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गहराता दुष्काल और कमजोर चिकित्सा ढांचा

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Mon , 15 Jun

सार

अंतर्राष्ट्रीय विकास नीति सलाहकार जेफ्री सैश का मानना है कि भारत ने आजादी के बाद से ही स्वास्थ्य में बहुत कम निवेश किया है। इस दुष्काल के हालात में अधिक निवेश और कुशल प्रबंधन समय की मांग है।

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विस्तार

प्रदेश और देश में कोरोना दुष्काल गहरा रहा है | आज से वेक्सिन के बूस्टर डोज लगना शुरू हो रहे हैं, देश के चिकित्सा तंत्र को अप-टू - मार्क करने की कोशिश चल रही है | अभी तक उपलब्ध आंकड़े डराने वाले है और सावधान रहने की चेतावनी दे रहे हैं |

बीते ३६ घंटों इस वायरस संक्रमण के १, ५९, ६३२ नए मामले सामने आए, जो पिछले २२४ दिन में सामने आए सर्वाधिक हैं| देश में रोगग्रस्त मरीजों की संख्या बढ़कर ५,९०,६११ हो गई है, जो १९७ दिन में सबसे ज्यादा है| देश में बीते ३६ घंटों में ३२७ लोगों की मौत होने के बाद मृतक संख्या बढ़कर ४,८३,६९० हो गई है| मध्यप्रदेश में पिछले २४ घंटे में १५७७ कोरोना पॉजिटिव मिले हैं। एक्टिव केस की संख्या बढ़कर ५०४४ हो गई है। भोपाल और इंदौर की स्थिति विस्फोटक है।प्रदेश में बढ़ते कोरोना संक्रमण पर जबलपुर हाईकोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया है। कोर्ट ने सरकार से पूछा है कि तीसरी लहर से निपटने की क्या तैयारी है? हाईकोर्ट की डबल बेंच ने राज्य सरकार से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। ऐसे में देश के चिकित्सा तन्त्र पर विचार करना जरूरी है |

अंतर्राष्ट्रीय विकास नीति सलाहकार जेफ्री सैश का मानना है कि भारत ने आजादी के बाद से ही स्वास्थ्य में बहुत कम निवेश किया है। इस दुष्काल के हालात में अधिक निवेश और कुशल प्रबंधन समय की मांग है। आज भी स्वास्थ्य सुविधाओं के मामले में दुनिया में भारत की रैंकिंग १४५ है। असल में स्वास्थ्य के मामले में हमारा रिकार्ड बहुत ही शोचनीय है। नतीजन लोगों को गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा सुविधा नहीं मिल पाती। इस बारे में हार्वर्ड हैल्थ इंस्टिट्यूट का कहना है कि फिलहाल कोरोना के खात्मे की उम्मीद दूर की कौड़ी है। इसलिए धैर्य के साथ हमें सावधानी के उपायों का पालन करना बेहद जरूरी है। देश में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली किसी से छिपी नहीं है। जीवन के अधिकार में स्वस्थ जीवन का अधिकार शामिल है लेकिन इस ओर ध्यान न दिया जाना बहुत बड़ा सवाल खड़ा करता है।

उपलब्ध आंकड़ो के अनुसार, हमारे देश में १० लाख४१ हजार३९५ एलोपैथिक डाक्टर रजिस्टर्ड हैं। हर १०,१८९ लोगों पर एक डाक्टर है जबकि डब्ल्यूएचओ ने एक हजार लोगों पर एक डाक्टर की सिफारिश की है। इस तरह छह लाख डाक्टरों की कमी है। हर ४८३ लोगों पर एक नर्स है अर्थात २० लाख नर्सों की कमी है। देश के डाक्टर मरीजों को दो मिनट का समय भी नहीं दे पाते जबकि अमेरिका, स्वीडन और नार्वे जैसे देशों में डाक्टर मरीज को २० मिनट का समय देते हैं।

देश की ९० करोड़ ग्रामीण आबादी की स्वास्थ्य संबंधी देखभाल हेतु एक लाख डाक्टर हैं। ग्रामीण इलाके में ५ में केवल एक डाक्टर ठीक से प्रशिक्षित है। दि हेल्थ वर्क फोर्स इन इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार देश में ढाई लाख हैल्थ वर्करों में से ५९.२ प्रतिशत शहरी इलाकों में जबकि ४०.८ प्रतिशत गांवों में प्रैक्टिस करते हैं। आजादी के समय हमारे यहां कुल २३ मेडिकल कालेज थे जबकि २०१६ में यह बढकर ४२१ हुए । उसके बाद खुले मेडिकल कालेजों की संख्या अलग है। देश के मेडिकल कालेजों से हर साल केवल ६० हजार डाक्टर तैयार हो पाते हैं। इस अनुपात को देखते हुए हर वर्ष १०० मेडिकल कालेज खोले जायें तब कहीं डाक्टरों की कमी पूरी हो पायेगी ।

अब देश में दवा उपलब्ध होनेकी बात करें तो सामने नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ बायोलॉजिकल्स द्वारा किया गया सर्वे सामने आता है | इस सर्वे के अनुसार बाजार में बिक रहीं ३.१६ प्रतिशत और सरकारी अस्पतालों-डिस्पेंसरियों से वितरित दवाओं में से १० .०३प्रतिशत की गुणवत्ता खराब है। जांच में सरकारी अस्पतालों-डिस्पेंसरियों की दवाओं की गुणवत्ता घटिया पायी गई। देश के निजी अस्पताल रोगियों से ज्यादा मुनाफे पर ध्यान देते हैं। इन हालातों में कोरोना दुष्काल से निबटने के लिए सतर्कता पहली शर्त है।