पेपर लीक परीक्षाओं का अलिखित संविधान बन गया है. छोटी-छोटी परीक्षाओं में तो होता ही था. अब तो नीट जैसी नेशनल परीक्षा भी पेपर लीक की बलि चढ़ रही है..!!
इस साल की नीट यूजी परीक्षा में शामिल 22 लाख विद्यार्थियों को फिर से परीक्षा देना पड़ेगा. पेपर लीक के कारण इस परीक्षा को रद्द कर दिया गया है. यह कोई पहला अवसर नहीं है, जब नीट की परीक्षा के पेपर लीक हुए हैं. इसके पहले कई बार ऐसा हो चुका है. दो साल पहले भी पेपर लीक हुआ था. उस समय सरकार की ओर से परीक्षा को फुल प्रूफ बनाने के लिए बहुत सारे नियम, कानून और प्रक्रियाओं के वायदे भी किए गए थे. और पहल भी की गई थी. अब एक बार फिर माफिया ने सरकार के सारे सिस्टम को धता बताते हुए पेपर लीक कर दिया है.
लीक का मामला परीक्षा के दिन से ही सोशल मीडिया पर आने लगा था. पहले तो इसे अफवाह माना जाता रहा. फिर बाद में जब राजस्थान में जांच में इसे सही पाया गया तब अब परीक्षा रद्द की गई है. इस मामले की जांच सीबीआई को सौंपी गई है. यह भी ऐलान किया गया है कि अब जो परीक्षा होगी उसमें विद्यार्थियों से कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा.
पेपर लीक ऐंट्रेंस परीक्षा में होता है, भर्ती की परीक्षाओं में होता है. देश में कई परीक्षाएं होती हैं. सबसे प्रतिष्ठित यूपीएससी की परीक्षा है. कैट की परीक्षा है.अब तक इन परीक्षाओं के पेपर लीक होने की घटनाएं सामने नहीं आई हैं. जब एक परीक्षा का टेस्टेड सिस्टम सरकार के पास उपलब्ध है, तो फिर इस सिस्टम को सभी परीक्षाओं में लागू क्यों नहीं किया जाता.
शिक्षा जो कभी भविष्य निर्माण की नींव थी, अब माफिया की नींव बन गई है. कोचिंग इंस्टिट्यूट का एक ऐसा जाल बिछ गया है, जो किसी भी परीक्षा को पवित्र नहीं रहने देता. कोई भी कानून लालच को तो नहीं रोक सकता है. पेपर लीक की घटनाओं से युवाओं का मनोबल टूटता है. सिस्टम पर भरोसा टूटता है. माफिया का शिकंजा बढ़ता है. माफिया अपना विस्तार करने में सफल होता है.
पेपर लीक का राजस्थान एपिक सेंटर बना हुआ है. इस बार भी राजस्थान से ही लीक होना पाया गया है. अब वहां बीजेपी की सरकार है. पहले जब कांग्रेस की सरकार थी तब भी पेपर लीक की बड़ी घटनाएं हुई थीं. बीजेपी ने चुनाव में इसे बड़ा मुद्दा भी बनाया था. सरकार तो अब बदल गई, लेकिन पेपर लीक की घटनाओं में कोई बदलाव नहीं आया. माफिया जो पहले था वही माफिया अभी भी काम कर रहा है. माफिया को सरकारों से अलग करके देखना अब सत्यता से दूर लगता है. हर तरह का माफिया जब समाज की नजर में होता है, तब सरकारी तंत्र की नजर से दूर कैसे रह सकता है. इसका तो एक ही मतलब हो सकता है कि तंत्र आंखें मूदें रहता है, उसकी मिली भगत रहती है. बिना मिली भगत के कोई भी माफिया ना पनप सकता है, ना ही अपने काम को अंजाम दे सकता है.
कोई घटना होना उतना चिंतनीय नहीं है, जितना उसकी बार-बार पुनरावृत्ति होना. नीट के मामले में भी पिछले वर्षों में पेपर लीक की कितनी घटनाएं हो चुकी हैं. इसका मतलब है, कि सरकार व्यवस्था सुधारने की जो भी प्रयास करती है, वह भी माफिया को रोक नहीं पा रहा है. इसका इशारा यही है, कि माफिया को कंट्रोल करना अब सरकारी सिस्टम के बस की बात नहीं बची है. पेपर लीक की बड़ी-बड़ी घटनाएं आए दिन सामने आती हैं. लेकिन छोटी-छोटी परीक्षाओं में तो जो पक्षपात किया जाता है, उसका तो कोई हिसाब ही नहीं होता. कुछ समय पहले तक तो यह ट्रेंड बना हुआ था, कि परीक्षाओं में किसी के नाम पर कोई और परीक्षा में बैठ जाता. मध्य प्रदेश में तो व्यापम के नाम पर बहुत बड़ा कांड हुआ था. इस पर जितनी राजनीति हुई, उतना उसमें शामिल माफिया या दोषियों को सजा नहीं हो पाई. ज्यादातर दोषी अदालतों से बरी हो गए.
नीट की परीक्षा के पेपर लीक होने के मामले पर भी हमेशा की तरह राजनीति हो रही है. हर पार्टी के नेता इसके लिए सरकार पर हमला कर रहे हैं, वह यही इशारा और संकेत कर रहा है कि युवाओं को सड़कों पर उतरना चाहिए. सरकार के खिलाफ आंदोलन करना चाहिए. जन आंदोलन से व्यवस्था में सुधार के लिए दबाव तो पड़ता है, लेकिन जन आंदोलन की सियासत ने भी देश को निराश किया है.
आम आदमी पार्टी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जो पार्टी करप्शन के खिलाफ आंदोलन से पैदा हुई थी, उसके मुखिया को करप्शन के मामले में जेल जाना पड़ा.
यह कहना गलत नहीं होगा, कि हर घटना और माफिया के पीछे राजनीति होती है और राजनीति के पीछे माफिया संसदीय व्यवस्था में जनादेश सरकारों में परिवर्तन कर अपनी अपेक्षा पर खरा उतरने के लिए हर दल को मौका देता है. ऐसा कोई प्रमुख दल इस समय देश में नहीं है जो कभी ना कभी सत्ता में ना रहा हो.
अब तो देश को ऐसा लगने लगा है कि शायद कुछ बुराइयां सत्ता की हैं. उस पर जो भी बैठेगा उसमें वहां बुराई आना एक अनिवार्यता है. ऐसी अनिवार्यता में ही माफिया की भूमिका भी देखी जा सकती है.
परीक्षाओं में पारदर्शिता सरकारों की प्राथमिक जिम्मेदारी है. अवसरों की वैसे ही कमी है. जो अवसर उपलब्ध हैं, उनमें भी पेपर लीक के कारण विलंब हो, पारदर्शिता में अभाव के कारण पात्र का अधिकार छिने इससे बड़ा कोई दूसरा पाप नहीं हो सकता.
बहुमत की राजनीति में हर घटना का राजनीतिक उपयोग भी अब लोगों को परेशान कर रहा है. राजनीतिक विश्वसनीयता का अभाव सरकारों की विश्वसनीयता को भी प्रभावित कर रहा है.