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काशी के कायाकल्प में छिपा हिंदू धर्म स्थलों के लिए संदेश

अजय बोकिल अजय बोकिल
Updated Tue , 23 May

सार

हो सकता है प्राचीन काल में जब हमारे मंदिर बने या बनाए गए, उस जमाने में आबादी कम थी, इसलिए उनका रखरखाव आज की तुलना में बेहतर रहा हो। धार्मिक पर्यटन इतना व्यावसायिक न हुआ हो और न ही कर्मकांड को आजीविका का एकमेव आधार मान लिया गया हो।

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विस्तार

छिद्रान्वेषी आंखें इसमें बहुत कुछ देख सकती हैं, मसलन प्रधानमं‍त्री नरेन्द्र मोदी द्वारा काशी में विश्वनाथ काॅरिडोर का उद्घाटन कर यूपी विधानसभा चुनाव में भाजपा की जीत का‍ शिलान्यास करने की कोशिश है या यह 2024 के लोकसभा चुनाव में उनकी और हिंदुत्ववादी ताकतों की विजय भूमि पूजन है अथवा हर घटना के फोकस में खुद को रखने की उनकी कार्यशैली का काशी नवीनतम स्क्रीन शाॅट है, इत्यादि। हिंदू और हिंदुत्व के बीच विभाजनकारी बहस के आगाज के बीच सोमवार को काशीवासियों सहित पूरे देश और दुनिया भर के हिंदुओं ने जो देखा, उसे थोड़ा राजनीति से हटकर भी देखने की जरूरत है। क्योंकि राजनीति में विकल्प हो सकता है कायाकल्प में नहीं।

दरअसल इस बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी, विद्वानों की नगरी काशी, संत कबीर और महाकवि तुलसीदास की काशी, मूर्धन्य कवि जयशंकर प्रसाद और महान लेखक मुंशी प्रेमचंद की काशी, पंडित मदन मोहन मालवीय और उस्ताद बिसमिल्ला खां की काशी, लाजवाब बनारसी साडि़यों और उसे बुनने वाले कारीगरों की काशी, अलमस्तों की काशी और कल तक सांड, सीढि़यों और सन्यासियों से गजबजाती काशी को अपने पौराणिक और प्राचीन चरित्र के साथ एक ऐसे आधुनिक चेहरे की भी तलाश थी, जिसे निस्संदेह नरेन्द्र मोदी की संकल्प शक्ति ने अमली जामा पहना दिया है। 

जिन्होंने भी कुछ साल पहले तक की काशी और खासकर विश्वनाथ धाम को देखा है, महसूस किया है, उसमें तमाम आस्था के साथ- साथ एक कोफ्त भी घुली रहती थी कि हिंदुओं का यह पवित्रतम शहर इतना अव्यवस्थित, काफी हद तक गंदा और कुछ अराजक-सा क्यों है? क्या श्रद्‍धा का रास्ता शुचिता और सुव्यस्थितता से होकर नहीं जाता ? कम से कम आस्था की आंखें इतनी तो खुली रहनी ही चाहिए। बेशक लंबी और टेढ़ी- मेढ़ी गलियां काशी की पहचान का अभिन्न हिस्सा रही हैं, लेकिन मुझ जैसे एक सामान्य और आस्तिक व्यक्ति के मन में यह स्थायी प्रश्न उबलता रहा है कि आखिर दुनिया के तीसरे सबसे बड़े धर्म के अधिकांश तीर्थ स्थल इतने गंदे, अननुशासित, धर्म के बिचौलियों और व्यवस्था के लूट के केन्द्र क्यों हैं? हम इसे क्यों सहन करते रहते हैं? इन बुराइयों के खिलाफ हमारा धर्माभिमान क्यों नहीं जागता? क्यों एक आस्थावान हिंदू बिना किसी मध्यस्थ के  भगवान से सीधे अपने तार क्यों नहीं जोड़ सकता? ऐसा करना उसके लिए हर हाल में अनिवार्य क्यों होना चाहिए ?

हिंदू और खासकर सनातन धर्म में कर्मकांडों का अपना महत्व है। वैसे अपने-अपने तरीके से कर्मकांड सभी धर्मों में होते हैं। कहीं कम तो कहीं ज्यादा। कर्मकांड लोगों की धर्म में आस्था का प्रकट स्वरूप भी है। उसका तार्किकता से रिश्ता कम रहता है। जिसे कर्मकांड में अटूट विश्वास हो, वो बेशक करे, लेकिन कर्मकांड और आस्था के बीच एक पुल ऐसा भी तो हो, जहां से गुजरकर श्रद्धालु सीधे आराध्य से आध्यात्मिक संवाद कर सके।  

हो सकता है प्राचीन काल में जब हमारे मंदिर बने या बनाए गए, उस जमाने में आबादी कम थी, इसलिए उनका रखरखाव आज की तुलना में बेहतर रहा हो। धार्मिक पर्यटन इतना व्यावसायिक न हुआ हो और न ही कर्मकांड को आजीविका का एकमेव आधार मान लिया गया हो। चंद उदाहरण ऐसे भी हैं, जहां विपरीत परिस्थितियों में भी धर्म स्थलों को सहेजे रखने का काम पंडे-पुजारियों ने ही मुख्य रूप से किया। 

बावजूद इन सबके इस बात पर जोर कम ही रहा कि हमारे धर्म स्थल अपने आप में सौंदर्य दृष्टि, शुचिता और अनुशासन भी लिए हों। जिन नदी तालाबों के किनारे ये मंदिर बने, वो भी उतने ही निर्मल रहें। देवस्थान कचरे के ढेर और भिखारियों के फेर से मुक्त रहें। भूखों को भरपेट भोजन दें लेकिन धर्मस्थलों के प्रवेश द्वारों को लाचार चेहरों से मुक्त करें। दक्षिणा धर्मकार्य के लिए श्रद्धालु का योगदान मानी जाए, भीख नहीं। प्राकृतिक सुंदरता के साथ हमारा सामाजिक व्यवहार भी उतना ही सुंदर हो। हमारे यहां कई मंदिर प्रकृति से संवाद के उद्देश्य से दुर्गम पहाड़ों, घने जंगलों या फिर समुद्र किनारे भी बने हैं, लेकिन इनकी संख्या सीमित है। बीती एक सदी में तो हर कहीं मंदिर खड़े करना और चलाना भी एक धंधा बन गया है। कोई कहीं भी सिंदूर पुता पत्थर या मूर्ति रखकर भक्तों के चढ़ावे का हिसाब रखने लगता है। ऐसे कथित मंदिरों में विधिपूर्वक प्राण प्रतिष्ठा भी नहीं की जाती। यह अंधी श्रद्‍धा ही है कि फिर भी वहां लोग मत्था टेकने में गुरेज नहीं करते।

इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि हिंदू धर्मस्थलों के रखरखाव, समुचित प्रबंधन को लेकर कोई निश्चित नियम और सुसंचालित तंत्र या आचार संहिता नहीं है। कुछ बड़े मंदिरों में पुजारियों की नियुक्ति और पूजन शैली का शास्त्रोक्त विधान है, लेकिन श्रद्धालु फ्रेंडली और श्रद्धालुओं की गहन आस्था का आदर करने वाली व्यवस्थाएं बहुत कम हैं। यहां भी उत्तर भारत की तुलना में दक्षिण के मंदिरों में अवश्य बेहतर प्रबंधन दिखता है। 

कहने का आशय यह कि अगाध श्रद्धा, कर्मकांड, भव्यता, स्वच्छता, सुंदरता के आग्रह, सुविधा और अत्याधुनिक अधोसरंचना में भी सुंदर तालमेल स्थापित किया जा सकता है। काशी के कायाकल्प ने इस सोच की अमिट और प्रेरक इबारत लिख दी है। धर्मनगरी के इस कायांतरण ने इस विचार को गति दी है कि क्यों न हिंदुओं के सारे धर्म स्थल ऐसे ही भव्य, स्वच्छ, निर्मल और दर्शनीय बनें। क्यों लोग धक्के खाकर देवदर्शन के लिए जाएं? क्यों पवि‍त्र नदियो में डुबकी लगाने से पहले एकक्षण उसके जल की शुद्धता को लेकर मन में संदेह पैदा हो, क्यों पूजन सामग्री और अन्य वस्तुओं की दरों को लेकर आस्थावान मन में धुकधुकी हो? क्यों शीघ्र दर्शन के लिए हमे किसी शाॅर्ट कट या सिफारिशों का सहारा लेना पड़े? आखिर भगवान के घर में ऐसी ऐहिक बुराइयों का डेरा क्यों?

ऐसे में काशी का कायाकल्प को महज चुनावी चौपड़ के सीमित दायरे में देखना सही नहीं होगा। यकीनन प्रधानमंत्री नरेन्द्र ने अपने कार्यकाल के दौरान ही असंभव से लगने वाले इस काम को शुरू कर के उसे अंजाम तक पहुंचाया है। क्योंकि परंपरावादियों और अधार्मिकों की आलोचना काम में रोड़े अटकाती है। क्योंकि इसमें उनके निहित स्वार्थ जुड़े होते हैं। लेकिन मोदी ने विश्वनाथ काॅरीडोर के निर्माण के साथ न सिर्फ आलोचकों का मुंह बंद किया ‍बल्कि साथ ही उन तमाम राजनेताओं के सामने यह नजीर भी पेश कर दी है कि संकल्प शक्ति हो तो कुछ अच्‍छे स्थायी काम भी किए जा सकते हैं। साथ में यह भी कि धर्म में आस्था का अर्थ केवल देवों के आगे सिर झुकाना ही नहीं होता, धर्मस्थलों को उनकी समुचित गरिमा प्रदान करना भी होता है। खुद को धर्मप्राण दिखाना ही पर्याप्त नहीं है, आस्था केन्द्रों को समय की कसौटी पर खरा उतारना भी जरूरी है।  

हो सकता है कि पुरानी काशी के माहौल में रचे बसे लोग इस नई काशी और विश्वनाथ काॅरीडोर में खुद को खोया-खोया सा महसूस करें। लेकिन जो बदलाव पूरे पर्यावरण में दिख रहा है, वो महज राजनीतिक नहीं है,भौतिक है। इसमें शक नहीं कि बाबा विश्वनाथ का जलाभिषेक करके प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने करोड़ों हिंदुअोंके मन में अपना स्थान फिर से आरक्षित कर लिया है। इस पूरी और आगे तक चलने वाली परियोजना का  संदेश भले चुनावी ही क्यों न हो, लेकिन इस सवाल को जन्म देता है कि इसके पहले किसी ने ऐसा करने का साहस क्यों नहीं दिखाया? आस्था पर संकल्प शक्ति हावी क्यों न हो सकी? बाबा विश्वनाथ से किसी ने ऐसा कुछ क्यों नहीं मांगा? खुद मोक्ष पाने की इच्छा रखने वालों ने उस गंगा की गुहार क्यों नहीं सुनी, जो खुद को गंदगी से मुक्त कराने की बात बार कह रही है ( हालांकि गंगा को पूरी तरह प्रदूषण मुक्त करना अभी भी दूर की कौड़ी है)  बहरहाल बाबा विश्वनाथ के दर्शन से भी ज्यादा दो दूरगामी संदेश काशी के कायाकल्प ने लिखे हैं। पहला तो इस सुंदर काॅरीडोर के निर्माण में लगे उन कारीगरों के साथ बैठकर प्रधानमंत्री का भोजन करना ( इनमें कई मुस्लिम भी हैं) और दूसरे कम से कम काशी के गंगा घाटों पर निर्मल होती गंगा पर चलती फेरी के आगे बेखौप उड़ता पक्षियों का हुजूम। लग रहा था मानो ये पक्षी भी काशी के कायाकल्प से मुग्ध हैं और अपने पीएम के स्वागत में बार-बार उड़ान भर रहे हैं। काश, ऐसे दृश्य हमे हर हिंदू धर्मस्थल पर देखने को मिलें। क्योंकि मोदी रहें न रहें, भाजपा सत्ता में रहे न रहे, धर्मस्थल तो सदियों से हैं और रहेंगे। बशर्तें हम ऐसा चाहें।