भोपाल: जंगल महकमे के सेंधवा वन मंडल में पदस्थ आईएफएस आईएस गड़रिया कटते जंगल और सिकुड़ती नदियों के दायरे से बेहद दुखी होकर भावनात्मक विचार व्यक्त किए है। डीएफओ गड़रिया मानते हैं कि पहले नदियों को देखकर गांव बसते थे और अब सड़क देखकर बस्तियों बसने लगी है।
गड़रिया द्वारा लिखे लेख के अंश -
नर्मदापट्टी की नदियाँ हिमालय से उतरने वाली नदियाँ नहीं हैं कि बर्फ पिघली और नदी बह चली। ये तो पूरी की पूरी जंगल की कोख से निकली नदियाँ हैं। इनका पानी जितना आसमान से बरसता है, उससे कहीं ज्यादा भीतर-भीतर धरती से रिसता रहता है। इसीलिए इस अंचल में जंगल की कीमत सिर्फ लकड़ी नहीं, पानी से आँकी जाती रही है।
उत्तर में विंध्याचल के पठार से लेकर दक्षिण में सतपुड़ा की घनी वादियों तक, यहाँ का हर पेड़ महज पेड़ नहीं होता। यह नदियों के लिए पानी का बैंक चलाने वाले समर्पित कार्यकर्ता की तरह काम करता है। उसकी छाँह बादलों को वह ठंडक देती है कि वे ठहरें, बरसें। उसकी जड़ें बरसात के पानी को यूँ ही भाग जाने नहीं देतीं, उसे थामकर धीरे-धीरे मिट्टी में उतारती हैं। वही पानी फिर महीनों चट्टानों, दरारों और भीतरी तहों में चलता हुआ गर्मियों में कहीं झिरिया बनकर फूटता है, कहीं सोता बनकर रिसता है, कहीं छोटी धार बनकर नदी में लौट आता है। इसीलिए नर्मदा और उसकी सहायक नदियाँ एक समय सदानीरा कही जाती थीं। जेठ-बैसाख में भी इनके कछार सूखे नहीं पड़ते थे।
लेकिन जंगल कटे तो सबसे पहले पानी की चाल बिगड़ी। विंध्याचल और सतपुड़ा के हरे मुकुट जो कभी सागौन, साल और महुए के घने वृक्षों से थे, के उतरते ही पहाड़ियाँ नंगी हुईं, मिट्टी ढीली पड़ी और पानी का मिजाज बदल गया। जो पानी पहले धीरे-धीरे धरती में उतरता था, अब सर्र से बह जाता है। पहाड़ियों से जड़ों, जड़ों से मिट्टी और मिट्टी से नदी तक पहुँचने वाली वह धीमी जल-यात्रा अब जगह-जगह टूट चुकी है। इसीलिए अब बरसात में नदियाँ अचानक बौराई हुई दिखती हैं और गर्मियों में वहीं धाराएँ जगह-जगह कहीं हाँफती, कहीं रेंगती मिलती हैं।
हर साल सिकुड़ता जा रहा नदी का सीना
इस बीच नदी को अपना मानने की भावना भी उथली पड़ गई है। जहाँ पानी जरा कम हुआ, वहीं खेत बढ़ गए। कहीं लोगों ने मेड़ खिसका ली, कहीं पक्का कमरा खड़ा हो गया, कहीं पगडंडी निकाल ली गई। इस तरह, नदी का सीना हर साल थोड़ा और सिकुड़ता चला गया। जो किनारे कभी खरबूज-तरबूज से भरे रहते थे, वहाँ अब जेसीबी के निशान दिखाई देते हैं। फिर एक समय ऐसा भी आया जब इन्हें बचाने के नाम पर ही इनके स्वभाव से छेड़छाड़ शुरू हुई। जगह-जगह स्टॉप डेम बनने लगे। इतने, कि कई इलाकों में हर एक किलोमीटर पर पानी रोकने की कोई न कोई दीवार दिखाई देने लगी। डाक्यूमेंट्स पर यह वाटर कंसर्वेशन होता है, मगर धरातल पर नदी को समझे बिना किया गया ऐसा दखल, जिसने उसके सहज बहाव को ही रोक दिया।
नदियों के पीछे की पतन का सबब रेत का धंधा
नदियाँ सिर्फ बहते पानी का नाम नहीं होतीं। उनकी अपनी ढाल होती है, अपनी गति, अपनी साँसें। वे कहाँ फैलेंगी, कहाँ गहराएँगी, कहाँ मुड़ेंगी, कहाँ रेत छोड़ेगी और कहाँ मिट्टी काटेंगी, ये सब उनके वर्षों पुराने स्वभाव से तय होता है। इधर, रेत का धंधा भी छोटी नदियों के पीछे पड़ गया है। रेत के कारोबार ने छोटी नदियों को सबसे ज्यादा घायल किया है। नर्मदा जैसी बड़ी नदी पर निगाहें रहती हैं, शोर होता है, सवाल उठते हैं। वहीं, सहायक नदियाँ अपेक्षाकृत शांत इलाकों में बहती हैं। वहाँ मशीनें कम प्रतिरोध के साथ उतरती हैं। रातों में पोकलेनें नदी की देह कुरेदती हैं और सुबह तक उसकी तलहटी बदल चुकी होती है।
अब गांव नदी नहीं, सड़क देखकर बसते हैं..
विडंबना यह है कि जिन छोटी नदियों ने सदियों तक बिना किसी डेम, बिना किसी भारी इंजीनियरिंग के इस इलाके को पानी दिया, आज वही सबसे अधिक मानवीय दखल की शिकार हैं। कहीं इन्हें जरूरत से ज्यादा रोका जा रहा है, कहीं भीतर से खोखला किया जा रहा है। और जब इतना कुछ बदल रहा है, तो इन नदियों के साथ मनुष्य का रिश्ता तो बदलना ही था। एक समय गाँव नदी को देखकर बसते थे, अब सड़क देखकर बसते हैं। पहले घरों का मुँह घाट की तरफ होता था, इन दिनों हाईवे की तरफ हो गया है।
गणेश पाण्डेय