विधानसभा में राज्य का बजट पेश हो गया है. राज्यों के बजट अब वैसे ही नीरस हो गए हैं. टैक्सेशन और रिलैक्सेशन का थ्रिल बजट से गायब हो गया है. राज्यों की अर्थव्यवस्था कर्ज आधारित हो गई है. रूटीन खर्च भी चलाना मुश्किल हो रहा है..!!
सरकार ने जो बजट पेश किया है वह केवल प्रक्रिया का पालन सा है. पहले बजट में एकाध कविता या शेरो-शायरी हुआ करती थी. इस बार का बजट तो प्रावधानों से ज्यादा शेरो शायरी के लिए जाना जाएगा. इसकी शुरुआत प्रजा के सुख की कामना के साथ की गई है. कहा गया है- ‘प्रजासुखे सुखम् राज: प्रजानाम् च हितम हितम’
इसका अर्थ बताया है कि प्रजा के सुख में ही राजा का सुख है, प्रजा के हित में ही राजा का हित है. प्रजाहित कब राजाहित बन जाता है और राजाहित कब प्रजाहित बन जाता है, प्रत्येक पांच साल बाद जनादेश उसका सर्टिफिकेट जारी करता है.
बजट में केवल शब्दों और नारों में नवाचार तलाशा जा सकता है. सरकार की अभिलाषाएं और आशाएं अगर नारों से कोई समझ सकता है तो यह बजट काफी उम्मीदों भरा है. अर्थव्यवस्था की दृष्टि से तो विकसित मध्यप्रदेश का सपना दिखाया गया है. आत्मनिर्भर मध्यप्रदेश जैसा पहले के बजट में होता था वैसा इस बजट में भी है. सरकार की ज्ञान की परिकल्पना अब ज्ञानी तक पहुंच गई है. ज्ञान को गरीब युवा अन्नदाता तथा नारी को केंद्र में रखकर सोचा गया था. अब इसमें आई-फॉर इंडस्ट्रिलिज्म और आई फॉर इंफ्रास्ट्रक्चर को भी शामिल किया गया है.
भोपाल का मास्टर प्लान अब तक नहीं बन सका है बिना मास्टरप्लान की राजधानी के लिए मेट्रोपॉलिटन रीजन का सपना बजट में संजोया है. सरकार ने चुनावी जीत की अपनी योजनाओं को भी प्राथमिकता दी है. पेंशनर्स को महंगाई भत्ता देने के संवैधानिक कमिटमेंट से भी सरकार पिछड़ती जा रही है. अब तो विकास प्राइवेट पार्टनरशिप में चला गया है.
राज्य के औद्योगीकरण का दावा हर सरकार करती रही है, इन्वेस्टर्स समिट बेस्ट इवेंट बन गया है. जमीनी हकीकत के लिए सरकारी डॉक्यूमेंट की जरूरत नहीं है. सब कुछ लोगों को दिखाई पड़ता है. इंफ्रास्ट्रक्चर पर हर बजट में दुहाई दी जाती है और एक बरसात में ही हर बड़ा शहर दम तोड़ने लगता है.
अब तो बजट की उपयोगिता पर ही सवाल खड़े हो रहे हैं. इसे सदन में पेश करने की क्या पवित्रता बची है? सब कुछ तो पहले से पता होता है. सरकारों की आय और व्यव के साथ ही कर्ज लेने की सीमा भी निश्चित है. अगर यह सीमा न होती तो कर्ज अपनी सीमाएं तोड़ सकते थे, सरकार अपनी आय बढ़ाने पर बहुत चिंता नहीं करती. मितव्यवता तो जैसे गायब हो गई है.
बजट में बताया गया है कि वर्तमान वर्ष किसान कल्याण वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है. इसके पहले भी सरकारों ने किसान कल्याण वर्ष मनाया है, वर्ष तो निकल रहे हैं लेकिन किसानों का कल्याण अपनी मंजिल तक पहुंच ही नहीं पा रहा है. सरकार के पुराने बजट से तुलना की जाए तो इस बजट में नारे और शेरो शायरी सबसे ज्यादा हैं. कुल 11 कविता या शेरो शायरी है.
बजट को शेरो शायरी की भाषा में पढ़ा जाए तो कश्ती भी सरकार की और तूफां भी सरकार का ही है. बजट भाषण में उपमुख्यमंत्री ने नजरिया बताते हुए कहा है- ‘मौजों के थपेड़ों से डरकर जो साहिल पर रुक जाते हैं, वह लोग कहां कश्ती अपनी तूफां में उतारा करते हैं’. वे कहना यह चाहते हैं कि सरकार हर परिस्थिति में जनकल्याण के लिए कमिटेड है. कमिटमेंट कहने से ज्यादा कृत्य में दिखना चाहिए. इसमें तूफां की कल्पना है. अगर कोई तूफां सिस्टम ने देखा तो फिर उसके लिए सिस्टम ही जिम्मेदार होगा. कश्ती भी तुम्हारी है और तूफान भी तुम्हारा है. बजट भी तुम्हारा है, केवल कर्ज हमारा है.
वित्त विभाग को क्रेडिट दिया जाना चाहिए कि वह आंकड़ों से ज्यादा शेरो शायरी पर विशेषज्ञता हासिल कर रहा है. बजट में कहा जा रहा है- ‘हमारी सरकार जनता के साथ मिलकर संकट को समाधान में, मुश्किल को मुमकिन में और असंभव को संभव’ में बदल रही है. अगर इसमें से जनता के साथ के हिस्से को छिपा दिया तो फिर जो कुछ भी हो रहा है तो सरकार दोनों परिस्थितियों के लिए ही जिम्मेदार दिखाई पड़ेगी.
‘सच्चा वादा-पक्का काम, हमारी सरकार की पहचान’. यह नारा चुनावी सभाओं में लगाया जाता है. बजट में इस नारे का आशय चुनावी साधन-सामान के रूप में ही देखा जा रहा है. सरकार ऐसे नारों को अपनी पहचान मान सकती है लेकिन भुक्तभोगी तो अपनी अनुभूति पर ही चलता है, यही अस्तित्व का नियम है.
बजट की शेरो शायरी में सरकार बता रही है कि ‘पंख ही काफी नहीं होते आसमान तक पहुंचने के लिए, जुनून जज्बा हौसला भी चाहिए ऊंची उड़ान के लिए’. यह ऊंची उड़ान किसकी और किसके लिए है? सरकार की ऊंची उड़ान क्या हो सकती है? सरकार तो सेवक की भूमिका में है. ऊंची उड़ान तो सरकार के नायकों की हो सकती है. पब्लिक की उड़ान के लिए तो बजट में कोई नीतिगत व्यवस्था परिलक्षित नहीं दिखती.
उपमुख्यमंत्री ने अपनी बजट स्पीच का समापन इस पंक्ति के साथ किया - ‘दीप बन जलते रहें, पुष्प बन खिलते रहें, लोक मंगल के लिए, चलते रहें चलते रहें’. अगर यह संदेश सरकार के लिए है तो फिर सरकारें तो कभी रुकती नहीं, चलती ही रहती हैं. अगर यह जनता के लिए है तो जलने की पीड़ा भोगने के लिए कई बार मजबूर होती है.
पुष्प खिलते जरूर हैं लेकिन वे खिलने के बाद मुरझाने भी लगते हैं. अगर पब्लिक भी पुष्प के रूप में देखी जाए तो इस दृष्टि में ही उसके मुरझाने का सच है. जब पब्लिक मुरझाएगी तो फिर बजट गीत भी बदल जाएगा. इस बजट को ‘तूफां और कश्ती’ के बीच ‘नारों की मस्ती’ के रूप में आनंद की अनुभूति के साथ देखा जा सकता है.