“बोलो इण्डिया बोलो”

एक मोबाइल फोन कम्पनी का विज्ञापन कहता है “”बोलो इण्डिया बोलो”. सचमुच, इण्डिया को बोलने की जरूरत है. इण्डिया की आबादी में नब्बे से ज्यादा फीसदी आम लोग हैं, जिन्हें आज़ादी के इतने साल बाद भी बोलना नहीं आया है. कोई जुल्म करे, कोई बेईमानी करे, कोई सताये, कोई लूटे-खसोटे, कोई कुछ भी कर दे, नहीं बोलता. न जाने यह शुरू से ही ऐसा है कि लंबी गुलामी से हो गया.

कुछ दिन पहले एक परिचित मेरे पास आया. उसे एक सरकारी दफ्तर में कुछ काम था. उसने कहा कि आपकी जान-पहचान हो, तो यह काम करा दीजिए. रुटीन का काम था. मैंने उससे पूछा कि वह खुद जाकर यह काम क्यों नहीं करवाता? वह बोला कि मैं तो किसी दफ्तर में बात भी नहीं कर पाता.

मैं उस शख्स को अच्छी तरह जानता हूँ. वह बड़ी सुरीली रामायण गाता है. अपने मित्रों के बीच बेझिझक बोलता है. हंसी-ठिठोली भी खूब कर लेता है. फिर वह सरकारी दफ्तर में क्यों नहीं बोल पाता ?

मैंने उसे समझाया कि तुम संबंधित कर्मचारी के पास जाकर अपना काम बताओ. उससे भयभीत होने की जरूरत नहीं. यदि वह काम न करे, तो उससे इसका कारण पूछना और अगर वह टालमटोल करे, तो उसके अधिकारी के पास जाना. वह लोकसेवक है और वह तुम्हारे पैसे से वेतन पाता है.

मेरी बातों से वह आश्वस्त नहीं लगा, लेकिन असमंजस में डूबा हुआ-सा जी हाँ, जी हाँ कहकर चल दिया. मैं उस परिचित का काम करा सकता था, लेकिन मैं चाहता था कि उसकी झिझक और डर मिटे.

मैं सोचने लगा कि आजादी के इतने बरस बाद भी आम आदमी सरकारी दफ्तर और वहाँ के अमले से डरा हुआ क्यों है? वह उन्हें अपना मित्र या मददगार क्यों नहीं मान पाता ?

उस शख्स के जाने के बाद इसी सोच में डूबे मुझे अनेक घटनाएं याद आने लगीं. मैं एक जिले में पदस्थ था. दौरे पर जाता था, तो यह देखकर दु:खी और आश्चर्यचकित हो जाता था कि किस तरह दीन-हीन लोग बड़े अधिकारी के पैर छूते थे. वह अधिकारी ऐसे तना हुआ खड़ा रहता था, जैसे चरण स्पर्श कराना उसका जन्मसिद्ध अधिकार हो. शायद उसे इसीमें अपने पद की सार्थकता लगती थी. मुझे लगता था कि अगर में इतना बड़ा अधिकारी होता और कोई दु:खी मेरे पैर छूता, इसके पहले ही मैं उसे गले लगा लेता.

एक बार मैं एक बड़े अधिकारी के कार्यालय में बैठा था. इतने में पुराने, मैले कपड़े पहने एक ग्रामीण दाखिल हुआ. उसने सुबह से मिलने की परची भेज रखी थी. उसे अधिकारी ने दोपहर में अंदर बुलवाया. उसने पहले अपने जूते दरवाजे पर उतारे और एक हाथ में झोला दबाये हाथ जोड़े साहब की टेबिल तक आया. उसने कुछ कागज निकाले और थोड़ी सुविधा के लिए कांपते हाथों से झोला साहब की टेबिल के कोने पर रख दिया. साहब की भृकुटी तन गयी. वह झिड़क कर बोले “यह झोला हटा. न जाने तमीज कब सीखोगे तुम लोग”. ग्रामीण सकपका गया. अधिकारी ने उसकी दरख्वास्त पर कुछ लिखा. वह हाथ जोड़े बिना पीठ किये वापस चला गया.

इस घटना ने मुझे झकझोर दिया. मैं सोचने लगा कि हम किस सदी में जी रहे हैं? मेरे देखे, खादी का कुरता-पायजामा पहने जब कोई बिना पूछे उस अधिकारी के कमरे में धड़ाधड़ चला आता है तो यह बड़े साहब कुर्सी से उठकर खड़े हो जाते हैं. अनेक इस तरह के लोगों को मैंने उनके कक्ष में बेतकल्लुफी के साथ सिगरेट पीते देखा है. यही अधिकारी अपने से बड़े साहबों के आगे बिछ-बिछ जाते हैं. लेकिन उन्हें उस गरीब ग्रामीण का अपनी टेबिल पर झोला रख देना नागवार गुजरा. मैं सोचने लगा कि यह महाशय इस दफ्तर में किसके लिए बैठे हैं ?

कुछ दिनों पहले खबर सुर्खियों में रही कि एक राज्य के कुछ बहुत सीनियर अफसरों ने वहां की मुख्यमंत्री को अपने हाथों से जूतियां पहनायीं. कितना बड़ा विरोधाभास है।

इसी तरह के अनेक मंजर रोज़-ब-रोज़ देखने में आते हैं. मन रोकर पूछता है कि हमारे अधिकारियों की औपनिवेशिक मानसिकता और हमारे वाम के गुलामी के संस्कार कब जाएंगे ? आम आदमी को बोलना कब आएगा ?

मैं तो यही कहूंगा कि “बोलो इण्डिया बोलो।”

दिनेश मालवीय

 


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