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देश रोजगार की बात, सरकार भी मानने लगी

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Sun , 20 Apr

सार

इस रिपोर्ट की एक खास बात यह है कि इसमें यह कहा गया है कि हमारे लिए विषमता पर उतना ध्यान न देकर यह देखना अधिक जरूरी है कि गरीबी की क्या स्थिति है और उसके निवारण के लिए क्या किया जा सकता है? लेकिन ऐसा कर पाना संभव नहीं है क्योंकि विषमता लगातार बढ़ रही है तथा गरीबी बढ़ाने में वह भी एक कारक है.

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विस्तार

प्रतिदिन                                                                          

और अब प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद भी शहर में रोजगार के अवसर बढ़ाने की बात कहने लगी है | आर्थिक सलाहकार परिषद द्वारा जारी रिपोर्ट 'भारत में विषमता की स्थिति' में भी सुझाव दिया गया है कि शहरों में मांग पर आधारित रोजगार गारंटी योजना लागू की जाए कुछ वर्षों से ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना की तरह शहरी क्षेत्र में भी ऐसी व्यवस्था लागू करने के बारे में चर्चा भी होती रही है| शहरों में मांग पर आधारित रोजगार गारंटी योजना लागूहोना चाहिए , जिससे अधिशेष श्रम का उपयोग भी हो सके और कामगार तबके की आय में योगदान हो सके| किसी भी आंकड़े को उठाकर देखें, तो अंदाजा लगा सकते हैं कि गरीबी रेखा से ऊपर के लोगों की स्थिति भी अच्छी नहीं है| विभिन्न अध्ययनों और सूचकांकों देखते हुए यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि बीते सालों में आमदनी में कोई सुधार नहीं हुआ है|दुष्काल  के दौर में तो गरीबी बढ़ी है और आमदनी में कमी आयी है|  सभी क्षेत्रों में महंगाई ने इस स्थिति को और बिगाड़ दिया है|अब सरकार पेट्रोलियम क्षेत्र में  राहत की बात कह रही है,परन्तु  सरकार के इस कदम में देर हो चुकी है|

याद कीजिये,वर्ष २०१६-१७  की आर्थिक समीक्षा में तत्कालीन मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम ने प्रस्तावित किया था कि हर गरीब व्यक्ति को हर साल ७६२० रुपये दिया जाना चाहिए| इस प्रस्ताव का उद्देश्य तेंदुलकर समिति द्वारा निर्धारित गरीबी रेखा से वंचित आबादी को ऊपर उठाना था| आर्थिक सलाहकार परिषद की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सामाजिक क्षेत्र में बजट आवंटन बढ़ाया जाना चाहिए, जिससे निम्न आय वर्ग के लोगों को गरीबी की चपेट में आने से बचाया जा सके| अब जो हो रहा है, उसमें  देर हो गई है |

इस. रिपोर्ट में परिषद के प्रमुख बिबेक देबरॉय ने यह भी रेखांकित किया है कि यह अध्ययन कोई निष्कर्ष नहीं है, बल्कि विषमता की वर्तमान स्थिति का आकलन करने जा प्रयास मात्र है|

इस बात से यह संकेत भी मिलता है कि इन दोनों मसलों पर अभी आगे भी विचार-विमर्श जारी रहेगा तथा इनके तुरंत लागू होने की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए| इस संबंध में सबसे पहले वित्तीय उपलब्धता सुनिश्चित करनी चाहिए, लेकिन इस रिपोर्ट से देश में इस मुद्दे पर जारी चर्चा आगे बढ़ेगी| सब जानते हैं,मनरेगा का ग्रामीण क्षेत्र की अर्थव्यवस्था में उल्लेखनीय योगदान रहा है|

अगर योजना के अब तक के पूरे इतिहास को भी न देखें, तो केवल कोरोना दुष्काल के दौर में ही उसका महत्व बहुत अधिक रहा है| इस दौरान शहरी क्षेत्रों से गांवों की ओर वापस लौटे बड़ी संख्या में कामगारों को मनरेगा के तहत काम मिला, जिससे उन्हें राहत मिली| हालांकि शहरों में वे चाहे जो भी काम करते रहे हों, उनकी आमदनी मनरेगा से अधिक ही होगी, फिर भी तात्कालिक रूप से उन्हें सहायता मिली और जो अब भी जारी है|

विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं में खर्च होने तथा सरकारी राजस्व में कमी तथा महामारी की रोकथाम के उपायों के कारण मनरेगा का आवंटन इस वर्ष कम हुआ है| इससे इस योजना पर निश्चित ही असर पड़ेगा| वर्ष २०२१-२२ में ग्रामीण गारंटी योजना पर वास्तविक खर्च ९८  हजार करोड़ रुपया हुआ था, पर २०२२-२३ के बजट में ७३ हजार करोड़ रुपया ही आवंटित किया गया है| आर्थिक सलाहकार परिषद की रिपोर्ट में भी साफ-साफ कहा गया है कि सामाजिक कल्याण के लिए अधिक वित्त मुहैया कराया जाना चाहिए|

आज देश के सामने विभिन्न कारणों से अभी मुद्रास्फीति की गंभीर चुनौती है तथा अर्थव्यवस्था के भी संतोषजनक स्तर पर पहुंचने में कुछ साल लग जायेंगे| इस स्थिति में मुफ्त अनाज वितरण समेत कई अस्थायी कल्याण कार्यक्रमों की अवधि बढ़ानी होगी| आज  अगर शहरों में रोजगार गारंटी देनी है या न्यूनतम आमदनी मुहैया करानी है, तो सबसे पहले लाभार्थियों की संख्या और योजनाओं के वित्तपोषण को लेकर ठोस समझदारी बनानी होगी|

सबसे पहले गरीबी रेखा के बारे में विचार करना चाहिए, वर्तमान में हमारे पास इसके बारे में कोई आकलन ही  नहीं है|वर्ष २०१४  में एक आकलन आया था कि ग्रामीण क्षेत्र में ९७२  रुपये और शहरी क्षेत्र में १४६० रुपये से कम आमदनी को गरीबी रेखा के दायरे में रखने के तर्क दिए गए थे |

 इसके अनुसार, ग्रामीण क्षेत्र में १०५९  रुपये और शहरी क्षेत्र में १२८६  रुपये की न्यूनतम आय सीमा आकलित है| सलाहकार परिषद में तेंदुलकर समिति का हवाला दिया गया है| उस समिति ने २००९ में अपनी रिपोर्ट में कहा था ग्रामीण क्षेत्र के लिए ८१६  रुपये और शहरी इलाके के लिए १०००  रुपये मासिक आय की सीमा निर्धारित करने  की बात कही गयी थी, यानी इससे कम आय के लोग गरीबी रेखा से नीचे माने जाने चाहिए, ऐसा अर्थशास्त्रियों का मानना था |

इस रिपोर्ट की एक खास बात यह है कि इसमें यह कहा गया है कि हमारे लिए विषमता पर उतना ध्यान न देकर यह देखना अधिक जरूरी है कि गरीबी की क्या स्थिति है और उसके निवारण के लिए क्या किया जा सकता है? लेकिन ऐसा कर पाना संभव नहीं है क्योंकि विषमता लगातार बढ़ रही है तथा गरीबी बढ़ाने में वह भी एक कारक है.

रिपोर्ट में ही रेखांकित किया गया है कि देश के शीर्षस्थ १०प्रतिशत लोगों के पास लगभग एक-तिहाई आमदनी जा रही है| इसका अर्थ यह है कि २५  हजार रुपये से अधिक आमदनी वाले लोग शीर्ष के १० प्रतिशत लोगों में हैं|इसके चलते निचले तबके की आय में कमी आ रही है| साल २०१६-१७ की आर्थिक समीक्षा में जो प्रति व्यक्ति ७६२० रुपये सालाना देने का प्रस्ताव था, वह तेंदुलकर समिति के निष्कर्षों और सुझावों पर ही तो आधारित था|

उक्त आकलनमें कहा गया  था कि इस राशि को देने से जो खर्च आयेगा, वह सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का ४.९ प्रतिशत होगा| अरविंद सुब्रहमण्यम ने पद से हटने के बाद एक सुझाव दिया था कि ग्रामीण क्षेत्र में हर परिवार को १८  हजार रुपये हर साल देने चाहिए| उनके आकलन से इस पर २.६४ लाख करोड़ रुपये खर्च आयेगा| अब सरकार किस दिशा में बढ़ती है, एक बड़ा सवाल है |