोरकू,कोल, और बैगा जनजातियाँ निवास करती है |
इन सभी में कोरकू जनजाति अपना विशेष स्थान रखते हैं| वैसे तो भारत की जनसंख्या में 4 विभिन जाति पाई जाती है| आस्ट्रिक, द्रविण, मंगोल और आर्य हैं| इन जातियों में से आस्ट्रिक को सबसे प्राचीन माना गया है| आस्ट्रिक वंश के लोगों को ही कोरकू बोला जाता है | कोरकू जाति के उत्पत्ति का कोई ठोस सबूत तो नहीं है, न ही लिखित इतिहास मिलता है| इनके पूर्वजों द्वारा कही गयी पौराणिक गाथाओं से ज्ञात होता है के इनकी उत्पत्ति कैसे हुई |
बोला जाता है कि कोरकू अपने आपको रावण का वंशज और महादेव को सृष्टि का रचियता मानते हैं| इन लोगों में ऐसा माना जाता है कि एक समय लंका का राजा रावण इस स्थान पर भ्रमण करने आया और यहाँ किसी मानव को न देखकर अत्यंत दुखी हुआ। उसने भगवान शिव को याद किया, तब शिव वहाँ प्रकट हुए और उन्होंने कोरकू जनजाति को जन्म दिया।
कोरकू "कोर" या कोरो यानि आदमी "कु" लगने से शब्द बहुबचन हो जाता है| इसलिए कोरकू शब्द का अर्थ हुआ "आदमियों की जमात"| इस जाति के लोग मध्य प्रदेश में बैतूल, छिंदवाड़ा, खण्डवा और खरगौन ज़िले में निवास करने वाली प्रमुख जाती है| यह जाती 4 समूह में पायी जाती है -रूमा, पोतडया, ढलरिया और बोवई | इनके कुल 36 गोत्र हैं| गोत्र चिन्ह से सम्बंधित बहुत सी कथाएं हैं जिनसे पता चलता है कि भिन्न भिन्न प्रकार के गोत्र चित्र किस प्रकार मान्य बने |