ब्रह्माँड के रहस्य -63 यज्ञ विधि, सोम -7

सोमरस कैसे बनाया जाता था
                                          ब्रह्माँड के रहस्य -63
यज्ञ विधि, सोम -7

रमेश तिवारी

सोमरस के स्वाद को यद्यपि कसैला बताया गया है किंतु उसको पीने योग्य बनाने के लिये गौ दुग्ध, घी और शहद को मिलाने का विस्तार से वर्णन भी मिलता है। 

ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद के श्लोकों में कहा गया है कि भूरे और हरे रंग के सोमरस में मिश्री, सत्तू और जौं का आटा भी मिलाने और भलीभांति फेंटने से सोमरस मीठा और इतना स्वादिष्ट हो जाता है कि देवगण उसको छक कर पीते हैं।

बडे़ बडे़ गावा पत्थरों से कूटकर सोम को मृदभांडों के माध्यम से त्रिस्तरीय साइफनों में छाना जाता है। इनमें ऊन की छन्नियां होती हैं। छानने के पहले प्रशिक्षित लोग कूटी हुई लताओं को दोनों हाथों की दसों ऊंगलियों से मसल मसल कर भी निचोड़ते हैं। 


एक मंत्र कहता है कि शुद्ध हुआ यह सोम शुभ्र कवच की भांति गव्यादि से आच्छादित हुआ दिव्य गुणों को धारण करता है। सोमरस युद्ध के पूर्व भी पिया जाता है। और युद्ध में लेकर भी जाया जाता है। इसके पीने से जुबान से तरंगें भी निकलती हैं ।

ज्ञान ग्रंथियां खुलती हैं। बुद्धि और स्मरण शक्ति तीव्र होती है। घाव भी भर जाते हैं। सोमरस युद्धस्थल पर भी उपलब्ध कराया जाता है। कहीं कहीं शर्णयावत (कुरूक्षेत्र, हरियाणा) के तबके कई योजनों में फैले विशाल सरोवर में भी सोमपान करने का उल्लेख है। 

मित्रो कुरूक्षेत्र तो देवताओं का स्थाई यज्ञस्थल था ही। और इसी विशाल सरोवर के किनारे बाल्यकाल में बलराम और श्रीकृष्ण का मुंढन संस्कार हुआ था। इसी सरोवर के किनारे प्रथम बार (मथुरा पर जरासंध के आक्रमणों के समय) दोनों भाई पहली बार पांडवों से मिले थे, उस सुन्दर पवित्र और श्रद्धा के केन्द्र सरोवर में जाने आने के लिये बनी सीढियों, पुलों और आमोद स्थलों को औरंगजेब ने तुड़वा दिया था।


सोमरस को सुवर्ण से भी पवित्र किया जाता था। सुवर्ण का मनुष्य के प्राणों से गहरा संबंध है। अथर्ववेद में कहा गया है कि सोना पहनने वाले व्यक्ति की अकाल मृत्यु नहीं होती। हम यहां और अधिक तो लिख नहीं सकते। किंतु इतना भर बता देते हैं कि आहूति देते समय स्रुवा में जो सोना बांधा जाता है उसको कृत्सनेन कहते हैं। 

अग्नि के संपर्क से प्रतिक्रिया स्वरूप उसकी सुगंध से वायु मंडल पवित्र होता है। स्वर्ग का मार्ग भी प्रशस्त होता है। सोना कभी भी जलता नहीं है। नष्ट भी नहीं होता। संभव हुआ तो यज्ञ में स्वर्ण और सोम के संयोग पर अवश्य ही आगे चर्चा करेंगे।

यजुर्वेद में दो ऐसे मंत्र हैं, जिनसे ज्ञात होता है कि हमारे ऋषि सोमरस की ही तरह प्राकृतिक रसों से ऐसे पेय निर्मित करना भी जानते थे, जो कि प्राण और बल वीर्य वर्धक होते थे। एक श्लोक में कहा गया है कि चिकित्सक अश्विनी कुमारों और सरस्वती ने बल वीर्य (वर्धक) युक्त पशुओं के घी, दूध और सारध मथु (मधु मक्खियों) के शुद्ध शहद को मिश्रित कर इन्द्र के लिए परिश्रुत दुग्ध से शक्तिवर्धक तथा शक्तितुल्य सोम तैयार किया।

इसके पूर्व के एक श्लोक का आशय है कि इन्होंने ही दूध पर शोध करके जाना कि दूध कितना बलशाली है, जिससे कि प्रजननशील वीर्य उत्पन्न होता है। इन्होंने आमाशय में गये अन्न को नाडी़ में और पक्वाशय में गये अन्न को सुरा रस से मूल की कल्पना की।

ऋग्वेद में अश्विनी कुमारों को महान, योद्घा, ज्योतिषी चिकित्सक और मेधावी इंजीनियर बताया गया है। अश्विनी कुमार जुड़वां भाई थे। पुराणों में इनके मूल नाम नास्तय और दस्त्र हैं। यह विष्णु हरि और संज्ञा के पुत्र हैं। मनु और यम भी इनके अग्रज हैं।

मैं बहुत शोध के पश्चात इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूंँ कि यही दोनों भाई (नास्तय और दस्त्र) नेस्टरडम नामक प्रसिद्ध ज्योतिषी रहे होंगे। क्योंकि इन दोनों का अस्तित्व हजारों वर्ष पुराना है। जबकि नेस्टरडम (अंग्रेज) अथवा ईसाइयत का तो जन्म ही 2000 साल पहले हुआ है। यह पूरी कथा मैं मेरी पुस्तक "क्षीर सागर शयनम (विष्णु की आत्मकथा)" में लिख चुका हूँ।

आज की कथा यहीं तक। तब तक विदा। 
                                    धन्यवाद।

Priyam Mishra



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