• India
  • Fri , May , 15 , 2026
  • Last Update 05:41:PM
  • 29℃ Bhopal, India

असंतोष का बीज हाईकमान ही करता फ्रीज

सार

सभी चुनावी राज्यों में सीएम की शपथ के बाद सबसे अंत में कांग्रेस केरलम में अपना सीएम घोषित कर पाई है. भले ही मुस्लिम लीग और दूसरे सहयोगियों के दबाव में कांग्रेस का फैसला सही माना जा रहा हो, लेकिन परसेप्शन यही बना है, कि राहुल गांधी अपने चहेते के.सी, वेणुगोपाल को चाहते हुए भी सीएम नहीं बना पाए..!!

janmat

विस्तार

    राहुल गांधी को मजबूरी में सहयोगियों और राज्य के नेताओं के दबाव में वी. डी. सतीशन को ही विधायक दल का नेता सेलेक्ट करना पड़ा. 

    अब तक कांग्रेस में ऐसा संभव नहीं हो पाता था. जिस नेता को गांधी परिवार का समर्थन होता था, उसको ही मौका मिलता था. अगर कांग्रेस को सतीशन के पक्ष में ही फैसला करना था, तो फिर यह फैसला तो तिरुवनंतपुरम  ही  लिया जा सकता था. वेणुगोपाल कांग्रेस के संगठन महामंत्री के महत्वपूर्ण पद पर हैं. उन्हें ही राहुल गांधी और पार्टी के बीच संवाद की धुरी माना जाता है. 

    कांग्रेस के पर्वेक्षकों ने हाईकमान को जो रिपोर्ट दी उसमें यही बताया गया, कि विधायकों में बहुमत का समर्थन वेणुगोपाल के साथ है. यह इसलिए भी सही है क्योंकि टिकट वितरण में उनकी भूमिका थी, इसलिए अधिकांश विधायक उनके पक्ष में होंगे. कांग्रेस को वहां स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है. सहयोगियों के साथ गठबंधन को बहुमत मिला है. 

    गठबंधन का सबसे बड़ा सहयोगी मुस्लिम लीग है. उसका समर्थन सतीशन के साथ था. जब नेता चुनने में विलंब होने लगा, तब पूरे राज्य में राहुल और प्रियंका गांधी के विरोध में प्रदर्शन प्रारंभ हो गए. प्रियंका गांधी के संसदीय क्षेत्र वायनाड में चुनाव जीतने के लिए मुस्लिम लीग का सहयोग अनिवार्य है. इस इलाके में पोस्टर लगाकर विरोध शुरू कर दिया गया. यह कहा जाने लगा कि अगर जनमत की भावनाओं के अनुरूप नेता का चयन नहीं किया गया तो वायनाड को अमेठी बना दिया जाएगा. इसका मतलब है, गांधी परिवार के किसी सदस्य को वहां से चुनाव जीतना मुश्किल हो जाएगा. 

    परसेप्शन यही बना रहा, कि गांधी परिवार खासकर राहुल गांधी वेणु गोपाल को ही सीएम बनाना चाहते थे. ऐसा भी सामने आया कि इस मामले में राहुल गांधी प्रियंका गांधी और सोनिया गांधी के बीच वैचारिक मतभेद रहे. अंततः कांग्रेस ने जो भी फैसला लिया है, वह पार्टी और राज्य के हित में सही फैसला दिखाई पड़ रहा है. इस फैसले के दूरगामी प्रभाव भविष्य में पार्टी की रणनीति पर पड़ेंगे.

    ऐसा पहली बार हुआ है कि राज्य के दबाव में गांधी परिवार को मन मुताबिक फैसले से पीछे हटना पड़ा है. अभी तक तोजिन भी राज्यों में कांग्रेस को सरकारें बनीं वहां वही नेता बनने में सफल हुआ है, जिसको गांधी परिवार चाहता था. जन भावनाओं और गांधी परिवार की चाहत के द्वंद में बने सीएम अभी भी राज्यों में असंतोष का सामना कर रहे हैं.

    राज्यों में सरकार बनाने से ज्यादा टेंशन कांग्रेस को सीएलपी लीडर चुनने में आती है. यह लंबा सिलसिला है. कर्नाटक में तो इस तनाव से बचने के लिए सीएम और डिप्टी सीएम का ढाई-ढाई साल का फार्मूला निकाला गया. ढाई साल पूरा होने के बाद भी राहुल गांधी अपने इस फॉर्मूले को लागू नहीं करवा पाए है. इसका असंतोष राज्य में पार्टी और उसकी सरकार के परफॉर्मेंस पर साफ-साफ दिखाई पड़ रहा है. अगले चुनाव में भी इसका दुष्प्रभाव देखने को मिलेगा. 

    इसी प्रकार पंजाब, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भी सीएम के सिलेक्शन में पैदा हुए असंतोष के कारण कांग्रेस को राज्यों में सत्ता गंवानी पड़ी. पूरे पांच साल नेताओं के बीच टकराहट चलती रहती है, खासकर सीएम और डिप्टी सीएम के बीच द्वंद चलता रहता है. छत्तीसगढ़ में भी यही हुआ. राजस्थान में तो अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच खुलेआम विद्रोह के हालात बने.

    मध्य प्रदेश में सीएम के सिलेक्शन में कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया, गुटों के बीच जो असंतोष पनपा वह पंद्रह महीने सरकार के पतन पर जाकर समाप्त हुआ. हिमाचल प्रदेश में भी नए सीएम के चयन के बाद विधायकों ने विद्रोह किया. वहां भले ही सरकार बचाने में कांग्रेस सफल हुई, लेकिन अगले चुनाव में पार्टी में व्याप्त असंतोष नतीजों में साफ दिखाई पड़ सकता है.

    राहुल गांधी और कांग्रेस का पूरा आलाकमान अगर एलडीएफ सरकार के खिलाफ पिछले पांच वर्षों में सतीशन के नेतृत्व में चलाए गए अभियान और रणनीतियो के जमीनी प्रभाव से सीधे कनेक्ट होता तो उसे नया सीएम चुनने में बिल्कुल समय नहीं लगता. वेणुगोपाल और रमेश चेन्नीथला जैसे नेता जो एलडीएफ सरकार के खिलाफ अभियान में जनमत के केंद्र में नहीं थे, वह विधायकों के समर्थन के दम पर सीएम का पद हड़पना चाहते थे. गांधी परिवार के साथ वेणुगोपाल की निकटता के कारण नेता के चयन का मामला इतना लंबा खिंचा कि इन दस दिनों में केरलम में कांग्रेस पार्टी और संगठन के बीच असंतोष के बीज पनपे हैं, जो अगले पांच साल सरकार के संचालन में अपना प्रभाव दिखाएंगे.

        केरलम राजनीतिक रूप से जागरूक प्रदेश है. वहां हिंदू, मुस्लिम, क्रिश्चियन ध्रुवीकरण भी चरम पर है. शिक्षा के साथ ही डिजिटल साक्षरता भी सबसे ज्यादा है. डिजिटल नफरत भी केरलम में साफ दिखाई पड़ती है. वहां पर तुष्टिकरण और ध्रुवीकरण की राजनीतिक प्रक्रिया भी लंबे समय से चलती रही है. अब उसमें बीजेपी भी एक प्रभावी प्लेयर के रूप में आगे बढ़ती दिखाई पड़ रही है. बीजेपी के तीन विधायकों का जीतना केरलम की भविष्य की राजनीति की दिशा का जरूर संकेत कर रहा है.

    केरलम में सीएलपी लीडर के सिलेक्शन में कांग्रेस हाई कमान की कमजोरी भी प्रदर्शित हुई है. पहली बार कांग्रेस में ऐसा हुआ है, कि जन भावनाओं के दबाव में गांधी परिवार को अपने मन के फैसले को बदलना पड़ा है.    

    सतीशन को मुख्यमंत्री के रूप में चुनने के पहले कांग्रेस हाई कमान ने जो हिचकिचाहट दिखाई. जो लंबा समय लगाया उसने पार्टी की केरलम में चमकदार छवि को भी प्रभावित किया है.