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कोरोना की दूसरी लहर के कहर से शुरु हुआ और तीसरी लहर के डर पर खत्म हो रहा साल 2021...

सार

फिलहाल तो हम यह स्वीकार करने को मजबूर हैं कि साल 2021 पर कोरोना का कहर भारी पड़ा है। दूसरी लहर ने हमें बहुत दर्द दिया है और तीसरी लहर ने 2021 के जाते-जाते आमद देकर एक बार फिर डर से भर दिया है।

janmat

विस्तार

साल 2021 में मध्यप्रदेश में कोरोना की दूसरी लहर का कहर लाखों लोगों की जिंदगी में कड़वाहट घोल गया। कई परिवारों के चिराग बुझ गए और अब मां-बाप की आंखों में कभी खत्म न होने वाला अंधेरा कायम है। उनके दामन से खुशियां हमेशा-हमेशा के लिए विदा हो गई हैं। तो कई घरों के कर्ताधर्ता कोरोना के क्रूर शिकंजे में दम तोड़ने पर मजबूर हो गए। पूरा परिवार अनाथ हो गया है। वह खौफनाक मंजर आंखों में कैद हो गए, जब श्मशान घाटों पर लगातार जलती चिताओं की लपटों की आंच से आकाश भी भय खा रहा था। अपनों के खोने से आंखों की नमी अभी गई भी नहीं थी कि साल खत्म होते-होते तीसरी लहर की आहट ने एक बार फिर सरकार और प्रदेशवासियों की नींद उड़ा दी है और चैन छीन लिया है। ताबड़तोड़ बैठकों का दौर जारी है। पुख्ता व्यवस्थाओं की पुरजोर कोशिश हो रही है। पर कोरोना की तीसरी लहर फिर किसी विकट संकट की ओर इशारा कर रही है। ईश्वर करे कि सड़कों पर सन्नाटा होने की नौबत न आए। पहली लहर में बुजुर्गों, दूसरी लहर में जवानों को शिकार कर दर्द में डुबो चुका कोरोना तीसरी लहर में बच्चों की तरफ आंख उठाने का दुस्साहस न कर सके। अस्पतालों में ऑक्सीजन, दवाओं और फीवर क्लीनिक में टेस्टिंग के पर्याप्त इंतजाम किए जा रहे हैं। पर दुश्मन के रूप में कोरोना को कभी भी कमतर नहीं आंका जा सकता। डरने की बात नहीं है लेकिन सावधानी, सतर्कता में ही सुरक्षा है, इस बात को नहीं भूलना चाहिए। 2021 से सीख लेकर हमें 2022 को संवारना है ताकि आंखें नम न हों और अपनों को खोने का गम किसी के भी हिस्से में न आ सके। 2021 में बच्चों ने ऑनलाइन कक्षाओं के जरिए पढ़ाई की, तो सितंबर के बाद फिर से स्कूलों-कॉलेजों में फिजिकल क्लास लगना शुरू हुई थीं। दिसंबर आते-आते अब फिर वही परिस्थितियां बन गईं हैं कि नए साल में शायद ही कोई अभिभावक अपने बच्चों को जनवरी में स्कूल भेजने के कठोर फैसले पर अमल कर सके।

 

मध्यप्रदेश के पुलिस महकमे के लिए साल 2021 इस मायने में उपलब्धि के रूप में दर्ज है कि सालों बाद भोपाल-इंदौर में पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू हो गई। हालांकि इन्हें यह मलाल भी होगा कि दूसरे राज्यों की तुलना में ड्राफ्ट बहुत कमजोर बना है। तो यह साल मध्यप्रदेश के खाते में केन-बेतवा लिंक परियोजना की सौगात भी देकर जा रहा है। जिससे उम्मीद की जा रही है कि बुंदेलखंड हरा-भरा होकर पलायन, गरीबी और बदहाली से छुटकारा पाएगा। पर यह अभी दूर के ढोल सुहावने जैसी बात ही है। अभी तो परियोजना का भूमिपूजन ही नहीं हुआ है और फिर कब तक यह पूरी होगी, यह वक्त ही बताएगा। मध्यप्रदेश में यह साल ओबीसी वर्ग को अलग पहचान दिलाने वाला जरूर रहा है। पहले सरकार ने ओबीसी को नौकरियों में आरक्षण 14 फीसदी से बढ़ाकर 27 फीसदी करने का तोहफा दिया। तो बाद में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर पंचायत चुनाव में ओबीसी आरक्षण रद्द होने पर सरकार ने विधानसभा में सर्वसहमति से संकल्प पारित किया। सरकार की इस मंशा के मुताबिक ही कि बिना ओबीसी आरक्षण पंचायत चुनाव न हों, अब प्रदेश में पंचायत चुनाव रद्द हो चुके हैं। ओबीसी वर्ग का सम्मान कायम हुआ है तो मतदाता के रूप में उनकी ताकत को प्रदेश में नई पहचान मिली है। इससे पहले जनजातीय गौरव दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में मध्यप्रदेश में आदिवासी वर्ग के सम्मान की नई इबारत भी प्रदेश में लिखी जा चुकी है। यह साल जाते-जाते निगम-मंडल में नियुक्ति कर नेताओं को खुश होने का मौका भी दे गया।

 

यह जिक्र करना भी जरूरी है कि दिसंबर के महीने में तमिलनाडु के कुन्नूर में हुई हैलीकॉप्टर क्रैश दुर्घटना ने देश को रुलाया। सीडीएस बिपिन रावत, उनकी पत्नी मधुलिका रावत और अन्य बारह सैन्य अफसर-जवानों की शहादत से सभी राष्ट्रभक्त देशवासियों का दिल टूटा। इसमें मधुलिका रावत का नाता मध्यप्रदेश के शहडोल जिले से था, तो शौर्य चक्र विजेता वरुण सिंह भोपाल से जुड़े थे और सीडीएस के सुरक्षा अधिकारी जितेंद्र कुमार वर्मा भी सीहोर जिले से जुड़े थे। यह साल मध्यप्रदेश के सिंगरौली जिले में हुई भयावह बस दुर्घटना के लिए भी हमें रुलाएगा। यह साल हमें जहरीली शराब से हुई मौतों के लिए भी डराएगा। यह साल हमें शराबबंदी की बात शुरु होने की याद भी दिलाएगा। यह साल हमें उपचुनाव परिणामों में दमोह और रैगांव में कांग्रेस की और पृथ्वीपुर, जोबट, खंडवा में भाजपा की जीत की याद दिलाता रहेगा तो कोरोना में छिने नेताओं नंदकुमार सिंह चौहान, जुगल किशोर बागरी, बृजेन्द्र सिंह राठौर, कलावती भूरिया की कोरोना से मौत की बुरी खबर भी सुनाता रहेगा। याद करने को वाकये कई और भी हैं लेकिन फिलहाल तो हम यह स्वीकार करने को मजबूर हैं कि साल 2021 पर कोरोना का कहर भारी पड़ा है। दूसरी लहर ने हमें बहुत दर्द दिया है और तीसरी लहर ने 2021 के जाते-जाते आमद देकर एक बार फिर डर से भर दिया है। साल के अंतिम दिन हमारी आंखें अपनों को खोने के गम में नम हैं और अब नई चुनौती से जूझने पर नजर गढ़ाए हुईं हैं।