भारत की आजादी में इस क्रांतिकारी महिला ने निभाई मुख्य भूमिका : अवंतीबाई लोधी

भारत की आजादी में इस क्रांतिकारी महिला ने निभाई मुख्य भूमिका : अवंतीबाई लोधी

भारतीय इतिहास में १९ वीं शताब्दी का मध्यकाल अपना विशेष स्थान रखता है। सन् १८५७ में स्वतंत्रता की जो चिंगारी भड़के उसके प्रथम चरण में जिन वीरांगनाओं का इतिहास में वर्णन मिलता है, उनमें रानी अवंतीबाई लोधी का महत्त्वपूर्ण स्थान है। मध्य प्रदेश के सिवनी जनपद में बरखेड़ा नाम की एक जागीर थी इसके जागीरदार जूझारूसिंह लोधी के यहाँ १६ अगस्त, १८३१ को कन्या का जन्म हुआ जिसका नाम अवंतीबाई रखा गया। ये अपने माता-पिता की एकमात्र संतान थीं इनकी शिक्षा-दीक्षा देशकाल के अनुसार ही हुई। रामगढ़ के युवराज विक्रमादित्य के साथ सत्रह वर्ष की आयु में इनका विवाह कर दिया गया। रामगढ़ चौदह परगनों वाला चार हजार वर्गमील में फैला राज्य था। अवंतीबाई बाल्यकाल से ही मुक्त विचारों की साहसी महिला थीं उन्होंने विवाह के समय ही अपने स्वतंत्र विचारों का परिचय देते हुए, घूँघट नहीं किया था।


उस समय यह कोई साधारण या सामान्य बात नहीं थी विवाह के बाद वे बिना पर्दा किए ही पति के साथ राज्य का भ्रमण करती और राज्य कार्य में हाथ बैटाती थीं। समय के साथ उन्होंने अमानसिंह और शेरसिंह नामक दो पुत्रों को जन्म दिया। राजा विक्रमादित्य स्वाभाविक रूप से धार्मिक वृत्ति के थे विवाह के कुछ वर्ष बाद मानसिक विकार से वे कुछ विक्षिप्त से रहने लगे। राजा साहब की इस स्थिति का लाभ उठाते हुए कूटनीतिज्ञ, चालाक अंग्रेजों ने अपनी धूर्तता पूर्ण राजनीति के नाम पर राजा विक्रमादित्य सिंह को पागल घोषित कर दिया और 'रामगढ़' को 'कोर्ट ऑफ वार्डस' के अंतर्गत लेकर उसकी व्यवस्था के लिए रेजिडेंट के रूप में एक अंग्रेज तहसीलदार की नियुक्ति कर दी। लेकिन रानी अवंतीबाई ने इसे स्वीकार नहीं किया और अद्भुत साहस का परिचय देते हुए अपने अवयस्क भावी उत्तराधिकारी-अमानसिंह की ओर से राज्य की व्यवस्था अपने हाथ में ले ही नहीं ली, बल्कि पूर्ण कुशलता से उसका संचालन भी करने लगीं।

सन् १८४८ में विवाह होने के साथ ही रानी राज-काज में हाथ बँटाने लगी थी। राजा साहेब को पागल घोषित किए जाने तक के ९ वर्ष दांपत्य जीवन में ही रानी ने जीवन की कटुता के साथ राजनीति की घनी चालों का अनुभव कर लिया था। १८४८ में विवाह हुआ और १८५७ में राजा साहब का स्वर्गवास हो गया। और २७ वर्ष की आय में ही अवंतीबाई विधवा हो गई। राजा साहब का स्वर्गवास होते हो अंग्रेजों ने अपनी राज्य-हड़प नीति के अंतर्गत रामगढ़ को हड़पने की योजना बनाई, किंतु रानी सावधान थी। १८५७ की क्रांति का शंखनाद हो चुका था। अत: अपने स्वाभिमान तथा राज्य की स्वाधीनता की रक्षार्थ रानी अवंतीबाई भी अपने देशप्रेमी राज्यभक्त साथियों के साथ स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़ी।

रानी अवंतीबाई ने मध्यप्रदेश के राजाओं और जागीरदारों को भी अंग्रेजों की कूटनीति से अवगत कराया और उन्हें भी स्वतंत्रता संग्राम में सम्मिलित होने के लिए तैयार किया। रानी के सहयोगियों में शंकर शाह और उनके राजकुमार रघुनाथसाह, उमरावसिंह लोधी, बहादुर सिंह लोधी, ठा. भगत सिंह, किशोर सिंह लोधी, पं. कर्णदेव, ठाकुर सरयू प्रसाद सिंह आदि के नाम उल्लेखनीय हैं लेकिन अंग्रेजों ने राजा शंकरसिंह और उनके पुत्र रघुनाथ शाह को बंदी बनाकर तोप से उड़ा दिया और उनका 'मंडला राज्य' छीनकर उस पर अपना आधिपत्य जमा लिया। इस घटना ने रानी अवंती बाई को झकझोर कर रख दिया। वह घायल शेरनी की तरह अंग्रेजों की टुकड़ियों पर टूट पड़ी। सबसे पहले उन्होंने अपने राज्य के अंग्रेज अधिकारी को मार भगाया।

१८५७ के नवंबर महीने में रानी ने अपनी पूरी शक्ति के साथ बिछिया, घुघरी, शाहपुरा, नारायणगंज तथा रामनगर आदि स्थानों पर हमला कर अंग्रेज सैनिकों से टक्कर ही नहीं ली, अपितु उन्हें परास्त कर उन स्थानों से भागने पर विवश भी कर दिया और इस प्रकार ये स्थान अंग्रेजों के खुनी पंजों से मुक्त हो पाए। २३ नवंबर, १८५७ को रानी अवंती बाई ने पूरे जोश और शक्ति के साथ महिला के मुख्यालय पर धावा बोल दिया जिसके फलस्वरूप खेरी के मैदान में मंडला के डिप्टी कमिश्नर कप्तान बाडिग्टन के नेतृत्व में अंग्रेज सेना से भयंकर लड़ाई हुई।

रानी तलवार चलाने में बहुत ही निपुण धी। रानी की तलवार के तीखे वार से कैप्टन तो बाल-बाल बच गया लेकिन उसके घोड़े की गर्दन कट गई और कैप्टन वाडिग्टन निचे गिर गया। उसने रानी से प्राणदान की भीख माँगी और भारतीय वीरांगना ने राजनीति की कूटनीति से अनभिज्ञता दिखाते हुए अंग्रेज जैसे चालाक दुश्मन पर विश्वास कर उसे माफ कर प्राणदान दे दिया। घबराहट में वाडिग्टन अपने छोटे पुत्र रोमियो को छोड़ कर जबलपुर की ओर भाग गया। कैंप को अधिकार में लेने पर रानी को जब उस छोटे से बच्चे का पता लगा तो उसने मानवता और मातृत्व भावना से प्रेरित होकर उसे कैप्टन वाडिग्टन के कैंप में सकुशल पहुँच दिया। इस प्रकार नवंबर १८५७ में रानी अवंतीबाई ने मंडला पर पूर्ण अधिकार कर लिया।

सन् ५७ का अंत होते-होते सारे देश में स्वतंत्रता की ज्वाला प्रज्वलित हो चुकी थी। बहुत से स्वतंत्रता सेनानी अंग्रेजों की जेलों में बंद थे और बहुतों को अंग्रेज फाँसी के तख्ने पर चढ़ा चुके थे बहुत-से गद्दार और डरपोक अंग्रेजों की शरण में जा चुके थे ऐसे ही समय में रीवा नरेश ने भी देशद्रोही बन, रानी के विरुद्ध कैप्टन बाडिग्टन का साथ दिया। कृतघ्न बाडिग्टन ने रीवां नरेश की सेना तथा भेदिया गिरधारी को लेकर ३१ मार्च, १९५८ को रामगढ़ पर हमला कर दिया। तीन दिन तक भयंकर युद्ध होता रहा किंतु बाडिग्टन लाख कोशिश करने पर भी किले में प्रवेश न कर सका। तब उसने किले की चारों ओर से नाकेबंदी कर दी, जिससे किले के अंदर भोजन तथा जल आदि की समस्या उत्पन्न हो गई। अंत में विवश होकर रानी को किला छोड़ना पड़ा। रानी अपने सेनापति उमराव सिंह तथा थोड़े-से सैनिकों के साथ सुरंग के रास्ते से निकलकर देवहर गढ़ के पर्वतीय वन की और चल पड़ी। इधर वाडिंग्टन ने किले को पूरी तरह ध्वस्त कर राजकोष को लूट लिया। लेकिन वह रानी तथा उनके बच्चों को न पा सका । दूरदर्शी रानी ने अपने अवयस्क पुत्रों को सुरक्षा की दृष्टि से पहले ही उनकी ननिहाल पहुँचा दिया था।

अंत में जब कप्तान बाडिग्टन को रानी के देवहर गाँव के पर्वतीय क्षेत्र में होने की सूचना मिली तब उसने लेफ्टीनेंट काकबर्न, हिक लॉक, बार्टन और रीवा नरेश की सेना के साथ रानी का पीछा किया और उन्हें आ घेरा। १८ दिन तक छापामार युद्ध होता रहा। कूटनीतिज्ञ कप्तान ने किले वाली नीति का फिर आश्रय लेते हुए, उस क्षेत्र की नाकाबंदी कर दी और रानी को आत्मसमर्पण करने का संदेश भिजवाया। रानी अवंतीबाई ने उत्तर में कहला भेजा कि मैं युद्ध में लड़ते-लड़ते मर भले ही जाऊँ लेकिन आत्मसमर्पण नहीं कूगी। अंततः आमने-सामने की लड़ाई प्रारंभ हो गई और २२ अप्रैल १८५८ को घमासान युद्ध जिसमें दोनों ओर के सैंकड़ों सैनिक मारे गए। रानी की बंदूक की गोली से बाडिग्टन तो वच गया लेकिन उसका टोपी  हवा में उड़ गया। वाडिग्टन की गोली रानी के हाथ में लगी, वह घायल हो गई और उसके हाथ से बंदूक गिर गई। अंग्रेजों की बंदी बनने की अपेक्षा रानी ने प्राण त्यागना अधिक उचित समझा, उन्होंने सेनापति उमरावसिंह से तलवार छीन कर अपने सीने के पार कर प्राण त्याग दिए। इसके बाद अंग्रेजों ने राज्य पर अधिकार कर उनके अवयस्क पुत्रों के लिए केवल पाँच गाँव ही छोड़े। इस प्रकार वीरांगना अवंतीबाई लोधी का देहावसान हुआ।


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