अंतरिक्ष पर्यटन का रईसी शगल और धरती की चिंताएं.. अजय बोकिल

ajay bokilतय मानिए कि 21 वीं सदी में अमीर देशों के महाध भी नाढ्य लोगों का नया शगल अब अंतरिक्ष पर्यटन है। बावजूद इसके कि पूरी दुनिया आज कोविड 19 की महामारी से जूझ रही है, लाखों लोग प्राण गंवा चुके हैं, विश्व की 22 फीसदी आबादी के सामने रोटी, कपड़ा और मकान के लाले हैं, वैचारिक दुराग्रह हिंसक रूप में इंसानों के प्राण ले रहे हैं और मनुष्य के स्वार्थी आचरण के चलते यह पृथ्वी धीरे-धीरे उजड़ती जा रही है। लेकिन मनुष्य की आकांक्षा और लालसा अंतरिक्ष से भी ऊंची और विराट है, सो, अब वो करने का मजा लिया जा रहा है, जो कभी दूर की कौड़ी लगता था तथा जिसे परीकथाओ  में सुनकर हम बड़े हुए।




अमेरिका में व्यावसायिक अंतरिक्ष उड़ानों और आकाश से भी ऊपर श़ून्य में कुछ पल बिताने का रोमांच एक नया तथा भविष्य में और फलने फूलने वाला शौक बन रहा है। पैसा देकर अंतरिक्ष की कुछ मिनटों की सैर का रोमांच अब ‘दुनिया की सैर’ के रोमांच से कई गुना बड़ा है। कुछ वैसा ही थ्रिल, जो मनुष्य को दु‍निया की पहली रेलगाड़ी में बैठकर हुआ होगा। बीते 51 सालों में वैज्ञानिक कारणों और मनुष्य की पृथ्वीतर खोज की अदम्य इच्छा के चलते अंतरिक्ष यात्री सुदूर अंतरिक्ष में जाते रहे हैं। हजारों सालों से सौंदर्य और शीतलता के प्रतीक चांद पर आधी सदी पहले नील आर्म स्ट्रांग के रूप में मनुष्य के कदम पहली बार पड़े।

 

इसी के साथ ब्रह्मांड को सशरीर पादाक्रांत करने का विराट सपना आकार लेने लगा था, ‍जिसने अब व्यावसायिक रूप ले लिया है।


लिहाजा दुनिया के महाधनाढ्यो ने अंतरिक्ष पर्यटक कंपनियां कायम कर दीं। इनमें पहली है अरबपति बिज़नेसमैन सर रिचर्ड ब्रैनसन की ‘वर्जिन गैलेक्टिक।‘ इस कंपनी के यान वीएसएस यूनिटी में ब्रैनसन के साथ तीन और लोग अंतरिक्ष में गए थे। दूसरी अंतरिक्ष कंप‍नी है अमेजन के मालिक जेफ बेजोस की ‘ब्लू ओरिजिन।‘ तीसरी है अरबपति एलन मस्क की ‘स्पेस एक्स।‘ अंतरिक्ष टूरिज्म पर ये सारा खर्च,‍ थ्रिल और कवायद है ‘जीरो ग्रैविटी’ ( गुरूत्वाकर्षण शून्यता) के चंद मिनटो के अनुभव के लिए। मन में सवाल उठ सकता है कि अंतरिक्ष की हद कहां से शुरू होती है ?

नासा और फेडरेशन एरोनॉटिक इंटरनेशनल का मानना है कि कारमन लाइन से अंतरिक्ष शुरू हो जाता है। कारमन लाइन एक काल्पनिक रेखा है, जो समुद्र सतह से आकाश में 100 किमी ऊपर तक है। इस रेखा के पार जाने वाले अंतरिक्ष यात्री ( एस्ट्राॅनाॅट) कहलाते हैं। अगर इसे अंतरिक्ष पर्यटन में मानव प्रतिस्पर्द्धा मानें तो इस रेस में बेजोस, ब्रैन्सन से आगे रहे हैं, इस मायने में कि यान वीएसएस यूनिटी में बैठे ब्रैन्सन 86 किमी की ऊंचाई तक गए तो बेजोस का यान 106 किमी तक नाप आए। 

वैसे बोइंग कंपनी की स्टारलाइनर टेस्ट फ्‍लाइट इन दोनो को पीछे छोड़ने वाली है। उसका टूरिस्ट यान 30 जुलाई को अंतरिक्ष में 400 किमी तक जाएगा और यह अंतरिक्ष में 10 से 15 दिन तक रहेगा। लेकिन इसमें कोई इंसान नहीं होगा। यह दरअसल कुछ अंतरिक्ष सामान की डिलीवरी के लिए जाएगा। बाद में इसकी नियमित अंतरिक्ष उड़ाने भी शुरू होंगीं।



 

वैसे स्पेस टूरिज्म ( अंतरिक्ष पर्यटन) मानव द्वारा किसी पुनर्सृजन के उद्देश्य से अंतरिक्ष में की गई यात्रा को कहते हैं। यह पर्यटन भी कई प्रकार का होता है। जैसे कि आर्बिटल (कक्षीय), सब आर्बिटल (उपकक्षीय) और ल्यूनर स्पेस टूरिज्म (चंद्राकाश पर्यटन)। रशिया की रोसकाॅस्माॅस, अमेरिका की ब्लू ओरिजिन और वर्जिन गैलेक्टिक कंपनियां कक्षीय या उपकक्षीय पर्यटन ही कराती हैं। अर्थात पृथ्वी के ऊपर करीब 80 से 100 किमी की ऊंचाई पर जाकर पर्यटको को कुछ समय के लिए उस अलौकिक गुरूत्वाकर्षण शून्य और वातावरणविहीन माहौल का अहसास कराना। हालांकि अभी की यात्राएं ‘अंतरिक्ष को छूने भर’ वाली हैं।


अंतरिक्ष उड़ाने

कुछ अलग करने के जिद के साथ दुनिया इस अं‍तरिक्ष पर्यटन में एक नया बाजार देख रही है, जो धरती पर ऐशो-आराम से उकताए और कुछ बिल्कुल नया करने के इच्छुक लोगों के जुनून से भरा होगा। बताया जाता है कि वर्जिन गैलेक्टिक ने अपने यात्रा टिकट 2 से ढाई लाख डाॅलर प्रति यात्री के हिसाब से बेचे। कंपनी अब तक 600 से ज्यादा टिकट बेच चुकी है। जबकि ‘ब्लू ओरिजिन’ की दरों का खुलासा नहीं हुआ है। कुछ सस्ती स्पेस फ्लाइट्स भी हैं। जैसे कि बलून आकार के कैप्सूल से अंतरिक्ष यात्रा का खर्च सवा लाख डाॅलर प्रति सीट है। लेकिन वह अंतरिक्ष में बहुत ज्यादा अंदर नहीं जाएगा। इसके भी अगले चार सालों के लिए 300 टिकट बुक हुए बताए जाते हैं। ऐवर्जिन गैलेक्टिक’ का कहना है कि अगले साल से वह नियमित अंतरिक्ष उड़ाने शुरू करेगी।

 

जो हर साल 400 उड़ाने तक हो सकती हैं। आने वाले सालों में अंतरिक्ष पर्यटन का वैश्विक मार्केट करीब 385 अरब रू. का होने का अनुमान है। वैसे दुनिया के पहले अंतरिक्ष पर्यटक अमेरिका के डेनिस टीटो हैं। टीटो 2001 में एक रूसी सोयूज यान में सवार होकर अंतरिक्ष में गए थे। लौटने के बाद उन्होंने अपने अनुभव को ‘अद्भुत’ बताया था। टीटो को यह यात्रा 2 करोड़ डाॅलर में पड़ी थी। अमेरिकी खरबपति और टेस्ला कंपनी के मालिक ऐलन मस्क ने चांद और मंगल ग्रह पर पर्यटन का भी ऐलान कर ‍दिया है। उनकी कंपनी ‘स्पेस एक्स’ इसके लिए काम कर रही है। फाल्कन हैवी राकेट से होने वाली ये पर्यटन उड़ाने 2024 तक होने की उम्मीद है। अगर आपको चांद पर जाना है तो प्रति पैसेंजर मात्र 1 अरब डाॅलर ( करीब 75 अरब रूपए) टिकट लगेगा। जिस अपोलो 11 मिशन में नील आर्मस्ट्रांग पहली दफा चांद पर उतरे थे, उस पर 25.4 अरब डाॅलर ( आज के हिसाब से करीब 135 अरब डाॅलर) खर्च आया था। माना जा रहा है कि वक्त के साथ अंतरिक्ष उड़ाने सस्ती होती जाएंगी। हालांकि एक साइकिल या स्कूटर पर चलने वाले की जद यह अंतरिक्ष यात्रा कब आएगी, कोई नहीं बता सकता।

 

इन अंतरिक्ष यात्राओ के लिए बहुत पहले से तैयारी की जाती है, क्योंकि ये रोमांचक होने के साथ बहुत उच्च तकनीक और जोखिम से भरी हैं। इसके लिए बाकायदा लायसेंस लेना पड़ता है। अंतरिक्ष यात्रियों को प्रशिक्षण लेना पड़ता है। अमेरिका व कुछ देशो ने अंतरिक्ष पर्यटन के कानून भी बना दिए हैं। इस अंतरिक्ष पर्यटन की अनुगूंज साहित्य में भी होने लगी है। अभी तक कोई साहित्यकार अंतरिक्ष में नहीं गया है, लेकिन निकट भविष्य में अंतरिक्ष में लिखी जाने वाली कविता को ‘स्पेस पोएट्री ‘( अंतरिक्ष कविता) नाम दे दिया गया है। सवाल उठ सकता है कि धरती पर लिखी गई कविता और अंतरिक्ष में ‍लिखी या रची जाने वाली कविता में फर्क क्या है ? रचयिता तो मनुष्य ही होगा। दोनो में एक अनुभवगत मूल फर्क होगा। पृथ्वी पर लिखी जाने वाली कविता गुरूत्वाकर्षण के बीच लिखी जाती है, लेकिन अंतरिक्ष में भारहीनता और गुरूत्वाकर्षणशून्य अवस्था में कविता रची जाएगी। शारीरिक, मानसिक और संवेदना के स्तर पर इन दोनो मे क्या और कितना फर्क होगा, यह तो अंतरिक्ष कविता सामने आने के बाद ही पता चलेगा।

 

उसकी भाषा, उसका स्वरूप कैसा होगा, इसकी अभी केवल कल्पना ही की जा सकती है। कुछ जानकारों का कहना है कि वह ‘विजुअल आर्ट’ के ज्यादा करीब होगी। जब अंतरिक्ष पर्यटन की निरंतरता बढ़ेगी तो साहित्य की एक नई विधा के लिए भी हमे जगह बनानी पड़ेगी। यह भी कहा जा रहा है कि अंतरिक्ष पर्यटन एक नई वैश्विक संस्कृति को जन्म देगा, जिसकी अभी हम सिर्फ सोच ही सकते हैं। अंतरिक्ष पर्यटन के साथ कई नैतिक और सुरक्षा के सवाल भी जन्म ले रहे हैं। पहला तो यह कि मनुष्य का इस तरह अंतरिक्ष में विहार करना क्या प्रकृति के निजाम में अनाधिकार हस्तक्षेप नहीं है ? हमने धरती का बुरा हाल कर डाला है, क्या अब अंतरिक्ष में भी वही करने का मनुष्य का इरादा है ? हालांकि सकारात्मक सोच वाले इसे दूसरी नजर से देखते हैं।

 

उनका मानना है कि अंतरिक्ष पर्यटन मानव सभ्यता के विकास और प्रगति के नए द्वार खोलेगा। भविष्य की इंसानी तमन्नाअों में उस चांद पर यात्रा ( जो कवि कल्पना में कुछ और है और हकीकत में कुछ और), उसी चांद पर मानव बस्तियां बसाना, बस्तियां बसाने के लिए मनचाही जगह कब्जे करना, चांद की मिट्टी के स्पर्श और चांद की गंध ( अगर है तो) महसूस करना, चांद के उस अंधेरे हिस्से का जायजा लेना, ‍जिसके बारे में हमे ज्यादा पता नहीं है, विशाल उल्का पिंडों पर धातु खनन की संभावनाएं तलाशना और अंतरिक्ष यात्रियो के साथ लंच करना आदि। कह सकते हैं कि अंतरिक्ष यात्रा पर अरबो डाॅलर बहाने के बजाए ये रईस दुनिया की गरीबी मिटाने और शांति के लिए कुछ करते। गुरूत्वाकर्षण शून्यता के अनुभव से आम इंसान की जिंदगी कष्टशून्य कैसे होगी? इस अंतरिक्ष टूरिज्म से निर्वस्त्र और खोखली होती धरती का कितना भला होगा, यह तमाम सवाल अपनी जगह हैं, लेकिन फिलहाल ब्रैन्सन, बेजोस और मस्क जैसे महाधनाढ्यों के इस महाखर्चीले शगल को भी हम मानव मन की सुप्त आकांक्षा का साकार रूप मानें।

 

यह शगल भी है तो मनुष्य मात्र की हर बाधा पर पार पाने की अदम्य इच्छाशक्ति और अनंत सृजनात्मकता का शगल है। इसी के साल यह सवाल भी कि यह अंतरिक्ष टूरिज्म मानव सभ्यता की उड़ान का हिस्सा हैं तो हम भारतवासी इस रेस में कहां हैं? जो भी हो, जुलाई का महीना मानव सभ्यता के कैलेंडर में अंतरिक्ष माह के तौर पर दर्ज हो गया है। क्योंकि 20 जुलाई 1969 को पहली बार सचमुच मनुष्य के पैर चांद पर पड़े थे और 52 साल बाद अब दूसरे लोग भी अंतरिक्ष की सैर ‘टूरिस्ट स्पाॅट’ की तरह करने लगे हैं। और यह रोमांच तो अभी शुरू हुआ है।

 

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